mangadh hill,mangadh-hill-memorial.jpg
mangadh-hill-memorial

“ओ भुरेतिया नइ मानु रे, नइ मानु”

(ओ अंग्रेजों, हम नहीं झुकेंगे तुम्हारे सामने) शहादत की याद दिलाता यह मानगढ़ धाम। ये वो क्रांतिकारी लोग थे जिन्होनें अंग्रेजो के सामने घुटने नही टेके। मानगढ़ धाम, ऐसा स्मारक है जो गुरुभक्ति और देशभक्ति को एक साथ दर्शाता है। आज भी पंद्रह सौ कोयतूरों की शहादत मानगढ़ पहाड़ी के पत्थरों पर उत्कीर्ण हैं। भीलों ने जिस धूनी को जलाया था, वह आज भी जल रही है। आज शहादत के 107 साल पूरे होने पर अंग्रेजो से लड़ाई लड़ने वाले हजारों शहीदों को सादर नमन। आप सदा हमारे लिए प्रेरणा स्त्रोत रहेंगे।

मानगढ़ नरसंहार जलियाँवाला बाग की तुलना में अधिक बर्बर था।

मानगढ़ धाम 17 नवंबर, 1913 को हुई, मानगढ़ धाम उस घटना का गवाह है। जिसमें अंग्रेजों ने पंद्रह सौ से अधिक कोयतूरों की जान ली थी। लेकिन इसका जिक्र इतिहास में भी नहीं है। क्या इस घटना को नजर अंदाज किया गया क्योंकि इसमें शहीद कोयतूर थे, जबकि जलियांवाला बाग में मारे गए लोग गैर-कोयतूर नहीं थे?

Mangadh Art
Mangadh Art

जलियांवाला बाग कांड से पहले भी, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजस्थान-गुजरात सीमा पर स्थित बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा 1500 से भी अधिक भील कोयतूरों की हत्या दर्ज की गई थी? जिसका इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया गया है? जलियांवाला बाग की घटना को अंग्रेजों ने 13 अप्रैल, 1919 को अंजाम दिया था। लगभग 6 साल पहले, 17 नवंबर, 1913 को राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बांसवाड़ा जिले में, अंग्रेजों ने अपने रिकॉर्ड में केवल 1,500 भील कोयतूरों की हत्या रिकॉर्ड की। लेकिन इतिहासकारों द्वारा इस शहादत को सराहना नहीं दिया गया। उदाहरण के लिए, राजस्थान के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे महज “भील का उत्पात” के रूप में वर्णित किया है

ब्रिटिश शासन से कभी हार नहीं मानी कोयतूरों ने

दक्षिणी राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के बागड़ की मानगढ़ पहाड़ी, कोयतूर अस्मिता और उनके ऐतिहासिक बलिदान का स्मारक है। स्थानीय लोग इसे “मानगढ़ धाम” के नाम से जानते हैं। इस स्थान को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की मांग बार-बार की जाती रही है। यहां तक कि लोकसभा में भी इसके लिए आवाज उठाई गई परंतु नतीजा सिफर रहा।

दरअसल, मानगढ़ गवाह है भील कोयतूरों के अदम्य साहस और अटूट एकता का, जिसके कारण अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पड़े थे। हालांकि यह एकजुटता गोविंद गुरू के नेतृत्व में बनी थी, जो स्वयं लंबाडा (बंजारा समाज) के थे। इसके बावजूद गोविंद गुरू का जीवन भील समुदाय के लिए समर्पित रहा। खास बात यह है कि उनके नेतृत्व में हुए इस ऐतिहासिक विद्रोह के निशाने पर केवल अंग्रेज नहीं थे बल्कि वे स्थानीय रजवाड़े भी थे जिनके जुल्मों-सितम से भील समुदाय के लोग कराह रहे थे।

कोयतूर हर साल बड़ी संख्या में मानग़ढ़ धाम की ओर अपने पुरखो को याद करने आते है।

mangadh hill memorial rajasthan
mangadh hill memorial rajasthan

लंबाड़ा और भील समुदाय के लोगों की बहादुरी के कारण, उन्हें राजवाड़ों और अंग्रेजों द्वारा अपनी सेना में भी शामिल किया गया था। पूंजा भील की छवि, जिसे महाराणा प्रताप ने अपना दाहिना हाथ माना, यहाँ तक कि मेवाड़ के शाही प्रतीक पर भी दर्ज है।

गोविंद गुरु और उनकी सामाजिक चेतना आंदोलन

जब 1857 के सैन्य विद्रोह को एक साल भी नहीं हुआ था। पूरा देश उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। उस समय गोविंद गुरु का जन्म 20 दिसंबर, 1858 को डूंगरपुर से लगभग 23 किलोमीटर दूर, बांसिया गाँव में लंबाडा (बंजारा) नामक गाँव में हुआ था। गोविंद गुरु बचपन से ही एक साधु प्रवृत्ति के थे। लंबाड़ा और भील लोगों पर अत्याचारों से वे घायल हो गए। वे खुद को शोषण और उत्पीड़न से मुक्त करने का रास्ता तलाश रहे थे।

उन्होंने महसूस किया कि जब तक शोषित समुदायों के लोग एक साथ नहीं आयेगे, तब तक कुछ नही हो सकता। इसलिए वे क्षेत्रीय कोयतूरों बसाहटो (बस्तियों) में गए और सबको संगठित करना शुरू कर दिया। वह उन लोगों को संदेश देता था जो रोजाना नहाते हैं, शराब नहीं पीते और चोरी नहीं करते। वह काम को महत्व देते थे और कहते थे कि वे खुद कृषि, मजदूरी करते हैं और म्हणत का खाते है । यह लोगों को बच्चों की शिक्षा के लिए भी प्रेरित करेगा और स्कूलों को खोलने का आह्वान करेगा। उन्होंने रियासतों और उनके द्वारा चलाए जाने वाले न्यायालयों से दूर रहने की बात कही। गोविंदा गुरु लोगों को बहुत सहज तरीके से समझाते थे कि उन्हें न जुल्म करेगे और न जुल्म सहेगे । वह लोगों को अपनी मिट्टी से प्यार करने का संदेश देता था।

कोयतूरों की एकजुटता से हिलने लगी थीं रजवाड़ों की चूलें

उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा से लोग प्रभावित होने लगे और धीरे–धीरे दक्षिणी राजस्थान, गुजरात और मालवा के कोयतूर संगठित होकर एक बड़ी जनशक्ति बन गए। अपने जनाधार को विस्तार देने के लिए गोविंद गुरू ने वर्ष 1883 में “संप सभा” की स्थापना की। भील समुदाय की भाषा में संप का अर्थ होता है – भाईचारा, एकता और प्रेम। संप सभा का पहला अधिवेशन वर्ष 1903 में हुआ।

वास्तव में, गोविंद गुरु देश की अग्रणी आवाज बनने के लिए राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के कोयतूरों को शिक्षित करना चाहते थे। उन्होंने महसूस किया कि भारत की राजनीतिक स्थितियों को समझने के लिए अध्ययन किया पाया की विचार और एक संगठन स्थापना करना आवश्यक है। इससे शोषण और उत्पीड़न से निपटा जा सकता है।

एक ओर, गोविंद गुरु के नेतृत्व में कोयतूर जागरूप हो रहे थे, दूसरी तरफ, देशी, राज्य और इसके संरक्षक, ब्रिटिश सरकार, कोय्तुरों की एकता को खुद के लिए खतरे के रूप में देख रहे थे।

Mangadh Artwork
Mangadh Artwork

सदियों से देशी राजाओं ने भील से जबरन मजदूरी का काम करते थे। वे अब भी भील को भिखारी बनाना चाहते थे। लेकिन भील अब सब जागने गगे थे। उसने बेगारी करने से इनकार कर दिया। गोविंद गुरु के शराब नहीं पीने के आह्वान के कारण शराब के कारोबारी के कारोबार में गतिरोध आया। ब्रिटिश सरकार ने इन शराब दुकानों से बहुत राजस्व प्राप्त होता था, वो बंद हो गया। साहूकारों के दिन भी खत्म हो गए हैं क्योंकि लोगों ने उनसे ब्याज पर पैसा लेना बंद कर दिया है।

कोयतूरों में बढ़ती जागरूकता से देशी रजवाड़े प्रसन्न नहीं थे। उन्हें भय सता रहा था कि जागृत कोयतूर कहीं उनकी रियासतों पर कब्जा न कर लें। दूसरी और सूदखोरों व लालची व्यापारियों ने भी रजवाड़ों पर दबाव बनाया। देशी रजवाड़ों के समर्थन में अंग्रेजी हुकूमत भी कोयतूरों के खिलाफ हो गयी।

अंग्रेजों के सामने रखी गईं 33 मांगें

गोविंद गुरु के नेतृत्व में, कोयतूरों एकजुट हुए और परिवर्तन के पथ पर अग्रसर हुए। 7 दिसंबर, 1908 को, बांसवाड़ा के  जिला मुख्यालय से सत्तर किलोमीटर दूर, आनन्दपुरी के पास, मानगढ़ धाम में वार्षिक समाधि सत्र आयोजित किया जिसमे हजारों लोगों ने भाग लिया। मानगढ़ एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।

भीलों ने 1910 तक अपनी 33 मांगें अंग्रेजों के सामने पेश कीं, जिनमें से मुख्य मांगें ब्रिटिश और स्थानीय रियासतों द्वारा दिए गए बंधुआ मजदूरी, भरी लगान और गुरु के अनुयायियों के उत्पीड़न से संबंधित था। गोविंद गुरु के नेतृत्व में भील संघर्ष ने एक निर्णायक मोड़ लिया जब ब्रिटिश और रजवाड़ों ने इन मांगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और भगत आंदोलन को तोड़ दिया।

नरसंहार से एक महीने पहले हजारों भीलों ने मानगढ़ पहाड़ी पर कब्जा कर लिया था, विशेषकर बंधुआ मजदूर व्यवस्था को खत्म नहीं करने की मांगें खारिज होने के बाद। अंग्रेजों से अपनी आजादी की घोषणा की, अंग्रेजों ने अंतिम चाल चली, उन्होंने पेशकश की वार्षिक हल के लिए साढ़े चार रुपये करेगे, लेकिन भील ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

सन 1913 में गाेविंद गुरू के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कोयतूर मानगढ़ में जुटे। वे अपने साथ राशनपानी भी लाए थे। उनके विरोधियों ने यह अफ़वाह फैला दी कि आदिवासी रियासतों पर कब्जा करने की तैयारी में जुटे हैं।

थाने पर हमला और इंस्‍पेक्‍टर की मौत और किले में बदल गया मानगढ़ हिल

अंग्रेजों को उकसाने की पहली कार्यवाही संतरामपुर के पास, मानगढ़ के करीब, जो गुरु के दाहिने हाथ, पुंजा धिरजी पारघी, और उनके समर्थकों द्वारा पुलिस स्टेशन पर हमले के रूप में हुई। इसमें इंस्पेक्टर गुल मोहम्मद की मौत हो गई। इस घटना के बाद, बांसवाड़ा, संतरामपुर, डूंगरपुर और कुशलगढ़ की रियासतों में, गुरु और उनके समर्थकों का जोर बढ़ता ही गया , जिससे ब्रिटिश और स्थानीय रजवाड़ों को लगा कि इस आंदोलन को अब कुचलना होगा।

भीलों को अंतिम चेतावनी मानगढ़ छोड़ने के लिए मिली, जिसकी समय सीमा 15 नवंबर, 1913 थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। भील ने मानगढ़ हिल को एक किले में बदल दिया था, जिसके भीतर स्वदेशी तोपें और तलवारें जमा थीं और उन्होंने ब्रिटिश सेनिको का सामना किया।

जब अंग्रेजों ने पंद्रह सौ से अधिक कोयतूरों की जान ले ली

उस समय गुजरात बंबई राज्य के अधीन था। बॉम्बे स्टेट आर्मी अधिकारी 10 नवंबर, 1913 को अंग्रेजी सेना के साथ पहाड़ी के पास पहुंचे। सशस्त्र भीलों ने आयुक्त के साथ मिलकर सेना को जबरन वापस कर दिया। सेना पहाड़ी से थोड़ी दूरी पर ठहर गयी।

12 नवंबर, 1913 को भील का एक प्रतिनिधि पहाड़ी से नीचे आया और भील से सेना प्रमुख की मांग का पत्र प्रस्तुत किया, लेकिन बात नहीं बन सकी। समझोता न होने पर डूंगरपुर और बांसवाड़ा की रजवाडो ने अहमदाबाद के आयुक्त को सूचित किया कि अगर जल्द ही “सम्प सभा” के भीलों को दबाया नहीं गया, तो वे अपनी रियासत को लूट लेंगे और अपनी रियासतों को ऊंचा करेंगे, जिससे मुश्किलें बढ़ेंगी। अंग्रेज अधिकारियों सावधान हो गए। वे भीलवाड़ा के मुकदमे से अवगत थे। इसलिए, तुरंत कार्रवाई करते हुए, उन्होंने मेवाड़ छावनी से सेना को बुलाया।

यह सेना 17 नवंबर, 1913 को मानगढ़ पहुंची और वहां पहुंचते ही गोलीबारी शुरू कर दी। एक के बाद एक कुल पंद्रह सौ लाशें गिरीं। गोविंद गुरु के पैर में गोली लगी । वे वहीं गिर गए। उसे गिरफ्तार किया गया था। उन पर  मुकदमे भी चलाये गये और उसे मौत की सजा सुनाई गई। हालाँकि, बाद में फांसी को आजीवन कारावास बना दिया गया।

1923 में उनके अच्छे शिष्टाचार के कारण उन्हें छोड़ दिया गया। अपनी रिहाई के बाद, वह गुजरात के पंचमहल जिले के कंबाई गांव चले गए। वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक लोक कल्याण कार्यों में शामिल रहे। 1931 में उनकी मृत्यु हो गई। आज भी, पंद्रह सौ कोय्तुरों की शहादत को मानगढ पर्वत की पत्थरों पर उकेरा गया है। नरसंहार से इतना भय पैदा किया कि आजादी के कई दशकों बाद भी भील ने मानगढ जाने से परहेज नहीं किया। भीलों द्वारा जलाया जाने वाला धूनी आज भी जल रहा है।

गोविंद गुरु और मानगढ़ हत्याकांड भीलों की स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। बावजूद इसके राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसे बांसवाड़ा-पंचमहाल के सुदूर अंचल में दफन यह ऐतिहासिक त्रासदी भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में एक फुटनोट से ज्यादा की जगह नहीं पाती। वाघेला कहते हैं “सरकार को न सिर्फ मानगढ़ नरसंहार पर बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ उभरे ऐसे ही कोयतूर संघर्षों पर बड़े अनुसंधान के लिए अनुदान देना चाहिए। कोयतूरों के जलियांवाला बाग हत्याकांड के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों?”

जोहार

जय कोयतूर


पेरियार इरोड वेंकटप्पा नायकर रामास्वामी

हल्दी बाई भील राजस्थान | Haldibai Bhil

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here