हमारी रूढ़ि हमारी कयी हजारों साल पुरानी पुरखा संस्कृति, जिसकी वजह से हम इस भूमि के मूल बीज हैं,जिसे समाप्त करने की अमानवीय कोशिशें बाहर से आयी दीकु भिखारी भूमि लुटेरे प्रजातियों ने की हैऔर आज भी कर रहे हैं लेकिन गोण्डवाना भूमि के इन्डीजीनस की संस्कृति आज भी गर्व से मस्तक उठाये जिंदा हैं और करोड़ों साल तक रहेगी ।

Rainidham-burrikala-junnardev
Rainidham-burrikala-junnardev


फाग के बाद 15 दिन खंडेरा गोन्गो, मेघनाद रावन गोन्गो, गढ़ गोन्गो , गल पूजा, गढ़ बीर गोन्गो मध्य भारत में जोर – शोर से मनाया जा रहा है । रूढ़िप्रथा ( customs) के अनुसार…..,
मेघनाद रावन…..उर्फ,
खांडेराय बाबा…..उर्फ,
खंडेरा गोंगो…..उर्फ,
गलदेव…..उर्फ,
होलेराय गोंगो (पूजा) मूलवासी समुदाय के बुजुर्गो, युवाओं, बच्चों तथा माता-बहनों की उपस्थिति में पारम्परिक श्रद्धा, आस्था तथा हर्षोल्लास के साथ पूर्ण रूप से सम्पन्न होता है।

चिरान जुग (पुरातन काल) से चली आ रही परम्परा है, होलिका शहादत पर्व के दूसरे दिन बालाघाट (म०प्र०) जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय किरनापुर में मनाई जाती है। इसके अलावा सात दिवसीय ऐतिहासिक मेला रैनीधाम बुर्रीकला तहसील जुन्नारदेव(मुख्यालय से 13 किमी दूर) जिला छिन्दवाड़ा ब्रिटिश काल से बनाया जाता है।

जहां होलिका शहादत दिवस के बाद खंडेरा बाबा के गले मिलने के साथ ही मेला का शुरू होता है। इस मेंले मे बैतूल, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सिवनी, बालाघाट और महाराष्ट्र से भी लोगों को यहाँ आते है। रावण के पुत्र मेघनाद की भी आराधना करते है। प्राचीन काल से, एक धारणा है कि खंडेरा बाबा में जहाँ रावण के पुत्र इंद्रजीत मेघनाद स्वम वास करते है।

*मन्नत पूरी होने पर ले के आते है वीर*

यहां लोग अपनी समस्याओं और मांगों को लेके गोंगो (पूजा) करके मन्नत मांगने के लिए आते हैं।

Meghnath-ravan-maila
Meghnath-ravan-maila

जैसे ही मेले में गोंगो (पूजा) शुरू होता है, लोगो के शरीर में पेन शक्ति का वास होने लगता हैं, फिर उन्हें घर से स्नान कराकर, नए कपड़े पहनाकर, उनके कमर के चारों ओर एक रस्सी दोनों हाथों से बांधकर पेन स्थल में गाजे बाजे के साथ लाया जाता है। जैसे ही वीर लोगो के शरीर मे पेन शक्ति बड़ने लगती है वे खंडेरा की तरफ दौड़ने भागने लगते हैं। जिसे कमर में बंधी रस्सी को खींचकर नियंत्रित किया जाता है ।

वीर के पीछे चलने वाले पुरुषों की भीड़ गाना गाते बजाते रहते है, उसका अपना राग होता है। जो केवल मेघनाद मेले में सुना जाता है। वीर को खंडेरा बाबा के पास ले जाएं और गोंगो के बाद खंडेरा बाबा को पांच लड्डू चढ़ाएं जाते है। इसके बाद वीर लोगो के शरीर से पेन शक्ति को शांत किया जाता है ।

*मुर्गे और बकरे की चढ़ती है बली*

बली प्रथा आज भी बेरोकटोक खुलेआम जारी है। मन्नत मांगने वाले रैनीधाम आते हैं तो वे साथ मे बकरा और मुर्गा भी लाते हैं। रैनीधाम (बुर्रीकला) आते ही लोग बाहर पेड़ो के नीचे टेंट लगाकर वे रुकने का अस्थाई स्थान बनाते है फिर पूरी तैयारी कर खंडेरा बाबा तक चल पड़ते है ।

holeray-gongo
holeray-gongo

खंडेरा बाबा की गोंगो के बाद मुर्गा और बकरा की बली देते है जहां मुर्गे और बकरे का सिर खंडेरा के पास बने भैरव देव के स्थान पर चढ़ा दिया जाता है शेष बचे मुर्गे और बकरे के शरीर को ठहरे हुये स्थान पर ले जाकर पकाकर भोजन प्रसाद के रूप में खाया जाता है ।  

*मेले के दौरान ग्राम वासियो के प्रत्येक घरों में मेहमानों का तांता*

मेले के दौरान खंडेरा बाबा का गोंगो एवं मेले का आनंद लेने आये मेहमानों तथा रिस्तेदारों का बुर्रीकला निवासियों के घरों में तांता लगा रहता है । इस पर्व में ग्राम वासियो द्वारा रिस्तेदारों के अलावा अपनी अपनी बेटी-जमाई को विशेष तौर पर घर बुलाने की परम्परा है । इन सात दिनों ग्राम में उत्सव जैसा माहौल बना रहता है।

*होलिका शहादत के पहले दिन और रंग पंचमी तक होती है धुरेंडी*

जहां देश भर में होलिका शहादत के बाद धुरंडी खेली जाती है, वहीं बुर्रीकला गांव में रंग पंचमी तक धुरंडी खेली जाती है।

*समिति करती है मेले में सम्पूर्ण व्यवस्था*


रैनीधाम मेला समिति बुर्रीकला मेले में पूरी व्यवस्था करती है जैसे पानी, बिजली, परिवहन, सफाई और अन्य व्यवस्थाएं की जाती हैं। ????

*रैनीधाम मेला समिति बुर्रीकला*

बी एस परतेती प्रदेश अध्यक्ष
गोंड समाज महासभा मध्यप्रदेश


देवारी तिहार | Dewari Tihar

भुजरिया पर्व कि वास्तविक मान्यता

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here