Rani-Hirai-jayanti
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सभी जानते हैं कि भारत में शाहजहाँ ने मुमताज़ के लिए ताजमहल बनवाया था, लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि एक गोंड रानी हिराई आत्राम ने अपने पति की याद में एक बड़ा मक़बरा बनवाया था !

—– दक्षिण गोंडवाना साम्राज्य का विशाल साम्राज्य भू-भाग, पवनार – वर्धा के संगम, वेनगंगा, कन्हान नदी, आभोर के संगम, पेनगंगा तथा गोदवरी – इंद्रावती पामल गौतमी परलकोट अंधरी मूल नदियों के संगम- झरपट – इराई नदी के संगम में बसा अनेक किल्लो का चांदागढ़ राज्य था । ये पुरातत्व के एक धरोहर है । दक्षिण गोंडवाना में विशाल गोंडवाना साम्राज्य के राज्य चिन्ह किल्ले महल पेन / पेनठाना में प्रचुर मात्र में मिलते है।

—– चांदागढ़ प्राचीन काल का एक गढ़ है। कोयतूर सागा लोगों का इलाका था। यह कोयतूर गढ़ जीवियो की श्रद्धा और पवित्र आस्था का ऐतिहासिक स्थान है। “आदिशक्ति” महाकाली कालींकंकाली की जन्मस्थली, कोया पुनेमी सगा पुरवाजो की दाई (माता), चांदागढ़ जलप्रपात के किनारे पर हुई है। कोया पुनेम राजा यादराहुड, की बेटी थी। राजा यादराहुड यादमालपुरी शहर का राजा था। यादमालपुरी की इस नगरी को ‘कोकपुर’ कहा जाने लगा, बाद में चांदा कहा जाने लगा। “प्राचीन कोया पूनेम”, इन आदिशक्ति ” कालींकंकाली ” को महाकाली “आय का रोन” कहा कर सम्बोधित करते है।

 —– इसी राज्य की स्थापना कोयतूर योद्धा अत्रामड़ा कालापटाधारी शेर ने किया, कबीले अरामपित्ते धारी भीम बल्लाडसिंग ने 842 ई० में आत्राम में रामवंश गोदावरी और इंद्रावती नदी के संगम के पास सिरपुर नींव रखी । आत्राम वंश ने एक किले का निर्माण किया और सैनिको को तैनात किया। इसे एक छावनी में बदल दिया। इसके आस पास शहर बस गया और इस जगह से सिरोंचा जूनगांव तक अपना राज्य का विस्तारित किया। राज्य के विस्तार में 995 ई० में, आदिया बल्लाडसिंग की तीसरी पीढ़ी ने सिरपुर से राजधानी को वर्धा और पेंनगंगा नदी के संगम पर बल्लारशाह नामक शहर में स्थापना किया। .. वर्धा नदी के तट पर राजधानी बल्लारशाह पे 1242 ई०में खडक्या बलदाशा ने शासन शुरू किया ।

राजा खडक्या बलदाशा ने 1282 ई० में एक किला और महल के निर्माण की नींव रखी। 1695 ई० में पूर्ण हुआ जिसमे 8 पीढ़ि और 4 सौ वर्षों का समय लगा। खडक्या बलदाशा के शासनकाल के दौरान चांदागढ़ राज्य का विस्तार दक्षिण गोंडवाना साम्राज्य – टीपागढ़, माणिक गढ़, माहुर गड, गढ़ चांदुर, केलापुर और बैरागढ़, भामरागढ़, खोब्रागढ, सुरजा गड, जुन गांव, जोड़ा घाट, उटा नूर, तलवरगढ, जैनुर गढ़ो में किया।

—– राजा किसानसिंह के बाद राजा बिरशाह आत्राम चांदागढ़ के गद्दी पर बैठे । जब वह राजकुमार 20 साल का था। उनका विवाह मदनपुर होशंगाबाद के ढिल्लनसिंह मडावी की बेटी राजकुमारी हिराई से हुआ था। राजकुमारी हिराई एक बहुत ही बुद्धिमान रानी थी। राजा बिरशाह की इकलौती बेटी मानकुंवर थी। राजकुमारी मानकुंवर का विवाह देवगढ़ के दुर्गशाह खण्डता से हुआ था। नेकनाम खान देवगढ़ में राजा बिरशाह के छोटे भाई थे। वह इस्लाम धर्म काबुल कर लिए थे और वह देवगढ़ राज्य के राजा बक्त बुलंदशाह उइके का फौजदार था।

राजा बिरशाह गद्दी के उत्तराधिकारी के लिए पुत्र की उत्सुक थी। तब रानी हिराई ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा की दूसरी शादी के लिए तैयारी शुरु किया। चांदागढ़ के राजा बिरशाह का दूसरा विवाह औंदीगढ़, बाजागढ़ के मंडावी ज़मींदार की पुत्री से हुआ। रानी हिराई ने ही राजा का विवाह कराया । विवाह के अवसर पर मंडप में रानी हिराई के अंगरक्षक सिपाही ने राजा पर हमला कर के सर कलम कर दिया। इस घटना से क्रोधित होकर रानी हिराई ने अपने देवर गोविंडशाह जो चन्दनखेड़ा के जमींदार थे, उनकी संतान रामशाह को गद्दी पर बिठाया और राज्य की सत्ता का बागडोर अपने हातो में लिया। राज्य पर राजा बिरशाह के छोटे भाई गोविंडशाह का भी हिस्सा था इस वजह से उनके पुत्र रामशाह को गद्दी पर बिठाया ।

राजा बिरशाह आत्राम की हत्या के बाद रानी ने खुद को सम्भाला और रानी ज़ारा भी परेशान नहीं हुई। अपने दरबारियों कमांडरों की मदद से उन्होंने राज्य व्यवस्था को नियंत्रण किया। चांदागढ़ के सभी किले बाजा गढ़, सूरजगढ़, तलवार गढ़, सिरपुर, भमरा गढ़, पौनी गढ़, गडचिरोली, पौनर गढ़ और गड चांदुर, माणिक गढ़, माहुर गढ़, केलापूर, पलस गढ़, कलंब, जून गांव, बल्लारशाह, को खुद भ्रमण करके खजाना राज्य व लोगो की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया।

रानी हिराई की अच्छे कार्य: —- रानी हिराई बहादुर महिलाओं में से एक थीं, उन्होंने राज्य में उठ रहे कई विद्रोहों का अंत किया । यह रानी के बुद्धि, विवेक, ज्ञान और कौशल की बदोलत हुआ । आदि शक्ति महाकाली का एक विशाल पेनठाना झरपट नदी के तट पर विशाल प्रांगण में बनाया गया था। 15 साल के शासनकाल में, राज्य की सुरक्षा, समृद्धि और भविष्य के भावी गोदपुत्र राजा को 20 साल की उम्र तक अच्छे शासक बनाने के गुड सिखाये।

1719 ईस्वी में रानी ने बेटे को राज्य सौंप दिया और वह रामशाह को चांदा के राजनीतिज्ञ दाव पेच को अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया। 1728 ईस्वी में, वह 65 वर्ष की आयु में लिंगोवासी बन गया। राजा बिरशाह की कब्र के पास रानी हिराई का मकबरा है। उनका प्यार गोंडवाना में अजर अमर हो गया। रानी हिराई, जिसने राजा को राज्य के उत्तराधिकार के लिए पुनर्विवाह करने की सलाह दी थी। पुत्र के लिए अपने पति का दूसरी रानी से शादी करना दुर्लभ है। आज भी, गोंड समाज में, यदि वारिस नहीं है तो पहली पत्नी वारिस के लिए दूसरी शादी की अनुमति देती है।

रानी हिराई का जन्म 20/04/1668 — मृत्यु 10/12/1728

रानी हिराई का शासनकाल बहमनी, मुगल सल्तनत, मराठा, सुल्तान और अपने परिवार के साथ लड़ते हुए बिताया। कोयतूर रानी हिराई 15 वर्षों तक एक अदम्य और उत्साही योद्धा के रूप में द्श्मनो से लोहे लेके लड़ती रही। उन्होंने राज्य में कई सुधार कार्य किये, उस महान महिला जैसे इतिहास में दूसरा खोजना संभव नहीं है।  

—– संदर्भ —–

तिरुमाई उषा किरण आत्राम

द्वारा रचित @रावणराज कोयतूर, महाराष्ट्र


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