shambhu shek,shambhu naka,shiv raksha stotra,शिव रात्रि,Madava-sambhu-shek-kodapa
Shambhu Shek

कोयतूर परंपरा में सभी ‘पाबुन’ ‘पंडुम’ का उद्देश्य लोगों को ज्ञानवान और जागरूक बनाने का है । जो पर्व परेवा से पूर्णिमा तक मनाए जाते हैं उन्हे ‘पाबुन’ और जो परेवा से अमावस्या तक मनाए जाते हैं उन्हे ‘पंडुम’ कहते हैं। शंभू शेक नरका कोयतूर समाज का पर्व हैं।

माघ पूर्णिमा के तेरहवें दिन समस्त कोयावंशियों (कोयतूरों) बहुत ही महत्त्वपूर्ण पंडुम मनाते है जिसे शंभू शेक नरका कहते हैं । शंभू शेक नरका को शंभू के जगाने की रात या शंभू जागरण की रात्रि के रूप में भी जाना जाता है । महाराष्ट्र में इस पर्व को “संभू जगेली नरका” के नाम से मनाया जाता है । उत्तर भारत में इस पर्व को ‘महा शिवरात्रि’ कहते हैं और इसे ब्राह्मण लोग हिन्दूकारण करने के लिए पूराजोर लगा देते हैं। इसमें वह कामियाब भी हो गए है।

शंभू शेक कौन थे ? शंभू शेक नरका पर्व क्यूँ मनाया जाता है? भारत मे आर्य लोगों के आगमन औऱ उनके साम्राज्य स्थापित करने के पहले उस समयकाल में भारत का नाम “आर्यवर्त” था। बौद्ध विचारक और अध्ययनकर्ता भारत का सबसे प्राचीन नाम “जम्बूद्वीप” के नाम से भी जानते है । लेकिन विद्धान इतिहासकार यह भूल गए की आर्यो आगमन कॆ पूर्व यानी नव पाषाण काल मे यहाँ अति विकसित सभ्यता थी और इस देश की अपनी अलग पहचान थी जिसे “कोयामुरी द्धीप” कहा जाता था अर्थात कोया वंशी लोगो का देश जो कोया में रहते थे।

कोया अर्थात गुफा और माँ का गर्भ से उत्पन्न । संताली, मुंडारी, हो, खड़िया, आदि अनार्य भाषा मे होड़ या होडो शब्द का प्रयोग ‘मनुष्य’ कॆ लिए किया जाता है । कोयामुरी द्वीप (भारत) में आर्य ने समय को चार भागों में बांटा। पहला काल खंड सतयुग, दूसरा काल खंड त्रेता, तीसरा काल खंड द्वापर और चौथा आधुनिक काल (कलयुग) । प्रत्येक काल खंड में उन्होंने किसी न किसी कोयतूर राजा के राज्य में कब्ज़ा किया । जैसे सतयुग में शंकर, त्रेता में रावण और द्वापर में राजा बलि और अब कलयुग में आप स्वयं समझ सकते हैं ।

क्या कभी आपने ध्यान दिया की शंकर, रावण और राजाबलि साँवले या काले क्यूँ थे ? क्यूंकी ये सभी कोयतूर मूलनिवासी राजा थे। भारत में आर्यों आगमन से पूर्व, राजा कुलीतरा कोयामुरी दीप के गंड प्रमुख थे और उनका शासन का सत्ता केंद्र सतपुड़ा (सत्ता का पुड़ा यनि सत्ता का केंद्र) पर्वत शृंखला पर स्थित पेंकमेढ़ी (आधुनिक पचमढ़ी ) था । राजा कुलीतरा की एक संतान हुई जिसका नाम कोसोडूम रखा गया । कुलीतरा की मृत्यु के बाद इस धरती के सभी गंडजीवों ने कोसोडूम को अपना राजा चुना और उन्हे “शंभू शेक” की उपाधि ने नवाजा ।

शंभू शेक जो गोंडवाना के पाँच खंड धरती के पोया (राजा) थे। कोसोडूम ने अपनी विद्वता, योगबल, शक्ति और तपोबल से इस पंच खंड गोंडवाना धरती का शासन संभाला और इस पंच खंड (गण्डोदीप) धरती का महाधिपति बना । वह ”शंभू मा-दाव” की संज्ञा से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ पंच दीपों का स्वामी होता है । इसी शंभू मा-दाव का अपभ्रंश रूप बाद मॆ आर्य ब्राह्मणों ने विकृत करके ‘ शंभू महादेव ‘ बना है । शंभू शेक ने मूँद-शूल-सर्री (त्रिशूल मार्ग) के सिद्धान्त को दिए, जिसे बाद के सभी शंभू ने अनुपालन किया। आज भी उसी त्रिशूल मार्ग को प्रतीक के रूप में कोयतूर समाज मानते है और आर्य हिन्दूकारण करने के लिए पूजते है ।

कोयामुरी द्वीप में कुल 88 (अट्ठाशी) शंभू हुए जिन्होंने हजारों वर्षों तक शासन किया और कोया पुनेमी व्यवस्था चलाई । शंभू शेक को कोयतूर लोग शंभू मादव भी कहते हैं जो इस पंच खंड धरती का मालिक होता था । आज इसी महान शंभू शेक पोया (राजा) को हिन्दू लोग भी महादेव के नाम से पूजते है । आज तक जितने भी शंभू हुए हैं वो अपनी पत्नियों के साथ जोड़ियों के रूप में जाने जाते हैं जैसे ‘शंभू मूला’ प्रथम जोड़ी, ‘शंभू गवरा’ और ‘शंभू गिरजा’ मध्य जोड़ी । उक्त शंभू मादाव के जमाने में अर्थात शंभू गवरा की जो मध्य की जोड़ी थी उसके कार्यकाल में पूर्वाकोट के गण्ड प्रमुख पुलशिव – हीरबा के परिवार में रूपोलंग पहान्दी पारी कुपार लिंगो ने जन्म लिया। उसने अपने जीवन काल में संपूर्ण कोयामूरी दीप के कोया वंशीय कोयतूर आदि गण्डजीवों को सगा गोत्र जीवन पध्दति में एक गोंडोला में संरचित किया।

सभी कोया वंशीय गण्डजीवों ने गोंडोला व्यवस्था के सगावेनों की जीवन पद्धति को स्वीकार किया और वे गोंडोला के निवासी ”गोंडी सगा वेन” (गोंडी सगा गोत्रज) बने । इस तरह गोंडोला के सगावेनों की व्यवस्था जिस भू-भाग में फल – फूली वह भूभाग गोंडी सगावेनों का गोंडवाना बना । अंतिम जोड़ी को ‘शंभू पार्वती’ के नाम से जाना जाता है । शंभू पोया के रहते हुए किसी भी बाहरी व्यक्ति को इस धरती पर आना संभव नहीं था । अगर किसी को यहाँ प्रवेश करना, बसना या अपने वंश का विस्तार करना होता था या मृत्यु के बाद दफनाना होता था तो यह सब शंभू पोया के अनुमति के बाद ही संभव हो पाता था ।

जब आर्यों की छोटी छोटी सैनिक टुकड़ियाँ इस कोयामुरी धरती पर प्रवेश करने लगी तो शंभू के आदेश से उन्हे खदेड़ कर वापस कर दिया जाता था या मार दिया जाता था । इससे आर्य परेशान हो गए और शंभू को वश में करने के लिए और शासन सत्ता हतियाने के लिए कूट नीतिक और षणयंत्र का सहारा लेने लगे । आर्य राजा दक्ष की कन्या पार्वती को शंभू के पास उन्हें वश में करने के लिए उनके पास भेजा लेकिन पार्वती स्वयं उनके प्रभाव में आकर उन्ही की भक्तिन बन गयी और आर्यों का यह दांव उल्टा पड गया । फिर आर्यों ने शंभू और उनकी सेना को धोके से जहर देकर मरने का योजना बनाई जिसमें उन्होंने ने सुलह का फैसला किया और एक सुलह प्रीतिभोज का आयोजन किया ।

शंभू और उनकी सेना सहित प्रजा को भी निमंत्रण भेजा गया । तय संधि के अनुसार माघ की पूर्णिमा की दूधिया चाँदनी रात में एक विशाल मैदान में शंभू शेक और उनकी सेना, कोया लिंगो, मुठवावों, महान भूमकाओं और प्रजा के साथ भोजन के लिए पहुंचे । शंभू की तरफ से और आर्यों की तरफ से शांति पूर्ण रहने और प्रकृति को नष्ट न करने की शर्त पर समझौता हुआ। उसके बाद प्रीतिभोज के लिए सभी आसन पर बैठे । सभी को भोजन परोसा गया लेकिन शंभू को आर्यों द्वारा परोशे गए भोजन पर शक हुआ तो उन्होने अपने सभी साथियों को भोजन करने से रोक दिया और बोले पहले मैं भोजन करूंगा फिर मेरे सहयोगी भोजन करेगे । यह कहकर शंभू ने खाना खाना शुरू किया। खाने के कुछ देर बाद उनका शरीर नीला पड़ने लगा और उल्टियाँ होने लगीं। जल्दी ही वे बेहोश हो गए। पूरे कोइतूर सेना और सलाहकार परिषद में हंगामा मच गया।

अपने शंभू को बेहोशी की हालात में देखकर पूरी कोया सेना आर्यों पर टूट पड़ी और उन्हें बुरी तरह से खदेड़ कर भगाया। शंभू शेक ने अपनी सेना, प्रजा, सहयोगियों, सलाहकार परिषद, की जान बचाई और खुद जहरीला खाना खाकर लोगों के सामने महान बन गए थे। लोगों को शंभू की मानसिक और शारीरिक क्षमता के साथ साथ उनकी आध्यात्मिक बल पर भी पूरा भरोसा था। सभी जानते थे कि एक दिन वे इस जहर को पचा लेंगे और होश में आ जाएंगे। इसलिए सभी लोग उनके शरीर को साफ करते हैं और उन्हें जगाने की कोशिश करते हैं। पूर्णिमा के दिन, भुमाका और कोया लिंगो की सलाह पर शंभू को पुन: जीवन वापस लाने के लिए सई मुठोली गोंगों का आयोजन किया गया। मुठोली गोंगों यानी पांच मठ (खूट) या पांच तत्वों का गोंग । कोयतूर पांच तत्वों को फड़ापेन कहते है, जो जीवन का निर्माण करते हैं।

शंभू शेक को नया जीवन देने के लिए पूर्णिमा के दिन, लिंगो ने अपने पांच मुठवा के साथ मुठोली गोंगों या फड़ापेन गोंगो किया जो पूर्णिमा से अमावस्या के दो दिन पहले तक चला । आज भी भारत के कोयतूर समाज में माघ पूर्णिमा का आयोजन मुठोली गोंगों जागरण के रूप में किया जाता है। अंत में, पूर्णिमा के तेरहवें दिन, शंभू शेक की आंखें खुली और वह पूरी तरह से होश में आ गया। जैसे ही उन्हें होश आया, पूरे राज्य में खुशी का माहौल फ़ैल गया, उनके शंभू को जिंदा देख लोग रोमांचित हो उठे। वह गाने, बजाने, नाचने लगा।
तब से आज तक पूरे कोयतूर समाज के साथ साथ अन्य संस्कृतियों के लोग भी शंभू शेक नरका को हर्षोल्लास के साथ मानते। सभी के स्वास्थ्य की कामना और सुख समृद्धि हेतु शंभू शेक का गोंगों (पूजा) करते हैं । आज हमें फिर से ऐसे ही शंभू शेक की जरूरत है जो कोयतूर समाज में फैले हुए जहर को पीकर पूरी मानवता का मार्ग प्रशस्त करे और सभी को सुखद जीवन दें !

डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे


बड़ादेव व बुढ़ादेव में क्या अंतर है

ईशर गौरा विवाह महोत्सव | गोंडवाना सांसकृतिक विजव महोत्सव

2 COMMENTS

  1. शंभू नरका पंडुम
    शंभू जागरण पर्व की गोण्डी गाथा की पूरी जानकारी देने के लिए आपको
    सेवा जोहार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here