phadapen
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?कोया वंशीय गोंड समुदाय के गण्डजीव अति प्राचीन काल से ही फड़ापेन शक्ति की उपासना करते आ रहे हैं । इस शक्ति को भिन्न भिन्न संभागों में भिन्न भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है ।

जैसे बैतुल, छिंदवाड़ा और नागपुर क्षेत्र में फड़ापेन,

>सिवनी बालाघाट परिक्षेत्र में सजोरपेन,

>मंडला में बड़ेपेन,

>जबलपुर, शहडोल, सिधी, सगगुजा और छत्तीसगढ़ में बुढालपेन,

>आंधप्रदेश में परसा पेन,

>गढ़चिरोली में हजोर पेन,

>अमरावती परिक्षेत्र में कोरुक पेन,

>छोटा नागपुर परिक्षेत्र में मारांगबुरु पेन,

>संभलपुर क्षेत्र में सिंगा बोंगा पेन,

>खण्डवा खरगोन, झबुआ में भिलोटा पेन आदि नामों से संबोधित कर उसकी उपासना करते हैं । सुंदर मैदान, नदी किनारे, पहाड़ी की चोटी आदि एकान्त स्थल में साजा, महुआ या सरई के पेड़ तले फड़ापेन का देवखरीयान, पेनठाना, पेनकड़ा या सरना स्थल होता है । देवखरीयान में फड़ापेन के सल्लां और गांगरा प्रतीकों के साथ पालो, पुंगार, चाऊर माटया आदि उसका साज सिंगार और बाना होता है ।??

?गोंडी पुनेम दर्शन के अनुसार संपूर्ण संसार की सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन को ही माना गया है । फड़ा, बुढाल, बड़े, सजोर, हजोर, परसा, सरना, भईल, कोरुक, सिंगाबोंगा, मारांगबुरु आदि सभी शब्दों का अर्थ परम और पेन का अर्थ शक्ति होता है । इस तरह फड़ा पेन, बुढाल पेन, फरापेन, बड़े पेन, हजोर पेन, सजोर पेन, परसापेन, भईल पेन, कोरुक पेन, सिंगाबोंगा पेन और मारांगपुरू का अर्थ परमशक्ति होता है ।

परम् शक्ति याने संसार की सर्वोच्च शक्ति, जिसके सल्ला और गांगरा दो प्रतीक होते हैं । सल्ला दाऊ शक्ति का और गांगरा दाई शक्ति का, सल्ला धन शक्ति का और गांगरा ॠण शक्ति का, सल्ला दायाँ शक्ति का और गांगरा बायां शक्ति का, सल्ला समनी शक्ति का और गांगरा उन्मनी शक्ति का, सल्ला शाली शक्ति का और गांगरा गराम शक्ति का, सल्ला आस शक्ति का, और गांगरा चक्र तत्व का प्रतीक है । इन्ही दो तत्त्व शक्तियों की क्रिया प्रक्रिया से संपूर्ण संसार एवं जीव जगत का चक्र निरंतर चलते रहता है ।

?गोंड समुदाय के गण्डजीव जिस फड़ापेन, फरापेन, सजोरपेन, बुढ़ालपेन, सिंगबोंगा पेन, मारांगबुरू पेन, भीलोटापेन, ठाकुरपेन की उपासना सर्वोच्च शक्ति के रूप में करते हैं उसके सल्लां और गांगरा दो प्रतिक होते हैं । सल्लां का प्रतिक लंबाकार और गांगरा का प्रतिक वलयाकार होता है । वलय में बारह गांगरा होते हैं । जो संपूर्ण विश्व मंडल के बारह ग्रह एवं संपूर्ण गोंड समुदाय के बारह सगाओं के द्योतक होते हैं ।

सल्लां का लंबाकार प्रतिक आस तत्त्व का द्योतक होता है । जिस प्रकार विश्व मंडल का हर एक ग्रह अपनी कक्षा में अपनी सल्ला रूपि आस तत्त्व के आधार से परिक्रमा करते है और अपनी गुरूत्वाकर्षण शक्ति के बल पर एक दूसरे से परे किन्तु जुड़े होते हैं, ठीक उसी तरह कोया वंशीय गोंड समुदाय के बारह सगाओं के जीवगण्ड अपने अपने सगा कक्ष में बन्धुभाव से रहते हैं, और विषम सगाओं से पृथक रहकर भी पारी संबंधो से जुड़े होते हैं । गोंडी दर्शन के अनुसार फड़ापेन शक्ति की उपासना याने सम्पूर्ण सम और विषम सगाओं के जन्मदाता शक्ति की उपासना है ।

?फड़ापेन शक्ति के सल्लां और गांगरा ये दो परस्पर विरोधी किन्तु एक दूसरे के पूरक पूना-ऊना (धन-ऋण) गुणसत्वों की क्रिया प्रक्रिया से ही प्रकृति में एकरूपता और नियमबध्दता बनी रहती है । गोंडी पुनेम मान्यता के अनुसार जिस जगत में हम रहते हैं, अनेक प्रकार के क्रिया कलाप एवं व्यवहार करते हैं, जिसका अपने पंचज्ञानेंद्रियों से अनुभूति लेते है, वह जीवजगत सत्य है । जीवित संसार न तो मिथक है और न काल्पनिक है। इस तरह हम ज्ञान की इंद्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं, वैसा ही उसका स्वरूप है।

प्रकृति का चक्र सुत्रबध्द तथा नियमबद्ध रूप से निरंतर चलते रहता है । इसका संबंध फड़ापेन शक्ति के सल्ला गांगरा परस्पर विरोधी किन्तु एक दूसरे के पूरक पूना ऊना गुण सत्वो का आपसी क्रिया प्रक्रिया और उनका कार्य-कारण सम्बन्ध है । कोई भी घटना घटित करना या रोकना किसी के वस में नहीं है । नियति या प्रकृतिक शक्ति जिसे फड़ापेन, मुर्रापेन, बूढ़ापेन या सजोरपेन कहा जाता है, सभी घटनाओं का घटित कर्ता या नियंत्रण कर्ता है । उसे ही गोंडी पुनेम मुठवापोय पहांदी पारी कुपार लिंगों ने जीव जगत का सर्वोच्च प्रजनन शक्ति माना है ।

?गोंडी पुनेम दर्शन के अनुसार प्रकृति यह वस्तुनिष्ठ सत्य है । वह पहले भी थी और भविष्य में भी रहेगी । सत्य का स्वरूप स्वयंसिध्द है । भौतिक जगत का ज्ञान ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से ही होता है । यही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के साधन हैं। मोदूरमोदी (बुध्दिमान) गण्डजीव का कर्तव्य है कि वे अपनी पंच ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से जीवित दुनिया का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करें और अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर इसे लागू करें और तदनुसार व्यवहार करें। बौध्दिक ज्ञान शक्ति से ही प्रकृति के सत्वों का और उनके स्वभाव गुणधर्मों का बोध होता है ।

प्रकृति के सत्त्वों की ज्ञानोपासना याने परसापेन शक्ति के सल्लां गांगरा गुण संस्कारों के क्रिया प्रक्रिया से निर्मित जीव जगत की उपासना करना है । प्रकृति की सर्वोच्च ज्ञान शक्ति की उपासना करना याने जीवगण्ड के दिल में सभी जीव सत्त्वों के प्रति सेवाभाव जाग्रत होना है । इसी सेवाभाव ज्ञानानुभूति को गोंडी पुनेम मुठवापोय पहांदी पारी कुपार लिंगो ने “सुर्वेय पेन्तोल” (सर्वोच्च आनंद) अवस्था माना है । इस अवस्था में बौद्धिक जीवन के मन में लोक सेवा, जीवों की सेवा और निर्जीव तत्वों के प्रति आस्था और सेवा का भाव जागरण होता है। इस अवस्था में आप परम आनंद का अनुभव करते हैं। क्योंकि सगा जन सेवाभाव में ही स्वयं का कल्याण साध्य होता है । यही परसापेन शक्ति उपासना का दार्शनिक स्वरूप है ।

?इस प्रकार उच्च कोटि के दर्शन से परिपूर्ण जो परसापेन शक्ति की ज्ञानोपासना है, वही प्रकृति के गुणसत्तवों से निर्माण होने वाले जीव जगत के प्रति सेवाभावना है । एक ही फड़ापेन या सिंगाबोंगा पेन अधिष्ठान शक्ति के सल्ला और गांगरा यह दो यथार्थ तत्त्व हैं । सल्ला गांगरा, पूना-ऊना, दाऊ-दाई, नर-मादा, दायाँ-बायां, आस-चक्र, समनी-उन्मनी, ये दोनों प्रकार की भाव शक्तियां फड़ापेन शक्ति के दो अंग है ।

जब तक इन दोनों परस्पर विरोधी गुणतत्त्वों का आपस में क्रिया प्रतिक्रिया नहीं होता तब तक नवीनतम गुणतत्त्व प्रादुर्भवित नहीं हो सकता । इसी फड़ापेन शक्ति का ज्ञानानुभव होना याने गण्डजीवों को जीव जगत का यथार्थ ज्ञानानुभूति होना है । इसी ज्ञानानुभूति को गोंडी पुनेम मुठवापोय पहांदी पारी कुपार लिंगो ने बौध्दिक ज्ञान का साक्षात्कार होना कहा है । इसलिए गोंडी पुनेम मुठवा पहांदी पारी कुपार लिंगो ने तत्वज्ञान के ज्ञान दृष्टी से यथार्थ ज्ञान प्रकाश की अनुभूति होती है ऐसा अपने कोया वंशीय गण्डजीवों को मार्गदर्शन किया है । रूपोलंग पहांदी पारी कुपार लिंगो मुठवापोय का गोंडी पुनेम दर्शन प्रकृति और जीव जगत को मिथ्या नहीं मानता । अर्थात् परसापेन रूपि दाऊ दाई शक्ति के क्रिया प्रक्रिया से जो जीव जगत प्रादूर्भवित होता है, वह सत्य है मिथ्या नहीं ।

?गोंडी पुनेम मुठवापोय रूपोलंग पहादी पारी कुपार लिंगो के अनुसार हर एक गण्डजीव का ध्येय “सुर्वय पेन्तोल” अर्थात् परम सुख की प्राप्ति है, जो मून्द शूल मार्ग से प्राप्त हो सकती है । गण्डजीव स्वयंपूर्ण सत्व नहीं होने के कारण वह अकेला जी नहीं सकता । उसे अपने मानसिक, शारीरिक और बौध्दिक सुख शान्ति के लिए प्रकृति के अन्य सभी जीव सत्त्वों पर अवलंबित रहना होता है । प्रकृति के अन्य सत्त्वों की सेवा उसे तभी प्राप्त होती है जब वह स्वयं अन्य जीवों की सेवा करता है । इस प्रकार सर्व की सेवा में ही स्व-सेवा, आत्म-कल्याण अभिप्रेत है, जिसे सुर्वय पेन्तोल कहते हैं। इस प्रकार सर्व सेवा का जागरण परम आनंद या परम कल्याण की प्राप्ति है। इसे ही गोंडी पुनेम मुठवा पोय पहांदी पारी कुपार लिंगो ने “सुर्वेय पेन्तोल” अर्थात सर्व जीव जगत का कल्याण कहा है । गण्डजीवों के सभी अन्य ध्येय इस अंतिम ध्येय से बहुत ही गौण है ।

?गोंडी गण्डजीवों की यह भी मान्यता है कि जब तक गण्डजीव जीवित होता है, तब तक वह वेन रूप में होता है और (जीवन्त) मरने के पश्चात वह पेन रूप होकर प्रकृति में मिल जाता है । इसलिए वे अनादि काल से जन्मे अपने पिता फरापेन सईलांगरा अर्थात् सल्ला गंगरा को शक्ति के रूप में पूजते आ रहे हैं।

?ज्ञात रहे की हम प्रकृति के पंच महाभूतों (धरती, आकाश, जल, वायु और अग्नि) की शक्तियों को ही बड़ादेव कहते है । यह सार्वभौमिक सत्य शक्ति ही बड़ादेव है । यह प्रकृति के सृजनकर्ता एवं संचालक हैं । बड़ादेव जिसे गोण्डवाना (कोया पुनेम) में जिसे सल्ला गांगरा कहते हैं । सल्ला गांगरा अर्थात् नर और मादा । अर्थात् उत्पन्न होने की शक्ति धन और ऋण आयन जो कि उपरोक्त पांच घटकों से बनता है । इन शक्ति के बिना पृथ्वी में किसी भी जीव की उत्पति संभव नहीं है । इसे हजोरपेन, सजोरपेन, फड़ापेन, परसापेन भी कहते हैं ।??

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साभार- गोंडी पुनेम दर्शन, पेज नंबर- 162-68,69,70

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??जय सेवा, जय बड़ादेव, जय गोंडवाना

✍✍जय गोंडवाना कोयतूर सेवा समिति सैलारपुर


गोंडवाना या गोंडी धर्म में 750 का मतलब

रावण मंडावी का भारत में प्रमुख्य स्थान

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