Adivasi,Koytur
Adivasi

कोयतूरों से अपनी पहचान पूछे जाने पर खुद को कोयतूर नही बताते है, जिस वजह से दुसरे लोग उन्हें उनकी पहचान दे देते है जैसे वनवासी, ट्राइबल, आदिवासी, अनुसूचित जनजाति, सेडुलड़ ट्राइब आदि । इन्ही में से एक शब्द आदिवासी है । आदिवासी शब्द (नवीन) नया है, प्राचीन नही है । आदिवासी शब्द को आए हुए लगभग 100 वर्षो से भी कम वक्त हो रहा है । 

आदिवासी शब्द की प्राचीन संज्ञा क्या है? पहले आदिवासी शब्द के अर्थ को समझें । आदिवासी शब्द का अर्थ आदिकाल से निवास करने वाले लोग होता है । आदिकाल मने कब से, इसका स्पट समय ज्ञात नहीं हो पा रहा है। आदिवासी शब्द का भावार्थ असभ्य या पिछड़ा हुआ प्रतीत होता । जिससे कोयतूर सार्वजनिक जगहों पे जैसे सरकारी कार्यलाओ में, निजी कार्यलाओ में, सभाओ में खुद को आदिवासी कहने से बचते है । आदिवासी शब्द ब्राह्मणों के द्वारा जानबुच कर दिया गया है, ताकि कोयतूर खुद को आदिवासी शब्द बोलने या अपनी पहचान बताने में सर्मिन्दिगी महसूस करे और ऐसा हो भी रहा है ।

कुछ लोग कहते है की आदिवासी शब्द का उपयोग करेगे तो ही सब एक हो पाएगे और कोयतूर शब्द का करेगे तो एक नहीं हो पायेगे । तो क्या आदिवासी शब्द का उपयोग करके हम एक हो पाए ? नहीं हो पाए इसलिए हमें अपने मूल शब्द कोयतूर की ओर रुख करना चाहिए ताकि लोग इस शब्द और इसके इतिहास को जाने ।  

आदिवासी शब्द प्राचीनता का बोधक है, न कि विकास या विकसित सभ्यता का । यह प्राचीन मूलज या मूलवंशज का अति प्राचीन होने का बोध कराता है न कि उसके विकास का पैमाना निर्धारित करता है ।  

अति प्राचीन काल में इस आदिवासी की क्या (नाम) संज्ञा थी? प्राग्द्रवीडियन गोंडी भाषा में इस आदि काल से निवास करने वाले लोगों को कोयतूर या गोंड कहा जाता है । कोयतूर = कोया + तूर । कोया शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, कोया अर्थात आधार तथा तूर अर्थात वंश या संतान । इस प्रकार कोयतूर का अर्थ आधार या वंश होता है । उसी प्रकार गोंड शब्द के अनेक अर्थ होते हैं ।   उनमे से एक अर्थ गो + अण्ड = गोंड । गो = विवेक तथा अण्ड = जीव । इसी तरह गोंड = विवेकी जीव अर्थात जिनमे विवेक बुद्धि हो, जो पशुओं में नही होता । पशुओं में सहज बुद्धि होता है । विवेकी बुद्धि सिर्फ गोंड में होता है । इस प्रकार गोंड शब्द मानव, मनुष्य, आदमी और इंसान का पर्यायवाची शब्द है ।  

धरती के सभी मानवों को यदि मात्र दो महा नस्लों में विभाजित कर दिया जाए तो उत्तपत्ति के आधार पर पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (उत्तराखंड) लॉरेशिया में उतपन्न मानव के महा नस्ल को आंग्ल कहा गया जिससे गोरे वर्ण वाले यूरेशियन तथा यूरोपियन लोगो का विकास हुआ ।  

इसी आंग्ल महा नस्ल के मानवों की उत्तपत्ति भूमि होने के कारण धरती के उस उत्तरी गोलार्ध को लॉरेशिया को आस्ट्रिया के महान वैज्ञानिक एडवर्डस्यूज (1631- 1914 ईस्वी) ने आंगारलैंड कहा, जिसमे यूरोप, तथा उत्तरी अमेरिका महाद्वीप है । जबकि उन्होंने धरती के दक्षिणी गोलार्ध को गोंडवानालैंड कहा । यह गोंडवानालैंड ही टूटकर पांच महाद्वीपों में विभाजित हुआ जिससे एशिया, (वर्तमान भारत) दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, व अंटार्कटिकामहाद्वीप आये हैं ।  

इस गोंडवानालैंड को गोंडी भाषा में सयुंग भू द्वीप ( सम्भूद्वीप ) कहा जाता था । संयुग अर्थात पांच तथा भू अर्थात भू-खंड । इस प्रकार सयुंग भू द्वीप (सम्भूद्वीप) अर्थात पांच भूखंड वाला द्वीप होता है । क्योंकि इस पांच भूखंड में उत्तपन्न मानवों को गोंड महा नस्ल पहले से कहा जाता था इसलिए इसे गोंडवानालैंड कहा गया ।  

गोंडवानालैंड में उत्पन्न सभी मानवों की प्राचीन संज्ञा गोंड है । उस काल (समय) में मानव, मनुष्य, इंसान, आदमी आदि संज्ञाओं व सम्बन्धित शब्द, भाषाओं की उत्तपत्ति भी नही हुई थी । इस प्रकार गोंड जाति सूचक शब्द नही है, बल्कि गोंडवानालैंड के मानव सूचक शब्द है ।  

गोंडवानालैंड के सभी मूलवंशियों की प्राचीन संज्ञा गोंड है । गोंड शब्द को जो जाति बताता है वो शायद दुनिया के भाषा और सांस्कृतिक इतिहास नही पढ़ा है ।  

जाति तो पौराणिक काल पांचवी – छठवी शताब्दी ईसा पूर्व में बना तथा पुष्यमित्र शुंग के काल (185 ई०पू०) के बाद और प्रबल तथा सशक्त हो गया ।  

आज जो हजारों जातियों, उपजातियों, वर्गों एवं उपवर्गों, उंच-नीच, छुआछूत में विभाजित हैं । वे सभी लोग (आंग्ल महा नस्ल के यूरेशिया मूल के लोगों को छोंड़कर) गोंड हैं ।  

अतः आदिवासी शब्द के बजाए कोयतूर तथा आधार वंशी गोंड है । (गोंडवानालैंड के मानव शब्द प्रयोग करना चाहिए और करेंगे ।)  

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