Kunvara-bhimal-pen-lingo
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“येर गटटा कोर गुन्डुर / बय्यर लांजी” इस जगह के कोयतूर गोंड राजा “सयमाल” ये वहां के राजा (गुन्डूर मुर्सेनाल्र) तथा इनकी रानी “झमिया” थी ये मडावी घराना येडवेंन सगा से थे । इनका पुत्र “भूरा मडावी” थे इन्हें भूरा भगत भी कहा जाता है । पेंगुदा बेदुला स्थान के ढोलापुयार उइका राजा की पुन्गार, मियाड(सुपुत्री) “कोतमा उइका” थी ।

भूरा मडावी (नांगा बयगा) (७पेन) तथा कोतमा (नांगा बयगिन) उइका (६पेन) ये दोनों की मडमींग (शादी) हो गई । इन दोनो के 12 छाव्वांग (बच्चे) हुए ।  

**पहला पुत्र**

भिमाल/ कुवरा भीमा/ भीमाल मडावी/ भीमा लिंगो/ खिला मुठ्वाभीमा/ वड़ी कुसार सय्वारी भीमा/ मुठ्वा पोय/ सरेका मर्री/ कय्वारी भीमा/ बीलअम्बाल/ जल पेनता/ तंद्री पोय/ भीम पाड़ा/ भूमिया पेन/ नार्सेन/ मेंढा पेन इत्यादि नामो से पहचाना जाता है ।   भीमल की पारंगत कला: कुष्ठी/ कमठा/ कायठु/ मुष्टि/ बंड्या/ कसरत/ तंद्री मोद/ जोग/ बय्गा मोद/ इत्यादि ।  

**दूसरे भाई**

जाटबा/ ठाकुर पेन (जाटवा) है । माना जाता है की ठाकुर पेन जल, भूमि उर्वरा परीक्षण, बीज परीक्षण, कीट पतंगी गुण-धर्म के ज्ञाता थे, जिन्होंने गाँव के मानव समुदाये को फसलों के जीवन चक्र को जानकर अधिक भोजन और धन प्राप्त करने का तरीका बताया । इसलिए ग्राम पेनी पेनताओं की मान्यता अनुसार बिदरी मनाकर बीज सूत्र / बोए जाने वाले अन्न बीज का अंश चढाकर बीज की रक्षा, फसलों की कीट-पतंगों से भूमि उर्वरा, रक्षा, जल, हवा, सान्द्रता / समन्वय आदि प्रकृतिगत वैधानिक रक्षा की कामना पूर्ति के लिए कृषि ग्राम जीवन में ठाकुर पेन की पूजा की जाती है । ठाकुर पेन की स्थापना भी आम, जामुन, महुआ, नीम आदि मान्य पेड़ों पर ही प्रकृतिगत सांस्कारिक विधानपूर्वक किया जाता है, यह ग्राम का ठाकुर और ग्राम पेनों मे प्रमुख है ।

KUNWARA-BHIVSEN-ENTRY-GATE
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**तीसरे भाई हिरबा तथा चोंथे भाई केश्बा**

ग्राम जीवन में गोंडवाना के जीवन निर्वाह के साथी भैंस, पशु-पक्षी, बैल, भेड़, गाय, बकरी, कुकरी-मुर्गी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । बैलों के माध्यम से कृषि कार्य किए जाते हैं तथा भेड़, गाय, भैंस, बकरी से दूध उत्पादन किया जाता है । परिवार समृद्ध की पशुओं से परिपूर्ण होती है, ये मानव सहयोगी पशु-पक्षी धन के प्रतीक माने जाते हैं । इन्हें चारागाह में ले जाने के पूर्व ग्राम के किनारे या बीचों-बीच निर्धारित एक सामूहिक गौठान में रखा जाता है । इसी सामूहिक गौठान के पास ही इन्हे की स्थापना की जाती है, जो पशु-पक्षियों की प्रकृति के जानकार, वैधक और संरक्षक कार्य से परिपूर्ण था ।

इन्होंने आदिम मानव को पशुओं की प्रकृति, व्यावहारिक एवं संरक्षण जीवन में उनकी उपयोगिता का ज्ञान प्रदान कर जीवन में समृद्धि प्राप्त करने का संदेश दिया । इस आधार पर खीला मुठवा ग्राम पशुओं के संरक्षक, जंगली जानवरों, रोग-दोष से मुक्ति, कीट-पतंगों से सुरक्षा, कृषि कार्यों में उपयोग में लाई जाने वाली औजारों का निर्माण एवं सुरक्षा करने वाला पेन माना जाता है । इसलिए इन्हें ग्राम के शमूहिक गौठान के पास ही स्थापित किया जाता है, इन्हें भी किसी विशाल नीम, वृक्ष-सेमल, महुआ, आदि में (मान्यता अनुसार) स्थापित किया जाता है ।  

**पाचवे भाई बाना तथा छटवे भाई भाजी**

पेन जो गाँव की सरहद में रहकर 10 दिशाओं से रक्षा करता है। उपरोक्त 5 भाईयों में से प्रथम महाबली/शक्तिशाली, बादल, हवा, पानी, बिजली, तूफान, तंत्र-मंत्र, वर्षा, प्रकृति के जानकार, झाड़ा-फूँका, वैध्य कला में पारंगत, मढ़िया के रखवाला “भिमाल पेन” है । इन्हे “नार” भी कहा जाता है, जो गांव की सरहद का रखवाला ‘संरक्षक पेन’ या “नारसेन” भी कहा जाता हैं। इसे ग्राम की सरहद पर स्थित चट्टान, पेड़, पत्थर आदि में स्थापित किया जाता है, माना जाता है की नारसेन पेन ग्राम की दशों दिशाओं की सरहद से ग्राम में प्रवेश करने वाले विपत्तियों को रोकने की क्षमता इन्ही में है ।

इसलिए वह अपने भाई-बहनों (ग्राम पेनी पेनताओं) तथा ग्रामजनों की सरहद में रहकर हर मुसीबत से रक्षा करने वाला पेन माना जाता है । कुंआरा भिमाल सबसे बड़े पुत्र / भाई के रूप मे स्थापित हुए, इनके अलावा शेष भाई-बहन भी ग्रामसेवा, जनसेवा में ग्राम के अनेक तरिया, खूट, ठानों, पाट, ताल, पनघट, खेत-खानिहाल में मान्यता अनुसार विराजमान हैं, जो आगे शोध का विषय है । क्षेत्रीय बोली-भाषा के आधार पर इन ग्राम पेनी-पेनताओं के नाम के उच्चारण में अपभ्रंस हो सकता है ।  

*सातवे भाई*

मोकाशा: मोकाशा खॆति प्रणाली में पारंगत हो गए और वे कृषि प्रणाली के गुरु (मुठ्वा) बने और गोंडवाना को कृषि प्रणाली सिखाई। मोकाशा पेन का कार्य आगे बड़ाने वाले गोंडवाना के गन मोकाशी गन कहलाये । आज भी खेतो मे मोकाशा पेन की स्थापना की रहती है । खेती के पहली फसल का मान उन्हे ही चड़ता है ।  

**आठवी तथा नववी दाई**

पंढरीदाई और पुंगार दाई : इन्हें “येर पोंग्सी हे (धान को पानी पहुचने वाली) दाई और “दाना पिन्ड्सी हे दाई” (धान फलाने वाली) इन दोनों दाई ने दान्य(धान) कोठारो का निर्माण किया। गांव मे सब अपने दान(धान) कोठारो जमा करते थे और एक दुसरे को मद्दत करते थे ।

**दस और ग्यारवी दाई***

मुन्गुररदाई तथा कुषारदाई: इन्हें शिवा-रिल के नाम से लोग जानते है । प्रकृति की होने वाली मार (धुप, तूफ़ान, बारिश) इत्यादियो से बचाव के लिए पुनाराभास के शक्ति जगाने वाली दाई कह के इन्हें पूजा जाता है ।  

Bhimal-Pen
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**बारावि दाई**

सुबसे छोटी बहन वेद्द दाई / बेगल दाई / चुडूरर दाई / माता माय / शीतला दाई / खेरा दाई / नारुंग बेगा इत्यादि नामो से इन्हें जाना जाता है । बेगा दाई (doctor) अर्थात वे वैद कला में पारंगत हुई और वे वैद गुरु (बेगा मुठ्वा) बनी उन्होंने इस प्रकार अपनी सेवा गोंडवाना को दी गोंडवाना सगाजन (लोग), जिसने बैग दाई के काम को अंजाम दिया, उन्ही के नाम से जाना जाने लगा। अर्थात “बैगा गोंड”, बैग दाई (शीतला दाई) का हर एक गाव के सीमा पेनठाना (मंदिर) रहता है ।

भिमालपेन की संछिप्त गाथा :

नागपुर जिले के पारशिवानी तालुके का महत्वपूर्ण स्थान जहाँ कुंवारा भीमसेन यनी कुंवार भीमालपेन का पेनठाना है, यह गोंडवाना पेनस्थल है, हर साल चैत्र के महीने में पूरे क्षेत्र के लोग इस पेनठाना में आते है। कई साल पहले, वर्तमान मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले पर मोहमभटटा राज्य के राजा सयमाल मडावी का शासन था। उनकी रानी का नाम झमया था। उनका भूरा भगत नाम का एक बेटा था। यह बेटा बहुत बहादुर था और उसे जंगल में जाकर जानवर का शिकार करना पसंद था।

एक दिन, भूरा भगत बैहर जंगल में शिकार करने गए, जिसे आज हम काना किसली राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश के नाम से जानते हैं। उसी दिन उसी राज्य के राजा ढोला उइका अपनी पुत्री कोतमा के साथ उसी वन में आए। लेकिन संजोग से भुरा भगत और कोतमा ने अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश में एक तालाब के किनारे खुद को पाया। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो बहुत खुश हुए। फिर इधर-उधर की बातें करने लगे। कोतमा के पिता ढोला उईका वहां संजोग आए थे और उन्होंने भूरा भगत को देखा।

भूरा की सुंदरता को देखकर ढोला के मन में अपनी लड़की की शादी की कल्पना जाग उठी। उसने भूरा से उनकी लड़की से शादी करने को कहा। शादी की बात हुई फिर शादी हुआ। कोतमा गर्भवती हुई। एक दिन सास ‘झमया’ ने कहा, “मुझे जंगल में जाकर कुछ खाना है”। उसी दिन चैत्र मास में कोतमा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम भीम रखा गया। भूरा भगत और कोतमा पूरे राज्य में जश्न मनाया ।

भीम ने केवल पाँचवें वर्ष अपनी शिक्षा के लिए गोटूल में प्रवेश किया। उस समय गोतुल के अध्यक्ष अर्थात मुर्सेनाल ‘माहारू उइका’ थे। वे भीम के गुरु बने। भीम के बाद भूरा भगत और कोतमा के कुल 11 बच्चे हुईं, जिनमें 6 भाई और 5 बहनें शामिल हैं। भीमा के साथ मुकोशा, बाना, जाटबा, हिरबा, भाजी, केशबा इन भाइयो और कुशार, पन्ढरी, खेरदाई, पुन्गार, और मुगुर इन बहनो का समावेश था ।

भीम अलौकिक शक्ति के व्यक्ति थे। धर्मकरण, तीरंदाजी, लाठी, मुष्टी, जंदरी, राजकरण, समाजकरण, योग, मल्ल, तंदरी आदि कला के वे उस्ताद थे। भूरा भगत की बहन और बहनोई, राजा आशीर्वाद लोहडीगुडा ‘सेवता उइका’ की दो जुड़वां बेटियां थीं। जिनके नाम बम्बलाई और तिलकाई था। क्योंकि भीम सभी ज्ञान के स्वामी थे, उन्होंने गोंडी मुठवा का दर्जा प्राप्त किया था। इतिहासकारों के अनुसार भीम चौथे पुरुष गोन्डी धर्मगुरू थे।

KUNWARA-BHIVSEN
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जब भीम की शादी का समय आया, तो भीम की चाची, रानी मानको और राजा ‘सेवाता उइका’ ने भीम के लिए भगत और दाई कोतमा से वादा किया कि वे अपनी सबसे बड़ी बेटी की शादी भीम के साथ करेंगे। लेकिन भीम समाज सेवा में रस गए थे, उन्होंने न कर दिया। सेवता और मानको ने भीम को मनाने के बारे में सोचा। फिर भीम ने हां कहा, लेकिन कुछ शर्तें के साथ। सेवता और मानको ने बम्बलाई को यह बात बताई, तो वह बहुत खुश हुई।

जब भीम बम्बलाई से मिलने के लिए बेन्दुला पहुंचे, तो बम्बलाई और तिलकाई दोनों उसे देखकर मंत्रमुक्द हो गए। दोनों ने शादी का प्रस्ताव रखा और भीम ने अपनी शर्त रखी। भीम ने शर्त में बम्बलाई और तिलकाई को बताया कि दिन में चार पहर होते हैं। पहला सुबह जो परसापेन के लिए होता है, दूसरी गुरु के लिए, तीसरी माता-पिता के लिए और चौथी पत्नी के लिए होती है। यदि आप मेरी पत्नी बनना चाहते हैं, तो यहां से चले जाने के बाद पत्नी का पहर ख़त्म होने से पहले, यानी सुबह, मुर्गा बाग देने से पहले, एक दिन, एक महीने या एक साल में मुझे धुंड लेते हो, तो मैं आपका हो जाऊंगा, नहीं मै कुँवारा रहुगा और आप भी कुवारी रहेगी।

दोनों बहनों ने यह शर्त मान ली और आराम करने चली गईं। तभी सभी को सोते हुए देख भीम भोर(सुबह) से पहले निकल गए। भीम पहले डोंगरगढ़ पहुंचे, जहां पहाड़ी के नीचे फड़ापेन थाना है। वहां से अपने गुरु ‘मुठव महारु उइका’ के दर्शन करने निकले। सड़क पर जो भी गावं दिखाई देता है, वह गोंडी धर्म और संस्कृति की शिक्षा देते जाते थे। इस बीच दोनों बहनें अपने माता-पिता को बताकर भीम की खोज में निकलीं। भीम की तलाश में दोनों बहनें डोंगरगढ़ फड़ापेन थाने पहुंचीं तो पता चला कि भीम गुरुदर्शन गए थे।

जब बम्बलाई थक गई तो उसने भीम की खोज में अपनी बहन तिलकाई को आगे भेज दिया और बम्बलाई वही रुकी। बम्बलाई जिस स्थान पर ठहरी थी वह आज डोंगरगढ़ के बम्बलाई के नाम से देश में प्रसिद्ध है। तिलकाई महारु भुमका से गोटुल गयी। तब तक भीमा नान्दपुर राज्य में पहुंच चुके थे। भीम समझ गए कि तिलकाई उनका पीछा कर रहे हैं। उसने मार्ग बदला और एक पहाड़ी पर ध्यान किया। तिलकई आगे निकल गई । क्योंकि भीम कई दिनों से घर नहीं लौटा तो पुरा परिवार उसकी तलाश में निकल पड़ा, उनकी तलाश व्यर्थ हुई। वह समझ गए थे कि भीमा ने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित कर दिया है।

आज वर्त्तमान में यही कार्य हमे भी करना है । भीमा के परिवार ने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया । उस वक्त पूरे परिवार ने अपने अपने क्षेत्र मे योगदान दिया । जाटबा और हिरबा जलतद्न्य थे उन्होने सिचाई मे योगदान दिया । किशो और बाना क्रुशितद्न्य थे, भाजी और मुकोशा वास्तूतद्न्य थे उन्होने रास्ते बनाये । पन्ढरी और पुन्गार ने समाजकार्य किया और जन्गो रायताड़ की कल्पना को साकार किया । मुन्गुर तथा कुशार ने नगर रचना एवं ग्राम बसाये, खेरदाई शितलामाता तथा बैगामाता के नाम से भी जानी जाति है उसने वैद्यकशास्त्र प्रगल्भ किया ।

राजा भुरा और कोतमा भी लिन्गो की मार्गदर्शन से समाजसेवा मे जुट गये । इधर भीमा नान्दपुर के एक पाहाडी पर ध्यानस्त हुए । नान्दपुड़ के राजा उइका गोत्र के थे, बेदालझरी, चिखलखारी, नागलवारी, नान्दापार, कोलितसार, मरकाबार, वजरकुन्ड़, बोरबेड़, नवेनार परिसड़ नान्दपुर राज्य मे समाविश्ट था । एक दिन राजा उइका के राजवाडे (घर) मे चोरी हुई ।

राजा ने शिपाईयो को फर्मान छोडा की चोर को ढूंढते-ढूंढते सिपाही थक जाते और रोज राजा की डान्ट पड़ती थी । एक दिन सिपाहीयो ने शक्कल लढाई और ध्यानस्त भीमा को ही राजा के सामने पेश किया । पुछताछ हुई किंतु भीमा कुछ नही बोले । तंग आकर राजा ने भीमा को जेल मे डाला । जेल मे डालने के बाद भी भीमा कुछ दिन बाद बाहर आ जाते और लोगो को बाहर घूमते दिखते थे । फिर सिपाही उन्हें जेल में डाल ते और वह बाहर घूमते दिखते थे, ऐसा कई बार हुआ । अखिर राजा ने अपनी हाथो से भीमा को जेल मे डाला । फिर वही हुआ, भीमा फ़िर बाहर आ गए ।

राजा ने प्रणाम किया क्योकी राजा समज चुके थे ये कोई साधारण व्यक्ति नही महापुरुष है । उईका राजा की इकलौती लड़की कजलादाई जो काफ़ी दिनो से अपने पिता के घर आयी हुई थी और पुत्र प्राप्ति ना होने के कारण काफ़ी चिंतित थी । कजला की शादि कुरन्ग मसराम नामक राजा से हुई थी । कजला ने भीमा से प्रणाम कर पुत्र प्राप्ति का अन्सदान माँगा । आशीर्वाद देने के बाद भीमा अपने पूर्व स्थान पर ध्यानस्त होने निकल पडे । कुछ दिन बाद कजला गर्भवती हुई । उसे विश्वास हुवा की भीमा के अन्सदान से ही मुझे खुशिया प्राप्त हुई । वह भीमा के दर्शन हेतु रोज गढ (पहाड़) पर जाति रहि । उसके पिता राजा उईका को चिंता होती थी की राज कन्या इस अवस्था मे जाती है तो उसे बहुत तकलीफ़ होती होंगी ।

राजा उइका ने कजला के लिए वही पहाडी के नीचे भव्य विश्रामग्रुह बनाया । ये कजला महल आज भी जिर्ण अवस्था मे पानी मे डुबा हुवा उपस्थित है । जिसे आज रानी महल कहा जाता है । दिन बितते गये, रानी के प्रसुती के दिन नजदिक आते गये । रानी गड़पर नही चढ पाती थी । उसने भीमा से कहा “हे भिमालपेन अब मुझसे गढ नही चढा जायेगा मुझे दर्शन देने आप स्वयं नीचे आये” भीमा ने बिनती सुविकार की . . . किंतु दो शर्ते रखी. . .एक रानी जिस रास्ते से गढ (पहाड़) पर आयी थी, जाते वक्त उस रास्ते से वापिस ना जाये और दूसरी जब तक मै याने भीमा ना कहू पीछे मूडकर ना देखे ।

भीमा का कहा मानकर रानी दूसरे रास्ते से निकल पडी और नीचे आयी पीछे मुड़कर देखा तो भीमा का विक्राल रुप उसने देखा और रानी मुर्छीत पडी । उसी अवस्था मे उसने एक बच्चे को जन्म दिया । भीमा तीन पगो मे ही पहाडी के नीचे आये । उसमे से एक पग का निशान आज भी मौजूद है । लोग वहां का जल पवित्र मानकर आज भी पीते है । जिस जगह भीमा ध्यानस्त बैठते थे वहा हरसाल पहले मेला भरता था ।

इस 1600 ई० मे उस परिसर की एक गोन्ड़ महिला बच्चा ना होने के कारण चिंतित थी । उसने भिमालपेन को मन्नत माँगी और पेनकडा (पूजा स्थल) पर छत बाँधने का वादा किया । उसकी मनोकामना पूर्ण होने के बाद उसने पेनकडा (पूजा स्थल) पर छत बाँधा जो आज भी मौजूद है । दिन ब दिन भीमा की कीर्ति होने के कारण सारा गोन्ड़ समुदाय वहा जाता गया . . .लोग मन्नत माँगते गये. . . भाव देने का वादा करते गये. . .और भाव देने का रिवाज हुआ मजबूत . . . आज लाखो लोग वहा हर साल जाते है ।

नाटेनाल गोंडवाना सोडुम 

सुर्रपोय:-कार्तिके सिंह घोडाम


महावीर भीमाल पेन और वीर हनुमान क्या एक हैं?

गोंड क्रांतिकारी कोमाराम भीम | Komaram Bheem

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