सरदार गंजन सिंह कोरकू का जन्म बरेली पार गाँव में हुआ था। उनके पिता श्री सुखराम कोरकू थे जो उस क्षेत्र के जाने माने सम्पन्न किसान थे, जिनके पास 52 एकड़ जमीन थी उनकी गिनती आसपास के गाँवों में बड़े किसान के रुप में होती थी। गंजन सिंह के एक भाई गर्जन सिंह थे और दो बहिनें रमको बाई, झमको बाई थीं दोनों ही बरेली पार से 30 कि. मी. दूर बंजारीढाल गाँव में ब्याही गई थीं।

बैतूल जिले के इतिहास में इसी गाँव के नाम से 1930 का “जंगल सत्याग्रह” जाना जाता है, जिसे बंजारीढाल जंगल सत्याग्रह कहते हैं। गंजन सिंह अपनी बहिनों की ससुराल अक्सर आया-जाया करते थे। गंजन सिंह घुम्मकड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जो वनों और जनजाति गाँव में लगातार भ्रमण करते रहते थे जिसके कारण उनका सम्पर्क सभी प्रकार के लोगों से था।

अंग्रेजी सरकार द्वारा षडयंत्रपूर्वक लागू किये गये इंडियन फारेस्ट ऐक्ट जो जंगलों से जनजाति समाज को बाहर कर जनजाति अधिकारों के हनन के लिए था। गुलामी का यही दर्द गंजन सिंह को परेशान किये हुए था।

Ganjan-Singh-Korku
Ganjan-Singh-Korku

1 अगस्त 1930 के बैतूल में जंगल सत्याग्रह का आगाज हुआ तो गंजन सिंह भी इस आंदोलन में कूद पड़े। 22 अगस्त 1930 को गंजन सिंह कोरकू ने बंजारीढाल और सातलदेही के बीच सत्याग्रहियों की बड़ी सभा को संबोधित किया जिसमें 500 से अधिक जनजाति थे। इस सभा को शाहपुर अंग्रेजी पुलिस ने तितर-बितर कर गंजन कोरकू को गिरफ्तार करने की कोशिश की तो जन समूह उग्र हो उठा और अंग्रेज़ी पुलिस के सिपाहियों को पीट-पीटकर भगा दिया। जिसमें पुलिस के कई सिपाहियों को गंभीर चोटें आईं जिन्हें बैलगाड़ियों से शाहपुर पहुँचाया गया।

दूसरे दिन बैतूल पुलिस अधीक्षक लाईटन वहाँ अतिरिक्त बल लेकर पहुँचा तो वहाँ 800 से अधिक आंदोलनकारी एकत्रित थे जिनसे अंग्रेजी पुलिस की पुनः मुठभेड़ हुई। इन आंदोलनकारियों के नेता गंजन सिंह कोरकू थे। लोहारी नदी के किनारे हुए बंजारीढाल जंगल सत्याग्रह के दौरान अंग्रेज़ी पुलिस और आंदोलनकारियों में भीषण संघर्ष हुआ। गंजन सिंह की बहिन रमको बाई ने एक सिपाही को हंसिये के वार से घायल कर दिया था जिसकी बाद में मृत्यु हो गई थी। काफी संख्या में सिपाही घायल हुए जिन्हें देखकर पुलिस अधिकारी बौखला उठे थे। जिला पुलिस अधीक्षक लाईटन के भारी पुलिस बल प्रयोग के बाद भी इस आंदोलन को दबाया नहीं जा सका। ब्रिटिश सरकार को मजबूर होकर नागपुर से सेना की टुकड़ी बुलाना पड़ी।

जब सेना आई तो सैकड़ों जनजातियों के साथ गंजनसिंह पहाड़ पर चढ़ गये। क्योंकि कि ब्रिटिश हुकूमत ने सरदार गंजनसिंह को देखते ही गोली मारने के आदेश दिया था। पहाड़ के नीचे अंग्रेज पुलिस और सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ऊपर से क्रांतिकारी जनजाति गोफन चला रहे थे। दो दिन तक यह संघर्ष चलता रहा जिसमें कोवा गोंड शहीद हो गये और बूचा कोरकू की जांघ में गोली लगने से वे घायल हो गये उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, पर पुलिस और सेना गंजन सिंह का बाल भी बांका नहीं कर सकी।

बंजारीढाल जंगल सत्याग्रह के एक माह बाद पचमढ़ी की अंग्रेज पुलिस द्वारा गंजनसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें रात भर पचमढ़ी में रखा और सुबह इटारसी लाया गया। इटारसी रेलवे स्टेशन पर लोगों के हुजूम ने फूल वर्षा कर सरदार गंजन सिंह कोरकू का भारी उत्साह से स्वागत किया।

“गंजनसिंह – जिंदाबाद” के नारों से आसमान गूंज उठा था। हाथ में हथकड़ी और पैर में बेड़ियों से जकड़कर सरदार गंजन सिंह को जब इटारसी से बैतूल जेल ले जाया गया तो उन्हें देखने के लिए कई अंग्रेज अफसर भी जेल पहुँचे। जेल की बैरक में उन्हें अलग रखा गया। बैतूल जेल में तीन दिन रखने के बाद उन्हें पाँच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाकर रायपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। रायपुर कारागार के समय उनकी भेंट उस समय जेल में बंद अन्य राजनैतिक कैदियों से हुई, वहीं उन्होंने हिंदी व थोड़ी बहुत अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की। 30 महीने जेल की सजा काटने के बाद वे रिहा हो गये।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने महेंद्रवाड़ी के क्रांतिकारी सरदार विष्णु सिंह उइके के साथ मिलकर आंदोलन को गति दी। वे तब तक संघर्ष करते रहे जब तक देश आजाद नहीं हुआ। आजादी की घोषणा होते ही वे सरदार विष्णु सिंह गोंड और मोहकम सिंह गोंड के साथ हाथ में तिरंगा लेकर गाँव-गाँव आजादी का संदेश पहुँचाने में जुट गये।

आजादी के बाद इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की सरकार व समाज ने कोई सुध नहीं ली। उन्हें अपने जीवनयापन के लिए ईंट भट्टे पर का करना पड़ा यह बड़े ही अफसोस की बात है ।

1963 में इनकी मृत्यु हो गई। गाँव फुलवरिया के पास जिस ईंट भट्टे पर वो काम करते थे वहीं उन्होंने अंतिम साँस ली। हमारी सरकार से माँग है कि इनकी एक प्रतिमा बनाई जाये व इटारसी जंक्शन का नाम बदलकर सरकार गंजन सिंह कोरकू इटारसी किया जाये।

जोहार🍃

जय गोंडवाना

साभार – सतपुड़ा के गुमनाम शहीद


कोयतूर सभ्यता का विकास क्रम

डोंगरताल का गोंडवाना इतिहास तहसील-रामटेक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here