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दक्षिणी गोंडवाना में एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है वैरागढ़ जहाँ नाग गण्ड चिन्ह समुदाय के राजा रहते थे। नाग गण्ड चिन्ह ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी तक राज किए। वैरागढ़ का किला ता०आरमोरी, जि०गडचिरोली, महाराष्ट्र में जिसमे राज किए है।

बस्तर सेटलमेंट रिपोर्ट के अनुसार 1. वैरागढ़ में वइलिया नाग, 2. चक्रकोट में छिंदक नाग, 3. माणिकगढ़ में वेलिया नाग, और 4.भादक में भदरानाग, गण्ड चिन्ह गण्ड समुदाय के राज्य थे।

डॉ०हीरालाल शुक्ल के अनुसार, जिन शासकों के पास वइलिया, छिंदक, वेलिया और भद्रा नाग गण्ड चिन्ह थे, वे मूल रूप से गोंड समुदाय से थे। इसकी जानकारी शिलालेख से प्राप्त हुई है जो तेलुगु लिपि में लिखा गया है। यही शिलालेख अन्य स्थानो में शुद्ध गोंडी भाषा में लिखा हुआ है।

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, कलिंग देश के ‘खारवेल’ (गिद्ध) गण्डचिन्ह धारी समुदाय के राजा ने वैरागढ़ पर आक्रमण किया और वहाँ ‘कोण्डासुर’ राजा को अपने अधीन करने के बाद दक्षिणी गोंडवाना ‘बीडार’(विदर्भ) पर आक्रमण किया। बीडार में भोजी और रठिक गण्डचिन्ह धारको को हराकर शासन किया और खण्डनी(कर) वसूला

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इससे पहले, असक नगर के सीरी सिटवा (सातवान) गण्डचिन्ह धारक राजाओ पर आक्रमण किया था। असक नगर वर्तमान में आगरगांव सारवा के पास, कुही माण्डल तहसील, जिला नागपुर में है, जहाँ नागपुर विश्वविद्यालय के पुरातत्वविदों को असक नगर के प्राचीन अवशेष मिले हैं। इसके मूल शासक सई गण्डचिन्ह धारक कंगावली गोत्रीय थे ।

वर्तमान वैरागढ़ किले का निर्माण चांदा के राजा करणशाह ने करवाया था और वहां पर पुराम गोत्रीय गढ़वीर को तैनात किया। वैरागढ़ में हीरो की खदान था। 1474 ई० में गुलबर्गा के राजा बहामणि राजा ने वैरागढ़ पर हमला किया। बहामणि को वापिस भेजने के लिए चांदागढ़ के राजा की सेना ने संघर्ष किया। अन्त बहामणि की विजय हुई और उन्होंने हीरे की लालसा में किले को नेस्तनाबुत को किला।

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गढ़वीरो के गाथा के अनुसार वैरागढ़ से कोंडासुर, वेलयासुर, पुरामसिंह, करणसिंह आदि राजाओ ने राज्य किया। जिन्होंने जनहित के लिए अनेक कार्य किये जिसके वास्तुकला के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

… वैरागढ़ शहर खोबरा नदी और सतनाला नदियों के संगम पर स्थित है। यहाँ गोंड राजाओं का एक प्राचीन किला है जो कोया वंशीय गोंड समुदाय के नाग गण्डचिन्ह को रखता है। यह हीरो की प्राचीन खदान थी, यह चांदागढ़ राजाओं के युग में एक परगना था। लेकिन इसके पहले के समय में यह एक स्वतंत्र राज्य था, जिसे उड़ीसा के गोंड वंशीय समुदाय खालवेल (गिद्ध) गण्डचिन्ह के राजा ने शासन किया। इसकी जानकारी हाथीगुफा शीला अभिलेख से प्राप्त होती है। वैरागढ़ में एक गोंड राजा का मकबरा है, जिन्हें दुमशाह कहा जाता है, यहाँ शम्भू मादाव का एक प्राचीन पेनस्थल है, जिसे गोंड राजा दिनकरशाह ने 11 वीं शताब्दी के दौरान बनवाया था

.. गोंडा राजा बल्लाल ने वैरागढ़ गाँव के पूर्व में एक किला बनाया जो दस एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ था। किले में चार और खाइयाँ हैं और सर्किट की ऊंचाई 15 से 20 फीट है। किले का प्रवेश द्वार दक्षिण में है, किले में प्रवेश करने के लिए तीन द्वार हैं। जिनमें से पहला द्वार कोटा से जुड़ा है। यहां से गुजरते हुए आप किले का मुख्य द्वार देख सकते हैं, इसके पास एक रक्षक गार्ड का रूम है जो दिन रात पेहरेदरी करता है और दूसरा कचहरी का चबूतरा है। दाईं ओर जीर्ण सीढ़ियों की एक बाबड़ी है बाईं ओर परकोटे के आधार पर पेनठाना का खंडहर हैं, किले की वायव्य दिशा में ईदगाह नामक पहाड़ी के तलहट में हीरो की खदान है।

सौजन्य — गोंडवाना सांस्कृतिक इतिहास – लेखक आचार्य मोतीरावन कंगाली … रावणराज कोइतुर। नागपुर ।

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