गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ मंडला रियासत की महारानी, अदम्य साहसी, 1857 की क्रांति में 65 बरस की उम्र में बलिदान देने वालीं महान योद्धा, वीरांगना रानी फूलकुँवर शाह जी के बलिदान दिवस पर शत् शत् नमन🌼🙏🏽

वीरांगना रानी फुलकुँवर पत्नी शहीद महाराज शंकर शाह

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत का प्रथम बलिदान जबलपुर कमिश्नरी से वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी और वीरांगना रानी फूलकुंवर का रहा।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 की संपूर्ण भारत में प्रथम महिला शहादत(20 मार्च 1858) वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी की रही है। तदुपरांत महा महारथी श्रीयुत शंकरशाह की वीरांगना फूलकुंवर ने भी अंग्रेजों से युद्ध करते हुए प्राणोत्सर्ग किया।

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वीरांगना का गौरवमयी इतिहास प्रस्तुत करने के पूर्व मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि जिस तरह इतिहास लेखन के दौरान महारथी शंकर शाह और उनके सुपुत्र रघुनाथ शाह के साथ अन्याय हुआ है। उससे भी बड़ा अन्याय वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी और रानी फूलकंवर के साथ हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर लिखे गए इतिहास में तथाकथित महान् इतिहासकारों ने उनके बारे एक पृष्ठ तो छोड़िये एक पंक्ति नहीं लिखी है।

18 सितम्बर, 1857 को महाराजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप के गोलों से उड़ा दिया गया। रानी फूलकुंवर देवी के लिये यह असहनीय पल था। पति और पुत्र को खोने के बाद भी वह वेष बदलकर अपने साथियों के साथ शहीद स्थल पर आई और यत्र-तत्र बीखरे देहावषेशों को एकत्रित कर रानी ने दोनों (पिता-पुत्र) का अंतिम संस्कार किया और अंग्रजों से बदला लेने का प्रण लिया। रानी फूलकुंवर बाई ने मंडला आकर क्रांती को जारी रखा।

अंग्रजों का इस तरह सरेआम राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप से बांधकर मृत्युदंड देने का उद्देश्य लोगों और राजाओं में अंग्रजों का डर पैदा करना था परन्तु अंग्रेजों के इस कदम से क्रांती और ज्यादा भड़क गई। लोगों द्वारा दूसरे ही दिन इस स्थान की पूजा की जाने लगी। 52वीं रेजिमेंट के सैनिकों में विद्रोह फ़ैल गया और इनकी टुकड़ी पाटन की ओर कूच कर गई। विद्रोह की आग मंडला, दमोह , नरसिंहपुर ,सिवनी और रामगढ तक फ़ैल गई। जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ सशत्र क्रांती फ़ैल गई।

वीरांगना रानी फूलकुंवर के पति और पुत्र के शहादत के बाद एक सेना की स्थापना करके मंडला में विद्रोह का नेतृत्व करने लगी थी। अंग्रेजों की 20 सैनिक टुकड़ियों से रानी फूलकुंवरी ने टक्कर ली। वह तथा रघुनाथ शाह की पत्नी मनकुंवरी ने तब भी संघर्ष जारी रखा। उनके सहयोग में जबलपुर, मंडला, नरसिहपुर, दमोह, सिवनी आदि जिलों के ताल्लुकेदारों की सेनाएँ लड़ रहीं थीं। महारानी फूलकुंवर देवी खम्हरिया, सोनपुर, बरेला, बीजादांडी से लड़ती हुई मंडला पहुंचकर मंडला के किले से युद्ध का संचालन करने लगी थीं। सेनापति राजा ठाकुर खुमान सिंह भी अपने दीवान फत्तेसिंह मराबी के साथ रानी से जा मिले थे। मंडला का किला क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया था।

20 अक्टूबर के युद्ध में अंग्रेजी सेना की हार हुई थी। क्रांतिकारी पकड़ से बाहर थे। अंग्रेज़ अधिकारी अपना गुस्सा अपने ही अधीनस्थ भारतीय अधिकारियों पर उतार रहे थे। 5 मार्च तारीख को नारायणगंज और मंडला के मध्य विद्रोहियों के झोपड़े जलाकर उन्हें बेघर किया गया और 6 तारीख को जबलपुर की दिशा में कालपी और कुड़ामैली के झोपड़े नष्ट कर दिये।

20 मार्च, 1858 को फूल सागर – गढ़ मण्डला में, मदार्ना भेष में रानी फूल कुँवर ने अपने सैनिकों के साथ रहगढ़ किले को अपने अधिकार में किया और कई स्थानों पर अंग्रेजों को पीछे धकेला। अंग्रेजों ने उनके घोड़े का पीछा किया और घेर लिया। बड़ी ही वीरता के साथ वो लड़ी और कई अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट सुला दिया। अंत में जब वो घोड़े से गिर गयी और अंग्रेजों ने घेर लिया तो अपने सीने में अपनी ही तलवार भोंक अपना बलिदान दिया।

रानी दुर्गावती के बाद गढ़ा मंडला की ये दूसरी महारानी थी जिसने ऐसी वीरता का परिचय दिया था। घायल अवस्था में उन्हें अंग्रेजों की छावनी में लाया गया जहां उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। सम्पूर्ण क्रांती में इस क्षेत्र से महाराजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, रानी अवन्ती बाई, रानी फुलकुँवर जैसे कई वीर-वीरांगनाओं ने अपना बलिदान दिया।

गोंडवाना के अनगिनत शहीदों ने अपने खून से भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की अमर गाथा लिखी है। अपने अद्वितीय बलिदानों की परंपरा को कायम रखते हुए, उन्होंने पीढ़ियों को अपने देश के गौरव और महिमा के लिए मर मिटने के लिए प्रेरणा भी दिया है।

लेकिन विडंबना यह है कि रानी फूलकुंवर के बारे में कोई नहीं जानता,न ही बलिदान दिवस कार्यक्रम का आयोजन होता, न वीरांगना के सम्मान में उनकी मूर्ति व भव्य स्मारक बना, न पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने की कोशिश किया।

जोहार

जय गोंडवाना🦁


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