? हमारे कई कोयतूर अधिकारी नहीं जानते कि “कोयतूर पेनठाना” को क्या कहा जाता है? फिर दूसरे समाज की बात ही छोड़ो।

कोयतूरों के पेनठाना स्थानों की पहचान कैसे करें ..?

इसकी पहचान करने से पहले, हिंदुओं के देवस्थल और कोयतूरों के पेनठाना के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।

प्रमुख अंतर –

1.कोयतूर पेनठाना को चौरा, गुड़ी, ठाना, आदि कहा जाता है, न की मंदिर। जबकि, हिंदुओं के मंदिर को मंदिर कहा जाता है। आज, कई कोयतूर पेनठानो को हिंदू मंदिरों में बदल दिया गया है और यह धार्मिक डकैतियों है।

2.कोयतूर पेनठाना में गोंगो “बैगा, बुमका, सेवईक, पांडा,” आदि करते है, ब्राह्मण नहीं। इस बैगा पद में कोई भी कोयतूर हो सकते हैं। जबकि हिन्दू के देवस्थल में केवल ब्राह्मण ही पूजा कराते हैं।

3.मरकीमाता, गुड़ी,  ठाकुरठाना, घटवई, चिकला माई (शीतला), मरिमाता, चौरा आदि कोयतूरों के पेन है, जबकि हिंदुओं के देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिवलिंग, दुर्गा, लक्ष्मी, आदि हैं। इनकी मूर्तियाँ स्थापित होती हैं। जबकि कोयतूरों में “लकड़ी” या “पत्थर” गाड़ा हुआ होता है ।, कोयतूर की मूर्ति नहीं पूजते।

4.कोयतूर पेनठाना में मुर्गी, बकरी आदि का बलि चढ़ाया जाता है और आज भी चढ़ाया जा रहा है, जिसका उदाहरण हैं बमलाई, रतनपुर, महामाई, चंद्रपुर चंद्रहासिनी, डोंगरगढ़ आदि। जबकि हिंदू मंदिर में नहीं चढ़ाया जाता है, आज भी नहीं चढ़ाते है। लेकिन आज धार्मिक चोरी करके संभु, काली आदि की कोयतूर मूर्तियों और मंदिरों के चारो ओर हिन्दू देवी देवताओ की मूर्ति बना दिए है जिससे से हिन्दू मंदिर लगने लगे। अब वह हिन्दू मंदिर कहलाने लगे हैं, जो एक बहुत ही आपत्तिजनक कार्य है।

5.कोयतूरों के “बैगा / गायता / सिरहा” अपने पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं, जबकि हिन्दुओं में वैदिक संस्कृत मंत्रों का पाठ करते हैं।

6.कोयतूरों के पेन किसी के शरीर में भाव भर कर झुपते नाचते हुए आते हैं। जबकि हिन्दू देवता ब्रह्मा, विष्णु और दुर्गा भाव भर कर नहीं आते हैं।

7.कोयतूरों के पेन अलौकिक काल्पनीकता पर आधारित नहीं हैं, लेकिन प्रकृति के पूर्वजों या शक्तियों को पेन मानते हैं। जबकि हिन्दुओं के भगवान एक मिथक से पैदा हुए हैं, जैसे ब्रह्मा चार सिर वाले, 18 हाथों वाले दुर्गा, हाथी वाले गणेश, उल्लू की सवारी वाली लक्ष्मी, आदि।

8.कोयतूरों अपने पर्व मंदिरों में जाकर ब्राह्मणों को दान दे कर पूजा नहीं करते हैं। बल्कि, अपने घर के भीतर खोली (मुड़हर घर) में पेन का पारंपरिक तरीको से गोंगो करते हैं।

9.कोयतूरों क गोंगो और हिन्दुओं का पूजा पाठ अलग है, त्योहार और संस्कार भी अलग हैं। गावं के लोग इस बैगा पूजा प्रणाली का उपयोग करते हुए पारंपरिक शहर उत्सव और अनुष्ठान भी करते हैं। ऒबीसी और एससी भी एक ही प्रणाली द्वारा शासित और संस्कारित होते हैं। जबकि हिंदू ब्राह्मण पूजा पद्धति में हवन आदि का प्रयोग करते है।

कोयतूरों के पेनस्थल प्रत्येक गाँव का गुड़ी है, यह प्रत्येक गढ़ में है, प्रत्येक घाट की घटोरिया में है, प्रत्येक पाट का पाट बाबा में है, प्रत्येक तालाब का पानी गोसाईंन में है, प्रत्येक कस्बे का ठाकर बाबा है।

चंद्रपुर का चंद्रहासिनी माई कोयतूरों का है ।

{कोयतूर अपने पेन ठाना को अपने पूर्वजों की भाषा में “पेन गुड़ी” और पेनता को “ठाना” कहते हैं।


आदिवासी शब्द के बजाए कोयतूर शब्द का उपयोग

गोडी धर्म श्रेष्ट आखिर क्यों जाने | गोंडी धर्म क्या है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here