Veer-Narayan-Singh-Binjhwar
Veer-Narayan-Singh-Binjhwar

सोनाखान (1795-10 दिसम्बर 1857) नाम से ही स्थान का परिचय हो जाता है कि सोने का भंडार धरती के गर्भ में भरा पड़ा हो। इस राज्य की नींव बिंझवार गोंड राजाओं ने लाँजीगढ़ पतन के बाद वहाँ से भागे हुए लोग सघन वनों से आच्छादित इलाके में अपना माल असवाब लेकर आश्रय के लिए भटक रहे थे। लाँजीगढ़ के तेकाम-नेताम राजाओं के सेनापति दरबारी लोग बिंझवार गोंड थे।

इसी वंश ने 17वीं सदी में सोनाखान राज्य की स्थापना की थी। वंश एवं आगमन विषय पर मतभेद हो सकता है, पर उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर वीर नारायण के पूर्वज गोंड जाति के थे। इनके पूर्वज सारंगढ़ के जमींदार के वंश के थे।

इसी वंश ने 16वीं सदी में सोनाखान सूबा की स्थापना की थी। बहरहाल जो भी हो वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रदेश मुख्यालय रायपुर से कसडोल होकर सोनाखान जाना पड़ता है। गोंड मारु के डर से इनके पूर्वजों ने गोंड से बिंझवार जाति में परिवर्तन किया तत्कालीन गैर लोग गोंड नाम बताने पर मार डालते थे। तब गोंडो ने अपने को बिंझवार बताया, इस नाम से आज भी गोंडमारु नामक गांव है। चूंकि उन दिनों मुस्लिम शासक दिल्ली की गद्दी पर बैठे थे।

वर्तमान सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर, बिहारप्रान्त का रोहतासगढ़, अंशतः बंगाल दामोदर घाटी तक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना का आदिलाबाद, दक्षिण महाराष्ट्र गोदावरी तक विस्तृत भूभाग गोंड़वाना में आता था। विदर्भ के कुछ क्षेत्रों में नागपुर जहाँ नागवंशीयों का राज्य था। मुस्लिम सेनापति के आक्रमण के बाद कुछ गोंड राजाओं ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिये। धर्म-अपरिवर्तित गोंड राजाओं से दुश्मनी चली। धर्म परिवर्तित राजाओं के द्वारा बहुतायत अत्याचार किये गये। धर्म परिवर्तित राजा उन दिनों गोंडमारु के नाम से प्रसिद्ध थे। यदि हम तथ्यों पर नजर डाले तो उल्लेखनीय बातें दृष्टिगोचर होती है कि वीरनारायण के पूर्वज सारंगढ़ से आये बिशाही ठाकुर सोनाखान जमींदारी वंशज के थे।

सोनाखान गाँव का प्राचीन नाम सिंघगढ़ था। कालांतर में सिंघगढ़ से सोनाखान हुआ। वंशावली पत्र से ज्ञात होता है कि बिंझवार खानदान के दो राजपुत्र पर्यटन करने निकले। दोनो फुलझर स्टेट में रहे उस समय रतनपुर के राजाओं की शानों शोकत की बातें सुनकर राज-दरबार रतनपुर आये। राजा से भेंट हुई तब राजपुत्र बिशाही ठाकुर को नौकरी में रख लिया। पहले प्रशन ठाकुर फुलझर में रह गये। दुसरे बिशाही ठाकुर रतनपुर के राजा के साथ रहे।

सन् 1549 की एक घटना है कि बिशाही ठाकुर ने एक कटार से तीन बाघ मार डाले। एक बार युद्ध में बहादुरी दिखायी थीं जिससे रतनपुर के राजा बिशाही ठाकुर को लवन में जागीर दी।

(1)बिशाही ठाकुर के बाद

(2)माघो वरिहा 

(3)धनक वरिहा

(4)लुकार वरिहा  एवं

(5)संघिसायवरिहा हुए। माघो वरिहा ने लोहे की सख्त जंजीर को एक हाथ से तोड़ दिया था तब बहादुरी से खुश होकर रतनपुर के राजा ने इनाम में उन्हें एक तालुका दिया था। इसके बाद सन् 1663 में इन्हें 84 गाँवों का दीवान बना दिया गया।

(6)चन्द्रसाय दीवान

(7)गज प्रताप वरिहा

(8)बन्धन वरिहा 

(9)मुरारी वरिहा

(10)दलसाय दीवान

(11)रामसाय दीवान

(12)रुद्र साय दीवान

(13)फत्तेसिंह वरिहा

(14)सिन्धसाय वरिहा। रामसाय दीवान वीर नारायण सिंह के पिता थे। वर्तमान में सोनाखान गाँव में अब जमींदार का महल नहीं है किन्तु अवशेष के रूप में केवल खंडहर है। गांव के पश्चिम में एक छोटी पहाड़ी है जिसका नाम कुर्रुपाट डोंगरी हैं। सुरक्षित कुर्रुपाट ऐसा स्थान है जहाँ साधारणतया कोई जा नहीं सकता उसका रास्ता जान सकना कठिन था। यहाँ छोटी सी झील है जहाँ सदैव पानी रहता है, बहुत ही मनोरम है। कुर्रुपाट गोंड-बिंझवार राजाओं के देवता है। यह वही स्थल है जहां वीर नारायण कुर्रुपाट देवता की पूजा करते थे।

कुर्रुपाट के उत्तरी छोर में बड़े तालाब राजा सागर तथा दक्षिण में एक तालाब मन्दसागर जिसे वीर नारायण के द्वारा खुदवाये गये थे। वे यहीं स्नान किया करते थे। आज की बस्ती नयी हैं, पुरानी बस्ती तालाब से लगीं हुई थी। माह दिसम्बर 1857 में इन्हीं बस्तियों पर ब्रितानियों ने हमला कर बर्बर अत्याचार किये थे।

Veer-Narayan-Singh-1987-stamp-of-India
Veer-Narayan-Singh-1987-stamp-of-India

अंग्रेजों ने इन बस्तियों को तीनों ओर से घेर कर आग लगा दी थी तांडव मचा हुआ था। अंग्रेजों ने मासूम बच्चों को पकड़ कर धधकते आग में झौंक दिया था। अंधाधुंध गोलियों से सैकड़ों निर्दोष पुरुषों और महिलाओं को मार डाला गया और यहां तक ​​​​कि सबसे अमानवीय अत्याचार करने से भी नहीं मारे गए, आस-पास की बस्तियों के लोग घर छोड़ कर जंगलों की ओर भागे। कुर्रुपाट डोंगरी में युवराज नारायण सिंह के वीरगाथा का जिंदा इतिहास दफन हैं जहाँ पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ खुदाई की गयी हैं। युवराज नारायण सिंह के पास एक घोड़ा था जो कि स्वामीभक्त था जिसका रंग कबरा था, वे घोड़े पर सवार होकर सूबे का भ्रमण किया करते थे। प्रजा के दुखदर्द सुना करते थे।

सोनाखान इलाके में एक नरभक्षी शेर का आतंक फैला था। मनुष्यों एवं पालतू जानवरों को मारकर खा जाता था। प्रभावित क्षेत्र की प्रजा जमींदार नारायण सिंह से सुरक्षा की मांग करने लगे। बहादुर युवराज नारायण सिंह हष्ट-पुष्ट 35 वर्षीय युवक थे। उनमें बहुत जोश था, वे प्रजा की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने दरिन्दे शेर को मार डालने की ठान ली। वे हमेशा बन्दूक लेकर नरभक्षी शेर को जंगल के बीहड़ों में खोजते रहे। बहुत दिनों तक शेर का पता नहीं लगा, अचानक एक दिन रायपुर के कस्बाई क्षेत्र में उत्पात मचाने लगा।

युवराज नारायण सिंह मुकाबले के लिए शेर के सामने लगभग निहत्थे खड़े हो गये, शेर ने युवराज पर आक्रमण कर दिया, मुकाबला होने लगा, तब म्यान से तलवार निकाल कर शेर को मार डाला। शेर तो आखिर शेर ही था लेकिन वे सवा-शेर थे। वे सचमुच में गोंडवाना के शेर थे। इस बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने वीर की पदवी से सम्मानित किया तब से उनके नाम के आगे वीर जुड़ गया और वीर नारायण सिंह नाम से जाने जाते है। अपने अतीत पर अपने इतिहास पर हमें गर्व है। किन्तु अपने गौरव से परिपूर्ण अतीत के गौरव गाथा को गोंड़वाना भूभाग के कितने लोग जानते है।

गोंड़वाना के शूरवीरों में वीर नारायण सिंह का नाम प्रथम पंक्ति में आता है। वीर नारायण सिंह डरपोक आदमी को पसंद नहीं करते थे। जैसा नाम वैसा काम था। प्रकृति का प्रकोप कहें सन् 1856 में इलाके में सूखे के कारण भयानक अकाल पड़ा। सूबे की प्रजा दाना पानी के अभाव से विचलित हुई। इलाके में ब्रिटिश साम्राज्य को पैर पसारे तीन साल हुए थे। अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर इलियट और कैप्टन स्मिथ थे। कसडोल गाँव के मिश्र परिवार पर अंग्रेजों की विशेष कृपादृष्टि थी, चूंकि उस समय आला दर्जे के शोषकों एवं जमाखोरों में उनकी गिनती होती थी।

ब्रिटिश उपनिवेशवाद देशी रियासतों के राजा एवं जमींदारों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। सभी राजाओं जमींदारों को अपना शत्रु बनाना चाहती थी। साम्राज्यवादकी एक नयी चाल एक नये वर्ग का उदय करना जो उसी देश के देशद्रोही को ढूंढ निकालना था, यह वर्ग था सूदखोर, जमाखोर, शोषक वर्ग।

साहूकारों ने ब्रिटिशों की कृपा से समूचे गोंड़वाना में अपना तंत्र बिछा दिया। जमाख़ोरी और ब्याज का धंधा आदि से महाजन वर्ग को आसमान छूने में देरी नहीं लगीं। पहले देहात में अन्न पर्याप्त मात्रा में इकट्ठा रहता पर जमाखोरों के चलते अन्न गायब होना स्वाभाविक था। सूखे की आड़ लेकर कमजोर वर्ग लोगों को शोषण का शिकार बना रहे थे। जमाखोरों के आगमन से देहात में दरिद्रता प्रारंभ हो चुकी थी। किसान भूख से तडफने लगे थे।

कसडोल गाँव का मिश्रा परिवार भी इन्हीं साहूकारों में से एक था। इलाका दुर्गम होने के बावजूद शोषण का जाल फैलाने में इनके करिन्दे भरपूर श्रम करते थे। उपज होते ही करिन्दे औनेपौने भाव से अन्न खरीद लिया करतें थे। ब्याज का व्यवसाय भी चालू किया। गहने, जेवर, भांडे, बर्तन आदि रखकर वे चक्रवृद्धि ब्याज के कारण कम समय में प्रथम श्रेणी के शोषक बन गए थे।

भीषण खाद्यान्न संकट से चिंतित प्रदेश के लोग सोनाखान में वीर नारायण सिंह की बैठक में एकत्र हुए. चर्चा में निर्णय लिया गया कि कसडोल के मिश्र महाजन से भोजन का कर्ज लिया जाएगा, जिसका ब्याज भी दिया जाएगा। राज्य में सूखे से अकाल की समस्या से खुश मिश्र परिवार ने अधिक ब्याज और अधिक लाभ प्राप्त करने के हित में वीर नारायण सिंह के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। कुर्रुपाट वीर नारायण सिंह का डेरा था। कुर्रुपाट का जल हाथ में लेकर वीर नारायण सिंह के साथ सभी प्रमुखों ने कसम खायी अब हम महाजनों को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

वीर नारायण सिंह ने प्रमुख सहयोगियों से पूछा कि वे लड़ेंगे या नहीं, सभी ने एक साथ जोर से कहा लड़ेंगे, फिर वीर नारायण के नेतृत्व में हजारों किसान कसडोल गांव की ओर चल पड़े। वीर नारायण अपने कबरे घोड़े पर सवार होकर कसडोल पहुंचे। फिर से कर्ज के रूप में भोजन उपलब्ध कराने का आग्रह किया, लेकिन जमाखोरों में जूँ तक नहीं रेंगी, अंतः वीर नारायण से रहा नहीं गया, उन्होंने संचायकों के अनाज डिपो पर छापा मारा। उन्हें कब्जा कर लिया और आवश्यकतानुसार शहरवासियों के बीच वितरित कर दिया।

सन् 1856 की यह क्रांतिकारी घटना थी। दाने-दाने को मोहताज लोगों के लिए संघर्ष की यह मिसाल अनुकरणीय था। राज्य का स्वामी और प्रजा का सेवक की भूमिका एक प्रकृति पुत्र होने के नाते दायित्व का निर्वाह बखूबी किया। इस घटना की सूचना उन्होंने स्वयं अंग्रेजों को दी। महाजनों ने अपना शिकायती पत्र डिप्टी कमिश्नर को भेजा। कसडोल का मिश्रा परिवार अंग्रेजों का चमचा था।

इस कारण रिपोर्ट दर्ज होते ही डिप्टी कमिश्नर इलियट ने 24 अक्तूबर सन् 1856 को फौज की टुकड़ी वीर नारायण की गिरफ्तारी वारंट लेकर भेज दिया। उन्हें पता था इतने सहज गिरफ्त में नहीं आने वाले हैं। धोखा देकर देशद्रोही, लुटेरा आदि के आरोप लगाकर गिरफ्तार कर रायपुर ले जाने में सफल हुए। वीर नारायण सिंह की गिरफ्तारी से राज्य की प्रजा में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग सुलगने लगी। वे इधर मौके का फायदा उठाकर एक दिन बंदीगृह से भाग निकले। प्रजा को जब इस बात का पता चला कि वीर नारायण सिंह बंदीगृह से बाहर आ गये हैं तो उनमें अपूर्व उत्साह था।

वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में बिंझवार, कंवर, धनुहर, गोंड, किसानों और नौजवानों ने तलवार बंदूकें, बरछी, भाला एवं तीर-धनुष, से लैस होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संग्राम में कूद पड़े थे। सन् 1856 में सम्पूर्ण गोंड़वाना में चिंगारी सुलग चुकी थी। राजा शंकरशाह-रघुनाथ शाह, जमींदार बापूराव शेंडमाके, अत्मूरी सीतार रम्यैया गदर की आग से खेल रहे थे। प्रत्येक लड़ाइयों में अंग्रेजों ने फूट या छल का सहारा लिया। अधिकांश महाजन वर्ग ने, सामंतशाही वर्ग को अपने साथ कर लिया। एकमात्र सम्बलपुर के क्रांतिकारी सुरेन्द्रसाय को छोड़कर बाकी सभी जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया। देवरी के जमींदार ने वीर नारायण सिंह के सगे बहनोई होने के बावजूद अंग्रेजों का साथ दिया, बिलासपुर के जमींदार ने अंग्रेजों को फौजी सहायता की। भटगाँव और बिलाईगढ़ के जमींनदारों ने भी कई तरह से अंग्रेजों की मदद की। अंग्रेजों के पैर चाटने वाले मराठा जमींदारों के विश्वासघात के कारण इतनी बड़ी लड़ाई हारनी पड़ी। सामंती वर्ग और महाजन के खिलाफ कोटगढ़ और खरौद गए और ब्रिटिश दलाल मिश्रा परिवार के लोगों को मार डाला। एक गर्भवती महिला और उसका बच्चा बच गया। वीर नारायण सिंह सैनिकों के साथ ब्रिटिश सैनिकों के खिलाफ गौरिल्ला हमला किया। वीर नारायण ने कुर्रुपाट में विश्राम किया।

सुरक्षित कुर्रुपाट सड़क तक पहुंचना मुश्किल था, लेकिन रात में गुप्तचरों द्वारा बताए गए मार्ग से आए ब्रिटिश सैनिकों ने वीर नारायण पर हमला कर पकड़ लिया, वह ब्रिटिश सरकार की गाड़ी में नहीं बैठे और अपने कबरे घोड़े पर सवार होकर रायपुर पहुंचे। उन पर पहिले से ही बंदीगृह से भागने का आरोप था दूसरा विद्रोह का, ब्रिटिश हुकूमत इतनी भयभीत हो चुकी थी कि अब वह पुनः बंदीगृह में रखने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स-इलियट के कोर्ट में पेश किया गया।

वीर नारायण सिंह पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा उन्हें प्राणदंड की सजा दी गई। गोंडवाना के वीर सपूत को 10 दिसंबर, 1857 को रायपुर चौराहे पर फांसी दी। ताकि गोंडवाना क्षेत्र में दहशत फैलाया जा सके और कई दिनों तक लाश को लटका कर रखा गया था ताकि यह दिखाया जा सके कि इसके बाद कोई भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सके। बाद में उनके शव को तोप से उड़ा दिया गया।

19 दिसम्बर 1857 को दसवें दिन लाश के टुकड़ो को परिवार वालों को सौंपा गया। सम्बलपुर के क्रांतिकारी सुरेन्द्र साय के मार्गदर्शन एवं सैनिक सहायता की मदद से वीर नारायण सिंह के पुत्र गोविन्द सिंह नें अंग्रेजों का साथ देने वाले देवरी के जमींनदार महाराज साय की गर्दन तलवार से एक ही वार में काट दी। बदले की तीव्र भावना से प्रेरित होकर अंग्रेजों ने सोनाखान के गांवों को बुरी तरह जला दिया।

वीर नारायण सिंह का बेटा गोविंद सिंह परिवार के साथ पदमपुर के लिए रवाना हो गया। रास्ते में कई गांवों को पार कर कष्टप्रद लंबी यात्रा के बाद जमींनदार के पास पहुंचा। मालिक ने उन्हें रोजमर्रे के जीवित रहने के लिए पर्याप्त भूमि दी। गोंडवाना की मातृ और पितृ शक्तियों ने स्वतंत्रता की लंबी लड़ाई में उनके राजपाट और खुद को दांव पर लगा दिया था।

➡श्रीमती सिया पट्टा


गेंद सिंह छत्तीसगढ़ के पहले शहीद | परलकोट विद्रोह

रायपुर का इतिहास | गोंड राजा रायसिंह जगत ने बसाया रायपुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here