Moti Ravan Kangali
Moti Ravan Kangali

पंजिया दाई के गोंडवाना खंड के कोयामुरी दीप में जन्म लेने वाले गोंड कोयतूर समाज के महान लेखक, विचारक, समाजसेवी, विद्वान, चिन्तक, अर्थशास्त्री, भाषाविद, पुनेमाचार्य डॉ०मोती रावण कंगाली पूरी दुनिया के एक मात्र ऐसे हस्ती थे, जिन्होंने हडप्पा कालीन सैंधवी चित्रात्मक लिपि को गोंडी में पढ़ कर बताये थे । डॉ० कंगाली जी कई भाषाओ के जानकार थे, उन्होंने गोंडी भाषा की पुन : खोज, सवर्धन और विकास में जो भूमिका निभाई वो अतुलनीय है । इस हडप्पा कालीन लिपि के गोंडी में उदवाचन ने पूरे वैश्विक जगत के इतिहास, पुरातत्व धर्म, दर्शन विज्ञान में नए सिरे से ज्ञान का रास्ता खोल दिया गया । इस लिपि के ज्ञान से दुनिया के महान सभ्यता – संस्कृति का ऐतिहासिक पुनर्लेखन का कार्य करने में पुनः मदद मिलेगी । दुनिया के महान इतिहास, संस्कृति इस हडप्पा सभ्यता के केंद्र में दबा है । मूल इतिहास से जुड़े दबे रहस्य से पर्दा उठाने का ठोस कार्य गोंडवाना शोधकर्ता डॉ. मोती रावण कंगाली जी ने किया है । दुनिया भर के इतिहासकार मोहन जोदड़ो – हडप्पा कालीन सांस्कृतिक जीवन को चित्र लिपि में पढने का जी तोड़ प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिल पाया था । जिसे गोंडवाना के लाल ने कोयतूरों की गोंडी भाषा के माध्यम से पढ़कर नए कीर्तिमान स्थापित किए । लेकिन दुर्भाग्य रहा दुनिया के भाषा वैज्ञानिको का ध्यान अपनी इस महत्वपूर्ण खोज की तरफ आकर्षित करने में असफल रहे । आज भी उनकी इस महान उपलब्धि को भारत सरकार साहित्य विश्व के तमाम भाषा वैज्ञानिक कोई तब्बजो नहीं दे रहे है ।

मोती रावण कंगाली का जीवन परिचय:-

1. जन्म व पारिवारिक स्थिति

2. मृत्यु

3. शिक्षा

4. नौकरी

5. साहित्य लेखन में योगदान

6.हड़प्पा लिपि के पढ़ना संभव किया

7. प्रख्यात भाषाविद

8. गोंडसमाज को समर्पित पहला वेबसाइड

9. क्षेत्रीय अध्ययनकर्ता

10. हिन्दू (ब्राह्मणीकरण) का पर्दाफ़ाश

11. पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन

12. आदिवासी अस्मिता के रक्षक

13. नाम बदलाया

14. स्वभाव

15.कचारगढ़ की सांस्कृतिक जात्रा की शुरुआत

16. एकजुट होकर साथ साथ चलने की है जरुरत

17.समाज के प्रति अतुलनीय सेवा भाव

18. उनकी पुस्तके आज लाखो कोइतूरो का कर रही मार्गदर्शन

19.दादा कंगाली चुनावी राजनीति में नहीं आए

20. हमे संकल्प लेना होगा की उनकी मेहनत अकारथ नहीं जाने देगे

जन्म व पारिवारिक स्थिति:-

एम०ए०, एल०एल०बी० तथा पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त डॉक्टर मोतीरावण कंगाली का जन्म 02 फरवरी 1949 को महारष्ट्र (विदर्भ) के नागपुर जिले के रामटेक तहसील में स्थित दुलारा नामक ग्राम के टीरकाजी कंगाली परिवार में हुआ था । पिता का नाम छतीराम और माता जी का नाम रायतार थी । पाँच भाई-बहनों में से मोतीराम सबसे बड़े थे । आपके दो छोटेभाई और दो बहनें भी थीं । दोनों भाई अभी भी गाँव में रहते हैं और खेती-बारी का काम करते हैं । इनकी पत्नी का नाम चित्रलेखा कंगाली है, कंगाली जी के तीन पुत्रियाँ है,बड़ी बेटी में श्रृंखला जो कि (आईएएस) अफसर है, मंझली बेटी वेरूंजली ने भीमराठी साहित्य में एमफिल किया है और वर्तमान में ये नागपुर में रहकर जॉब कर रही है और माँ के कार्यों में हाथ बटाती हैंऔर सबसे छोटी डॉ०विनीती नेत्र विशेषज्ञ चिकित्सक है ।

मृत्यु :-

एक कार्यक्रम में 27 अक्टूबर 2015 को उनका भोपाल आना हुआ और वह कार्यक्रम उनकी जिंदगी का आखिरी कार्यक्रम साबित हुआ। उसके दूसरे दिन शाम को वे हमारे घर पर खाने पर आमंत्रित थे और कोइतूर धर्म-संस्कृति पर उनसे लंबी वार्ता हुई । 28 अक्तूबर 2015 कि सुबह वे भोपाल के गोंड राजा निजाम शाह और रानी कमलापति के गिन्नौर गढ़ किले को देखने गए, जो कि विंध्याचल पहाड़ियों पर काफी ऊंचाई पर है । वहाँ से लौटने पर उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की और उस दर्द की स्थिति में ही कुछ दवाइयाँ खाकर ट्रेन से नागपूर निकल गए । 29 अक्तूबर को वे घर पर ही आराम किए और सबसे बातचीत करते रहे। लेकिन 30 अक्टूबर को सुबह 6 बजे उन्हे सीने मे फिर तकलीफ हुई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया । जहां 30 अक्तूबर 2015 को सुबह 9.30 बजे उनकी मृत्यु हो गयी । आचार्य डॉ०मोती रावण कंगाली की निधन 66 वर्ष की उम्र में ह्रदय घात के कारण हुआ था । डॉ० मोती रावण कंगाली का निधन ने पूरे बौद्धिक जगत में एक शोक की लहर बहा दी । मध्यभारत के कोयतूर समाज के जाने माने महान शख्सियत ने महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में कोयतूरों के बीच रहकर, आदिवासी, बोली-भाषा, लिपि, खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, धार्मिक-आस्था, पर्व-उत्सव या यूं कहा जाए की जन्म से मृत्यु पूरे संस्कार व संस्कृति को साहित्य के माध्यम से रेखांकित किया । कोयतूर समाज को प्रकाशमान करने वाले इस सूर्य का अस्त हो गया । गोंडी विधि विधान से पैत्रिक ग्राम दुलारा में अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुआ ।

शिक्षा :

मोती राम कंगाली की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के पास एक प्राथमिक विद्यालय करवाही में हुई, जहाँ उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। आपकी माध्यमिक शिक्षा (5वीं से 8वीं तक) आंग्ल पूर्व माध्यमिक विद्यालय बोथिया पालोरा से हुई जो आपके गाँव दुलारा से लगभग 18 किलोमीटर दूर था, इसलिए वहीं से हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करना शुरू की । आपने आठवीं की बोर्ड परीक्षा 1966 में उत्तीर्ण की तथा इसके बाद 9वीं की पढ़ाई करने वे रामटेक तहसील गए । उसके बाद नागपुर के हड्स हाई स्कूल में दाखिला लिया और वहीं से वर्ष 1968 में आपने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की । वर्ष 1972 में धरमपेठ महाविद्यालय, नागपुर से स्नातक की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए । अगले कुछ वर्षों में आपने पोस्ट ग्रेजुएट टीचिंग डिपार्टमेंट नागपुर से अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और भाषाशास्त्र में परास्नातक (एमए) परीक्षा उत्तीर्ण की । अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सन 2000 में आपको पीएचडी की उपाधि मिली । जिसका विषय था “द फ़िलासाफिकल बेस ऑफ ट्राइबल कल्चरल वैल्यूज पर्टिकुलरली इन रेस्पेक्ट ऑफ गोंड ट्राइब ऑफ सेंट्रल इंडिया”। इस शोध कार्य को संशोधन कर लिपिबद्ध किया है ।

नौकरी :–

वर्ष 1976 में 27 वर्ष की उम्र में आपका चयन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नागपुर टकसाल में ‘नोट एंड करेंसी’ एक्ज़ामिनर के पद पर हुआ । सेवानिवृत्त होकर भी उन्होंने गोंडवाना को लेकर अपनी कलम चलाई।

साहित्य लेखन में योगदान :

डॉ० मोती रावण कंगाली गोंडी संस्कृति को गोंडी साहित्य के मध्यम से दार्शनिक महत्त्व को रेखांकित करने का अद्भुद काम उन्होंने किया है । उनकी प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तके हैं,

oकोराडीगढ़की तिलका दाई (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1983)

oडोंगरगढ़की बमलाई दाई , (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1983)

oगोंडोंका मूल निवास स्थल (1983 में प्रथम संस्करण पारी कुपार लिंगो प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, दूसरा संस्करण 2011 में चंद्रलेखा कंगाली द्वारा प्रकाशित)

oकुँवाराभीमाल पेन ता इतिहास (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर] 1984)

oगोंडवानाका सांस्कृतिक इतिहास (पारी कुमार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1984 )

oगोंडीश्लोक, गोंडी लिपि परिचय (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर] 1984)

oगोंडीवाणी का पूर्वोतिहास (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर] 1984)

oगोंडीनृत्य का पूर्वेतिहास (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर] 1984)

oकोयाभिड़ी ता गोंड सगा विडार ना कोया पुनेम (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर] 1984)

oगोंडीलम्क पुंदान (पारी कुमार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1989 )

oगोंडी भाषा शब्द कोश भाग 1 (प्रकाशक – चंद्रलेखा कंगाली, 1989)

oगोंडी भाषा शब्द कोश भाग 2 (प्रकाशक – चंद्रलेखा कंगाली, 1989)

oगोंडी भाषा सीखिये (प्रकाशक – चंद्रलेखा कंगाली, 1989)

oकोयापुनेम ता सार (प्रथम संस्करण, 1938, लेखक – रंगेल सिंह भल्लावी, प्रकाशक मंगोल प्रिंटिंग प्रेस, सिवनी। इसका हिंदी अनुवाद 1989 में डॉ. मोतीरावण कंगाली द्वारा इसी शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रकाशक – चंद्रलेखा कंगाली)

oपारीकुपार लिंगो कोया पुनेम दर्शन (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1989, वर्ष 1994 में दूसरा संस्करण चंद्रलेखा कंगाली द्वारा प्रकाशित)

oगोंडी व्याकरण (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 1994)

oगोंडीलिपि परिचय (पारी कुपार लिंगो प्रकाशन, नागपुर, 1991)

oगोंडवानागढ़ दर्शन (प्रकाशक – चंद्रलेखा कंगाली, 1992)

oगोंडवानाकोट दर्शन (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2000)

oसैंधवीलिपि का गोंडी में उदवाचन (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2002)

oमुंडाराहीरो गंगा (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2005)

oतापीनदी की पौराणिक गाथा (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2005)

oवृहतहिन्दी–गोंडी शब्द कोश (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2011)

oचांदागढ़की महाकाली काली कंकाली (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2011)

oबस्तरगढ़ की दांतेवाडीन वेनदाई दंतेश्वरी (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2011)

oमराठी –गोंडी शब्द कोश (प्रकाशक चंद्रलेखा कंगाली, 2012)

oगोंडीव्युत्पत्तिमूलक शब्दकोश (प्रकाशनाधीन)

गोंडी व्युप्तत्तिमूलक शब्दकोश नामक वृहत शब्दकोश पांच खंडों में प्रकाश्य है । गोंड समाज के लिए पहला बेवसाईट इन्होने बनाया, अब देखने वाली बात यह है कि अब इनके कारवां को कौन आगे बढ़ाता है ।

वर्ष 1975 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर आदिम भाषा साहित्य संशोधन मण्डल की नीव डाली । लेकिन इसके पहले ही वे आदिवासी विद्यार्थी संघ नागपुर से वर्ष 1967 में जुड़ गए थे और जब 1976 में सरकारी नौकरी में आए तभी से आदिवासी कर्मचारी संगठन से जुड़ गए ।

वर्ष 1988 में, वह अखिल गोंडवाना गोंडी साहित्य परिषद के महासचिव बने, बाद में पारी कुपार लिंगो प्रकाशन नागपुर के केंद्रीय प्रबंधन समिति के महासचिव भी। बाद में वह अखिल गोंडवाना गोंडी साहित्य परिषद के अध्यक्ष भी रहे।

अन्य विशेषताएँ-

हड़प्पा लिपि के पढ़ना संभव किया :

मोहन जोदड़ो हड़प्पा की लिपि को कोई भी इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता अथक रूप से नहीं पढ़ पाया, लेकिन डॉ० मोती रावन कंगाली ने इसे पूरा कर किया, जिन्होंने गोंडी में चित्रात्मक सैंधवी लिपि को पढ़ा था जिसे दाईं से बाईं ओर पढ़ा गया था। इस तरह दुनिया के प्रथम व्यक्ति बने जिन्होंने इस लिपि को पढ़ा पाए। यह भी दिखाया कि दाईं से बाईं ओर लिखी गई है। इस तरह, इस प्रकार रहस्यमई सभ्यता से पर्दा उठ गया। इसके अलावा, गोंडी में सैंधवी कालीन लिपि की पटकथा पर भी चर्चा की गई थी और इसके बारे में एक किताब भी लिखी गई, जिसे एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है।

प्रख्यात भाषाविद :-

तिरु० मोती रावण कंगाली जी को गोंडी, अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, तुल्लू, तोडा, मालतो, कोलमी आदि भाषाओँ के प्रखर मर्मज्ञ थे । गोंडी भाषा व्याकरण, गोंडी भाषा शब्दकोश दो भागों में लिखा गया है, हिंदी – गोंडी बृहद शब्दकोश और मराठी – गोंडी । 

गोंडसमाज को समर्पित पहला वेबसाइड :–

डॉ० मोती रावण कंगाली ने गोंड कोयतूर जन्म से मृत्यु तक, मृत्यु में पूर्ण कर्मकांड, उनकी आस्था, उत्सव, पंथ, भोजन, पर्व, उत्सव, किसी भी कार्य को करने के तरीके, उपचार के तरीके, गीत, टोटम, कुलपेनता, गोत्र आदि के बारे में जानकारी के लिए (जय सेवा डॉट कॉम) नामक एक वेबसाइट बनाई, जो गोंड समाज से संबंधित सभी पहलुओं पर प्रकाश डालती है, यह वेबसाइट अभी बंद है। जिसमें गोंड के बारे में पूरी जानकारी मिली।  

क्षेत्रीय अध्ययनकर्ता :-

बतौर समाज, मानव व भाषा वैज्ञानिक आपने महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के दुर्गम पहाड़ी, घने जंगलों में सहभागी अवलोकन, साक्षात्कार आदि पहलुओं से प्राथमिक स्रोत से जानकारी एकत्रित कर गहनशोध अध्ययन स्वरुप आदिवासी टोटम, गोत्र,लिपि, आयुर्वेदिक चिकित्सा, खान – पान धार्मिक विधान, बैगा, गायता, पुजारी, पेनठाना (गोंड गोंगो स्थल), उत्सव इस तरह गोंड व इनके और भी उपजातियों पर शोध लेखन किया है ।  

हिन्दू (ब्राह्मणीकरण) का पर्दाफ़ाश:–

डॉ०मोती रावण कंगाली जी ने अपने अध्यन पाया कि किस तरह से आदिवासी आस्था का हिंदुकरण ब्राह्मणीकरण किया जा रहा है और इसका पर्दाफाश किया । बताया जाता है कि बस्तर के दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी आदिवासी समाज की है जिससे आदिवासियों की धार्मिक आस्था जुड़ी है, हर वर्ष यहाँ मेला लगता है, डंकनी और शंखनी नदी मे यह पेनठाना है । आजकल यह हिन्दूकरण ब्राह्मणीकारणकी चपेट मे आकर हिन्दू देवी हो गई है । अब दोनों नवरात्र में ज्योति आदि स्थापित किया जाता है । एक तरह से हिन्दू देवी हो गई है । ठीक इसी तरह से बमलेश्वरी माता को भी कंगाली जी आदिवासी आस्था का केंद्र की बात को प्रमुखता से रखा बाद में आज हिंदुकरण का चपेट मे आ गया । इसी तरह से बहुत से आदिवासी देव गुड़ी, ग्राम गुड़ी, पेनठाना का जमकर हिंदुकरण हुया है, किस तरह से आदिवासी धार्मिक स्थल दुर्गा, हनुमान के रूप ले चुका है उसे प्रमुखता से उठाया है । इस तरह से समाज को जागरूक करने की अग्रसित किए । धार्मिक राजनीतिक को बतलाने का प्रायस किया ।

पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन :

डॉ०मोती रावण कंगाली के लिखित “पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन” यह 21 अध्याय एवं 365 पृष्ठों का ग्रंथ कोया वंशीय गंडजीवों का गोंडी पुनेम दर्शन की अनमोल कृति है । इसमें पाहंदी पारी कुमार लिंगों को कोयवंशी आदिवासियों के प्रथम गुरु बताया गया है । इसके अनुसार आर्यों के आने से पहले पारी कुपार लिंगों ने सबसे पहले लोगों को जगाने का काम किया। किताब में माध्यम से प्रकृति चक्र, जीवन चक्र को वैज्ञानिक रूपि लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखा गया है। जो कि लोगों को प्राकर्तिक से तालमेल पूर्वक जीवन कैसे जीना है, इसके बारे इस किताब मे लिखा गया है । इसमें बताया है कि लिंगो के अनुसार प्राकर्तिक शक्ति ही सर्वोपरि है । लिंगों ने मन को वश में करने का उपदेश दिया है, भौतिक जगत को सत्य माना, पिता और पूर्वजों को शक्ति माना है। लिंगों ने कोयवंशी को सगा, गोठुल, पेनकडा, पुनेम और मुठवा(भुमका) इन पांचों मे सीखने को जाने कहा है । इस तरह लिंगो के उपदेश को बताया गया है ।

आदिवासी अस्मिता के रक्षक:-

लगातार आदिवासी भाषा-बोली, रहन –सहन, धार्मिक पहचान विलुप्त होने कि खतरा सालों से बनी हुई थी । साथ ही लगातार सांस्कृतिक दहन चालू था । ऐसे विषम समय में डॉ०मोतीरावण कंगाली का आदिवासी के अस्मिता जागृत कराने वाला कार्य किया या यूं कहा जाए की इनका जीवन समाज को समर्पित था । जो काम इन्होने किया किसी कोयवंशी गोंड ने अब तक नहीं किया । यह महान कार्य याद किए जाएँगे ।

नाम बदलाया:-

डॉ०मोती रावण कंगाली जी काबचपन का नाम मोतीराम कंगाली था । क्यूंकि राजा रावण को गोंड आदिवासी माना जाता है । लंका के रावण के दक्षता, यश, स्वाभिमान और ज्ञान से परिचित होने के बाद राम को हटाकर रावण कर दिया इस तरह मोती रावण हुआ । यह एक क्रांतिकारी पहल थी । जो कि अपने आप सामाजिक चेतना कि परिचायक है ।

स्वभाव :-

दादा मोती रावण कंगाली ने हमेशा बहुत सादगी भरा जीवन जिया और पुरे समय कोइतूर संस्कृति, परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं पर कार्य करते रहे । जब भीसामाजिक कार्यक्रम चाहे छोटे हो या बड़ा, उचित निवेदन पर हमेशा वहां पहुचते थे । हमेशा मुस्कुराते रहने वाले स्वभाव के कारण लोग उनके दीवाने बन जाते थे । उनकी वाणी में जोश के साथ साथ लोगों को उत्साहित करने का जादू भी था । वे लोगों को सोचने पर मजबूर कर देते थे । उनका मानना था भाषा सीधी और सरल होनी चाहिए जो लोगों के मस्तिष्क पर सीधे सीधे असर कर सके ।

Navratna Hira and Moti
Navratna Hira and Moti

कचारगढ़ की सांस्कृतिक जात्रा की शुरुआत :-

वर्ष 1980 में आचार्य मोती रावण कंगाली के नागपुर आवास पर गोंडवाना बैंक की अवधारणा देने वाले तिरुमाल केशव बानाजी मर्सकोले जी और भोपाल से गोंडवाना दर्शन के संपादक सुन्हेर सिंह ताराम जी थे । तीनों ने कचारगढ़ को कोइतूर गोंडों के धार्मिक स्थान के रूप में चिन्हित किया । इसी क्रम में वर्ष 1984 की माघ पूर्णिमा के दिन तिरु०मोती रावण कंगाली जी, सुन्हेर सिंह ताराम जी, तिरु०हीरा सिंह मरकाम जी, भारत लाल कोराम जी और गोंडवाना मुक्ति सेना के सर सेनापति शीतल कवडू मरकाम जी कुल पांच लोगों ने पहली बार कचारगढ़ गुफा की धार्मिक जात्रा शुरूआत की । यही पाँच लोग टेंट में रहे और पत्रिका गोंडवाना दर्शन में इस यात्रा और मेले का विस्तार में प्रचार किया गया ।

एकजुट होकर साथ साथ चलने की है जरुरत :-

आज कोइतूरों की जो संस्कृति और परंपरा जिंदा नजर आ रही है, वह दादा मोती रावण कंगाली के अथक परिश्रम का नतीजा है । दादा कंगाली ने अपने छोटे से जीवन में जो महान कार्य किया है वह इस कोयापुनेमी संस्कृति और परंपरा को पुनर्जीवित करने में सफल रहें है । अब आने वाली पीढियों और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है की दादा कंगाली द्वारा दी गयी ज्ञानरूपी कोयापुनेमी चिंगारी को हवा दे और उसे एक मशाल के रूप में तब्दील कर दे । दादा कंगाली का मानना था कि किसी एक के पास मशाल होने से काम नहीं चलेगा बल्कि इस कोयापुनेमी चिंगारी से लाखो करोड़ों मशाले बननी होंगी और प्रत्तेक कोइतूर के हाथ में यह मशाल थमानी होगी तभी कोयामूरी द्वीप का अंधेरा दूर हो सकेगा और तभी सारे कोइतूर अपनी मूल सांसकृतिक, सामाजिक और धार्मिक जोड़ों से जुड़ सकेगे ।

समाज के प्रति अतुलनीय सेवा भाव :-

मुंदशूल सर्री, मुंजोक दर्शन और गोतुल दर्शन इत्यादि के बारे ने आम जनमानस तक बातें पहुचाई हैं । उन्होंने कोइतूर समाज की सामाजिक परम्पराओं (जन्म, मृत्तु, शादी के संस्कार), तीज त्योहरों, सांस्कृतिक परम्पराओं ( नृत्य, गायन, वादन) धार्मिक मान्यताओं के बारे में भी खूब लिखा है । गोंडी भाषा के प्रति उनका महान सेवा अतुलनीय है । हमारे कई उच्च शिक्षित भाइयों बहनों को यह सारी बाते समझने में कुछ और समय लग सकता है क्योकि धर्म और संस्कृति सहित इतिहास के आयाम में वे पहली बार नजर दौड़ा रहे है ।

दादा कंगाली ने धर्म, दर्शन, संस्कृति, भाषा, इतिहास, आदि पर अथक परिश्रम किया। गोंड कोयतूरों ने उन्हें सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पहचान दी। सभी कोयतूर जातियों और जनजातियों को अपनी परंपरा, संस्कृति, भाषा, दर्शन और इतिहास के साथ एकजुट हो कर चलने की आवश्यक है। दादा मोती रावण बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक कुशल शिल्पकार, गायक, लेखक, सामाजिक और वक्ता के साथ-साथ एक वैज्ञानिक, दार्शनिक, भाषा, चिन्तक, विचारक, दर्शनशास्त्री इतिहासकार थे।

उनकी पुस्तके आज लाखो कोइतूरो का कर रही मार्गदर्शन :-

कोइतूर संस्कृति का शायद ही ऐसा कोई पहलू होगा जहां पर दादा की निगाह न पहुंची हो । चाहे वो कोयापुनेमी मिथकों की बात हो, कोइतूर इतिहास की बात हो, सामाजिक व्यवस्थाओं की बात हो या कोइतूर जीवन दर्शन की बात हो या अन्य कोयापुनेमी मान्यताओ की बात हो उन्होंने सब पर कुछ न कुछ लिखा और नई पीढ़ी को सौंपा है ।

कोया पुनेम को लिखने का काम किया और अन्य संस्कृतियों के भूसे के ढेर से सुनहरी कोया पुनेम सुई खोज लेना काबिले तारीफ है। अगर आज हम कोयतूर संस्कृति की बात करें तो यह दादा कंगाली जी का महत्वपूर्ण योगदान है।

गोंड गोंडी गोंडवाना की राजनीतिक का महल इसी कोयापुनेमी संस्कृति की भूमि पर निर्मित हो सका है । महान कोइतूर व्यवस्था में और कोया पूनमी दर्शन में सभी मूलनिवासी जनजातियाँ और उनसे निकले हुए अन्य जातियां इसी मूल कोइतूर संस्कृति का अंग है । चाहे वह कोई भी कोयामुरी द्वीप का मानव हो वो सभी कोइतूर ही है, बस आज अपनी जहाँ से हटकर अलग खड़े हुए है । यही कारण है की उनकी पुस्तक इतनी लोकप्रिय है ।

दादा कंगाली चुनावी राजनीति में नहीं आए :-

उन्हें संस्कृति भाषा और इतिहास की राजनीती की बहुत बढ़िया समझ थी । लेकिन तिरु०दादा हीरा सिंह मरकाम जी की तरह वह भी चुनावी राजनीति में नहीं आए । उनका मानना था अगर धर्म दर्शन, संस्कृति, सभ्यता की जड़े मजबूत होगी तो सत्ता की चुनावी राजनीति के फल फूल तो अपने आप आ ही जाएगे । दादा कंगाली जी गोंडवाना आन्दोलन को बहुत ज्यादा गति दी । आज जो भी गोंडवाना का राजनैतिक और सामाजिक आन्दोलन हम सभी को नजर आ रहा है उसकी जड़ों में दादा कंगाली का खून पसीना लगा हुआ है ।

हमे संकल्प लेना होगा की उनकी मेहनत अकारथ नहीं जाने देगे :-

भारतीय रिजर्व बैंक में पदस्थ होने के बावजूद गोंड समाज के लिए जो कार्य किए वह समाज के लिए अफ़ताफ सी चमक है इस चमक से समाज में नई जागृति आएगी । अब जरूरत है इनके कारवां को आगे बढ़ाने की सचमुच मे तिरु०मोतीरावण कंगाली गोंडवाना के युगपुरुष थे और रहेंगे इनके द्वारा किए कार्यों को समाज हमेशा याद करेंगे । साथ ही गोंडवाना की यादों मे यह शख्स उदयमान होते रहेंगे ।

आज के युवाओं को मार्गदर्शन के लिए वो हमेशा आगे रहते थे । हमेशा युवाओं को अपनी संस्कृति सभ्यता और परंपराओ को जानना समझने के लिए प्रेरित करते थे और कहा करते थे जब तक कोइतूर युवा सामने नहीं आएगा तब तक कोयापुनेमी संस्कृति और दर्शन का दुनिया के सामने नहीं स्थापित किया जा सकेगा लेकिन दुर्भाग्य देखिये आज का कोइतूर युवा अपनी सस्कृति की गहरे और सच्चाई तक नहीं पहुच पा रहा है बस दूसरी संस्कृतियों की नक़ल मात्र करके गुलाम होता जा रहा है । अगर हम सभी को मोती रावण कंगाली जी के सपनो को साकार करना है तो सभी को मिलकर कोयापुनेमी संस्कृति, परम्पराओं, रीति रिवाजो, तीज त्योहारों को अपने जीवन में उतरना होगा और कोइतूर भाषा, संस्कृति और धर्म को फिर से खड़ा करना होगा ।

Dr Bali and Moti Ravan Kangali
Dr Bali and Moti Ravan Kangali

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