kota-city-named-after-raghuva-bhil-aka-kotia-bhil
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कोटा शहर जिसका नाम भारत मे ही नहीं पुरे दुनिया में पूजा जाता है, कभी कोटा स्टोन को ले कर तो कभी अपने एजुकेशन को ले कर, एक समए इसे ओउद्योगिक नगरी भी कहा जाता था।

क्या आप जानते है कोटा शहर का नाम कोटा कैसे पड़ा?

कोटा शहर कोटिया भील के नाम पर रखा गया। रघुवा भील उर्फ़ कोटिया भील। कोटिया भील एक ऐसा राजा था जिसने बूंदी रियासत को अपने सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया। अकेलगढ़ जगह से दक्षिण-पूर्व में मुकंदरा पर्वत की अरावली पर्वत श्रेणियों की बहुत बड़ी श्रंखला है।

कोटिया भील की पेन शक्ति ‘नाहरसिंह माता जी’ है, यह भील समुदाय में आग्रिनी रूप से पूंजी जाने वाली पेन शक्ति(राई खाल की पेन) है, जो भावर कुंज के पास इस्थित है। इस पेनठाने में रात को बाग़ आया करते थे।

कोटिया भील का किला में आज भी ऊँची ऊँची किले की दीवार मौजूद है, जो की काफी लम्बी है। किले की दिवार के किनारे चमबल नदी। किले का एक मुख्य द्वार है जहाँ से लोग आना जाना करते थे। राजा चम्बल नदी के किनारे रहते है, जिस तरफ नदी है वहां दीवार छोटी है जहाँ नदी नही है वहां दीवाल बड़ी और मोटी बनाई गई है। चम्बल नदी कोटा शहर के जीवंत होने का मुख्या कारण है । किले को बनाने में पत्थर और लोहा का उपयोग किया गया। किले के अंदर छोटे-छोटे घर बने हुए है। किले के अन्दर पेनठाना बना हुआ है। इस किले में ही कोटिया भील की समाधी मौजूद है। किले में तवारी(दूर तक देखने के लिए मीनार) भी है।

बूंदी रियासत उस समय सबसे मजबूत रियासत माना जाता था, पर वह एक भील के आगे झुक गए। कोटिया भील ने बूंदी रियासत पर दो बार हमला किया। पहली बार उन्होंने रियासत के नाक पर दम कर दिया। नाक पर दम कुछ इस प्रकार किया की रियासत के राजा को अपनी शक्ति बढाने के लिए कैथून के तवर के यहाँ अपनी बेटी का विवाह करना पड़ा।

इस प्रकार कैथून के तवर के साथ मिल कर अपने यहाँ कोटिया भील को दावत पर आमंत्रित किया। आमंत्रन का मकसद आपस में सुलह करना था।कोटिया भील वहां गए अपने हजारो समर्थको के साथ, दावत में खाना हुआ मदिरापान हुआ। उसी समय फिर रियासत के राजाओ ने आक्रमण कर दिया। कहा जाता है उस में 900 भील जनता और 300 भील राजा के सैनिक मरे गए। इसके बाद कोटिया भील लड़ते लड़ते मर गए। कहा जाता है सबसे पहले कोटिया भील की गर्दन कटी, इसके बाद भी उनका धड़ लड़ता रहा। जब धड़ लड़ता रहा तो राजाओ ने उनके कमर के ऊपर के हिस्से को काटा। इस प्रकार कोटिया भील के तिन हिस्से हो गए।

वर्तमान में इसी तीन हिस्सों की याद में लोगो ने गढ पैलेस के बगल में छोटी सी तीन मूर्ति लगाई।

स्थानिए लोगो का कहना है जिन राजाओ से कोटिया भील ने लड़ाई लड़ी उनसे उनकी दोस्ती भी थी। कोटिया भील जब जंगल जानवर चराने गए तो उनके एक साथी ने कहा दशहरा देखने चलते है कोटिया भील ने कहा ‘भीड़ में कहा जाएगे, मेरा दोस्त है राजा उमेश सिंह उसके पास चलते है’। गढ़ के करीब राजाओ की रैली के पास पहुचने पर उन्हों ने राजा उमेश सिंह को आवाज लगाया जो की हाती पर बैठे हुए थे। कोटिया भील ने कहा ‘उमेश सिंह मुझे भी हाथी पर तेरे बराबर बैठा’ कोटिया भील के साथी डर गए की वह कैसे राजा से ऐसा बोल रहा है। तब राजा ने दरबार को आर्डर दिया तब हाथी बैठा फिर सीडी लगाई गई हाथी पर। तब कोटिया भील हाथी पर बैठा कर पुरे गाँव होते हुए मैदान पर पहुचा।

किसी बड़ी रियासत को चुनौती देने के लिए बड़े हथियारों की जरुरत होती थी। वर्त्तमान में अकेलगढ़ पम्प हाउस जहाँ से कोटा शहर में पानी पहुँचाया जाता है, कोटिया भील का शास्त्रा गार हुआ करता था। यहाँ गुफा का एक हिस्सा है जो शहर जा कर मिलता है। शास्त्रा के अलावा जंगली जानवर भी रखे जाते थे।

हाडोती के इतिहासकार लेखक श्री फिरोज अहमद जी कोटिया भील कोटा शहर के बारे में :-

कोटिया भील, भीलो का एक सरदार था। जो चंबल के किनारे अकेलगढ़ में शासन करता था। तेरहवीं शताब्दी के मध्य चरण जब यहाँ भीलो की बस्ती हुआ करती थी चंबल के किनारे अकेलगढ़ में और लोग यहां पर खेती भी करते थे, लकड़ी काटने का भी धंधा करते थे। इसके अलावा वो तीर चलाने में भी काफी प्रवीण थे। एक बहादुर योद्धा के रूप में भील जाति का उल्लेख इतिहास में मिलता है।

उस समय तेरहवीं शताब्दी के मध्य चरण में बूंदी में मीणा को समाप्त कर के हाथों में अपना शासन स्थापित कर लिया था 1241 में देवी गार्डन बूंदी के जेता मीणा कुमार के मोदी में अपना शासन स्थापना कर लिया और बूंदी का राज्य में चंबल के बाई साइड तक की तरफ फैल चुका था।

भील बूंदी राज्य की सीमा में अक्सर लूटमार किया करते थे इसलिए समर सिंह ने सोचा कि इनका दमन किया जाए नहीं तो यह लूटमार करते रहेंगे। तो राहुल समर सिंह ने बूंदी के शासक के रूप में सबसे पहले कोटिया भील के ऊपर अटैक किया।

वह समय रात्रि का था तब कुछ भील युद्ध करते हुए मारे गए लगभग 900 की संख्या ‘डॉक्टर मदन लाल जी’ जो कोटा के इतिहासकार थे जिन्होंने इतिहास में लिखा है। कोटा का रियासत काल में उन्होंने 900 संख्या भील जनता और 300 राजा के सिपाही मारे गए। कुछ भील जनता जाकर कर चुप गए और वह बच गए।

उसके बाद भी भीलो के उत्पाद कम नहीं हुए। समर सिंह ने अपने बड़े पुत्र अपने से छोटे पुत्र का विवाह कैथून के दमन सरकार की पुत्री से किया था तो उसका यहां जाना रहता था। तो ससुर के साथ मिलकर के एक योजना बनाई कि कोटा में एक अलग राज्य स्थापित कर लिया जाए और इनको भगा दिया जाए। तो उन्होंने अपनी योजना के अनुसार कोटिया भील के लोगों को और कोटिया भील को दावत दी, चंबल के किनारे जहां वर्तमान में गढ़ बना हुआ है। यहां एक बड़ा बनाया गया जिसमें उनको खूब मदिरापान कराया गया। लोगों को बड़ी खुशी हुई और इस तरह से उनको मदिरा पिला कर के मस्त कर दिया गया।

बाद में प्लानिंग के तहत पलटी(जमीन के नीचे) नीचे जो बारूद थी उसमें आग लगा दी गई तो कई भील लोग विस्फोट में मारे गए और बाकी जो बचे बूंदी के राजकुमार के सैनिकों के साथ और उसके बॉडीगार्ड के साथ जो ‘सैलर गाजी पठान’ से युद्ध हुआ। बहुत सारे भील योद्धा और ‘खाड़ा’ योद्धा, वह आपस में लड़ते हुए मारे गए। शैलार गाजी कोटिया भील के साथ युद्ध किया। वह कोटिया भील के हाथों मारा गया। शैलार गाजी का आज भी कोटा के गढ़ के अंदर उसके नाम से स्मृति में बना हुआ दरवाजा मौजूद है, जो शैलार गाजी दरवाजा कहलाता है। इसी दरवाजे से होकर कोटा रियासत में जब दशहरा आयोजीत होता था, दशहरा की सवारी इसी दरवाजे से हो कर जाया करती थी। लेकिन परंतु मारो उमेश सिंह जी तीते के शासनकाल में हवा महल को बीच में से तोड़कर के न्यू गेट बना दिया गया जो वर्तमान में मौजूद है। फिर यहां से निकलने लगी वर्तमान का दरवाजा एक दीवार के परकोटे के भीतर छुपा हुआ है पहले को बाहर दिखाई देता था।

तो कोटिया भील को 1264 में शैलार गाजी के मरने के बाद कोटिया फिर से जयसिंह ने युद्ध किया था और उस को शहीद किया था।

कौन सी जगह पर है? भील की भैरो के रूप में गोंगो की जाती है, पंडित अभी भी वहाँ आता है और भेरु के रूप में गोंगो जाता है।

कोटा में कोटिया भील इस तरह से यहां 1264 में मर गया। लड़ाई के दौरान जयसिंह ने पहले तो कोटिया भील का सर कलम किया लेकिन उनका रूल्स लड़का रहा वह गिरा नहीं उसकी तलवार चलती रही, तब जयसिंह ने उसकी कमर के ऊपर वार किया और उनक शरीर का तीन टुकड़ों में कटा। तो आज भी उसके तीन टुकड़ो को मूर्ति के रूप में स्थापित किया, मतलब पत्थर की मूर्ति के रूप में और उनका गोंगो होता है।

कोटिया भील के वंसल कौन थे वह सरदार कैसे बने?

अपने भील समाज में कोटिया भील एक बहादुर योध्या था और वह काफी शक्तिशाली था अन्य भीलो के मुकाबले में, युद्ध करने में प्रवीण था। इसलिए उसको लोगों ने अपना मुखिया चुना और यह लोग कोयतूर थे, जंगल में रहते थे। उन्होंने कोई बड़े महल नहीं बनाए। साधारण से मकान बनाकर की रहा करते थे आज भी किले के गढ़ के अंदर चिन मौजूद है अखंडरो में।

अकेलगढ़ पत्थरों को जमा करके अपने घर बना कर रहा करते थे लेकिन दौलतगंज में पक्का के लाइन का है वह भी चंबल के किनारे है यह दोनों अकेलगढ़ के किले के नाम से जाने जाते थे।

रियासत काल कोटिया भील का असली नाम रघुवा भील था और उपाधि उसकी कुटिया थी। कोटा का नाम है उन्हीं के नाम पर रखा गया। कोटिया भील का नाम जयसिंह ने तो नहीं रखा था, पर ‘डॉक्टर मथुरा लाल जी’ ने तो इसको लिखा है कि उसके नाम पर ही कोटा शहर का नाम रखा गया। लेकिन ‘कर्नल जेम्स टॉड’ ने अपनी पुस्तक लिखी है ‘राजपूताने का इतिहास’ उसके अंदर उसने लिखा है कि जेल सिंह का जो पुत्र था सुरजन, ‘औरस पुत्र’ उसने कोटिया भील के नाम पर कोटा नगर का नाम रखा। कोटा को जयसिंह ने बसाया था।

प्रथम नाम कोटा सुरजन ने बनाया कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार परंतु वह डॉक्टर मथुरा लाल जी जो इतिहासकार कोटा के उन्होंने जो इतिहास लिखा उन्होंने कोटा के परकोटे के बनाने के बारे में लिखा है। 1631 के समय मतलब कोटा का प्रकोप है जब माधव सिंह जी यहां के सर्वे सर्वा राय राजा बन गए और कोटा स्टेट अलग से एक बनी तब 1631 में बनाया गया प्रथम परकोटा जो डॉक्टर मदन लाल जी का मानना है।

परंतु कर्नल जेम्स टॉड ने तो इतिहास लिखा है उसके अंदर उसने लिखा है किसने बनवाया था और यह परकोटा किशोरपुरा कैथूनीपोल पाटन पोल तथा कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा।

लेकिन आपने जो मथुरा लाल जी ने लिखा है उन्होंने इसको राव मधु सिंह के जमाने से स्टार्ट बताया कोटा के ऊपर कोटे कोटे का परकोटा तीन चरणों में बनाए हुए थे मथुरा लाल जी के अनुसार

प्रथम माधव सिंह के जमाने में राव माधो सिंह के समान

दूसरा राव राम सिंह के गाने और

तीसरा मारा उमेश सिंह दीप्ति प्रथम के शासनकाल में अपनी सेनाओं को संगठित करते थे। वह सब लोग रहते थे ।

वर्तमान में उसे कोटा की कौन सी जगह कहीं जाती है?

वर्तमान में कोटा की भील का कोई स्थान कोटिया भील का खेल घड़ी था लेकिन कोटा का जो है वह यह टिपटा एरिया है यहीं पर पुराना कोटा था और ‘कैथूनीपोल किशोरपुरा पाटन पोल’ कहते हैं प्रथम सीमा यही थी। यही पर फ़ौज और तोप कहना भी था। कोटा में तोपों का प्रारंभ शासकों ने सातवीं शताब्दी से प्रारंभ कर दिया था।

कोटिया भील ने युद्ध पहले राव समर सिंह से किया फिर उसके पुत्र जैल सिंह से किया जिसमें जयसिंह के साथ लड़ता हुआ तो वह मारा गया 1264 और कोटा नगर 1264 में बसा दिया गया। बहुत कम लोग यहाँ रहते थे तो बूंदी का राजकुमार अपने बड़े भाई बूंदी वाले उनके संरक्षण में अधीनता में यह शासन करता था।

कोटा एक राज्य के रूप में नहीं था। कोटा एक राज्य के रूप में तो 1631 में अस्तित्व में आया। जब मुगल बादशाह शाहजहां ने शाही फरमान जारी किया बूंदी के राजकुमार और राव माधो सिंह के नाम पर तब अस्तित्व में आया।

कोटिया भील के बारे में कई सारी कहानियां प्रचलित हैं तो वह भील समाज के लोग उनकी आमदनी कैसे होती थी? हथियार वगैरा वह लोग कैसे लोग कहाँ से व्यवस्था करते थे?

पहला श्रोत खेती था व दूसरा लकड़ी काटना का लकड़ी बेचना। तीसरा लूटमार करना, सीमा में अटैक कर के अकाउंट में लूट मार कर दिया करते थे।

मथुरा लाल जी ने भी कोटिया भील के बारे में यही लिखा है कि उसके नाम पर बूंदी के जो राजकुमार थे उन्होंने उसी के नाम पर नामकरण किया और कर्नल जेम्स टॉड भी उसी के उसी उसको मानता है कि कोटिया भील के नाम पर ही कोटा का नाम कोटा रखा गया है।

कोटिया भील के बारे में उसके नाम का उल्लेख जो मिलता है वह तारीख राजगढ़ कोटा मुंशी मूलचंद द्वारा उर्दू का जो इतिहास लिखा हुआ है वह मरदूर जैसवाल जी तक का यह पूरा संपूर्ण नहीं है वह कोटा का इतिहास अधूरा है उसमें कोटिया भील का नाम रघुवा लिखा है तारिक राजगढ़ कोटा है।

कोटिया भील मारा गया था उसकी स्मृति में कोटा नगर बसा दिया गया था भील तो आज भी अकेलगढ़ के आप चंबल के किनारे चले जाओगे शिवपुरा गांव भीलों का ही है। इसके आगे आप चले जाइए जंगल में चंबल घाटी से लेकर यह मुकदरा इंदरगढ़ में हैं। यह मंदिर गढ़ मंदिर बसत ने बसाया, मथुरा लाल जी ने भी उस चीज को लिखा है कि मुकद्दर से पहाड़ी से लेकर के मनोहर थाना की पार्टी तक फैले हुए थे उनके ठिकाने थे।

कोटिया भील के बाद भील समुदाय में कोई ऐसा शासक नहीं हुआ तो फिर से ना कोई खट्टा करके आक्रमणकारी कोई ऐसा बिल्कुल शक्तिशाली नहीं हुआ जो हम से मुकाबला करते कोटिया भील के मरने के बाद ही उनकी लूटमार या खत्म हो गई। यहां पर हाड़ा राजाओं का शासन स्थापित हो गया बूंदी वालों का बूंदी के राजकुमार ने कम से कम ढाई 2 वर्ष तक राज किया उसके बाद कोटा 1631 में एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया जब बूंदी के राजकुमार को बादशाह शाहजहां ने उनकी वीरता और कुशलता को देखते हुए उनको कोटा का राजा बनाया राव माधो सिंह को 1631 से लेकर 1947 तक कुल 17 शासकों ने राज्य किया कोटा में जो हाड़ाओ की महारानी शाखा कहलाती है। भीलो के दो किला है एक दौलत गंज में और दूसरा अकेलगढ़ में। तीसरा कोई ऐसे महल बढ़िया सुंदर कोई शिलालेख या और कोई अन्य वस्तुओं में मिली हो।

वर्तमान में दौलत गंज का किला मौजूद है अकेलगढ़ में पत्थरों के ढेर पड़े हुए हैं शिलालेख में मिला है जिसे राजकीय संग्रहालय में रखा गया है। पुरातत्व अधिकारी कभी उठा करके लाए थे। यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वह किस भाषा की थी।

कोटिया भील को एक बहुत शक्तिशाली तो था इसलिए इतनी ताकत हाडा बूंदी के जो शासक राव समर सिंह और उसके पुत्र को लगानी पड़ी और एक योजना के तहत उसको युद्ध में मार कर के कोटा बसाया गया। उसमे देवी भक्त थी नरसिंह की माता की।

उस समय पहनावा कैसा होता था? पुरुषों का तो पूरा शरीर में ढका नहीं रहता था लेकिन स्त्रियां घाघरा लुगड़ी पहनती थी राजस्थानी परंपरा के अनुसार लेकिन वह धोती पहनते थे। धनुष बाण उनका मुख्य ध्यान हुआ करता था।

कोटिया भील एक मंदिर बनाया गया है यहाँ उनका परिवार है और उनके इधर सैनिक है एक बहुत छोटा सा पुराने तरीके का मंदिर जिसमें उनकी स्थापना की गई ताकि कोटिया भील की स्मृति को कोटा शहर की जनता याद रखें राजस्थान की जनता याद रख देश की जनता याद रखे।


रावण मंडावी का भारत में प्रमुख्य स्थान

रानी हिराई आत्राम | चंद्रपुर महाराष्ट्र को गोंडो ने बसाया

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