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Gundadhur-Bastar-Matiputra

गुंडाधुर का जन्म नेतनार, बस्तर (छत्तीसगढ़) के एक छोटे गाँव में हुआ था। गाँव में पले-बढ़े गुंडाधुर ने अंग्रेजों को इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने कुछ समय के लिए गुफाओं में छिपना पड़ा। अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाला यह क्रांतिकारी आज भी बस्तर के लोगों के बीच जीवित है। रियासतकालीन वैभव से परिपूर्ण बस्तर का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। यहां की परंपराएं, रीति-रिवाज और संस्कृति अपने आप में खास हैं। देश का ऐसा कोई कोना नहीं होगा जो बस्तर की समृद्ध संपदा को नहीं जानता हो। अंग्रेजों को चालुक्य और मराठा और नागवंशी राजवंशों के शासन का इतिहास आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। गुंडाधुर गोंड कोयतूर धुरवा जनजाति इतिहास के पन्नो में जगह नहीं मिला । 

उस समय का शासक रूद्र प्रताप सिंह था जिसके विरुद्ध विद्रोह किया गया था । जब भैरम देव बस्तर के शासक बने है तो बस्तरवासी भैरम देव को शासक नहीं बनाना चाहते थे, बल्कि भैरम देव के भाई लाल कालिंदर सिंह को शासक बनाना चाहते थे । लाल कालिंदर सिंह बस्तर के दिवान थे । लाल कालिंदर सिंह आदिवासियों के प्रिय थे । भैरम देव की दो पत्नी थी, लेकिन उनका कोई पुत्र नहीं था । कुछ समय उनका पुत्र हुआ रूद्र प्रताप सिंह देव । भैरम देव की मृत्तु 1891 मे हुआ । रूद्र प्रताप सिंह देव वयस्क नहीं हुए थे, तो अंग्रेजो ने वैजनाथ पंडा को एडमिनिस्टेटर नियुक्त किया ।

1908 में रूद्र प्रताप सिंह देव बस्तर के शासक बन गए । रूद्र प्रताप सिंह अंग्रेजो की जीहुजूरी करते थे, उनका लोगो से संवाद कम था । वह लोगो की समस्या नहीं सुनते थे इसलिए लोगो में राजा के प्रति असंतोष था । जिससे वहां की जनजाति रूद्र प्रताप सिंह के विरुद्ध विद्रोह करने लगे थे । अंग्रेजो ने लाल कालिंदर सिंह को दिवान पद से हटा कर कृष्ण राव को दिवान पद दे दिया । विद्रोह में लाल कालिंदर सिंह और रूद्र प्रताप सिंह की दूसरी माता सुवर्ज कुंवर सिंह भी सम्मलित थे । भैरम देव की छोटी पत्नी को सुवर्ज कुंवर को राज माता का दर्जा नहीं मिला था, जिस कारण वह नाराज थी ।

गांव में लाल मिर्च बाटा गये और आम की टहनी दिखा कर विद्रोह के प्रतिक के रूप में उपयोग किया गया । अंग्रेजी शासक ने यहाँ के विद्रोह को देखते हुए कैप्टन गेयर एवं डी ब्रेड को बस्तर में भेजे । कैप्टन गेयर विद्रोह को दबाने में असफल रहे थे तथा 3 मई 1910 में यह विद्रोह को कुचला गया क्योंकी वही के सोनू मांजी नामक व्यक्ति ने विश्वास घात कर दिया ।

उस समय का शासक रूद्र प्रताप सिंह था जिसके विरुद्ध विद्रोह किया गया था । जब भैरम देव बस्तर के शासक बने है तो बस्तरवासी भैरम देव को शासक नहीं बनाना चाहते थे, बल्कि भैरम देव के भाई लाल कालिंदर सिंह को शासक बनाना चाहते थे । लाल कालिंदर सिंह बस्तर के दिवान थे । लाल कालिंदर सिंह आदिवासियों के प्रिय थे । भैरम देव की दो पत्नी थी, लेकिन उनका कोई पुत्र नहीं था । कुछ समय उनका पुत्र हुआ रूद्र प्रताप सिंह देव । भैरम देव की मृत्तु 1891 मे हुआ । रूद्र प्रताप सिंह देव वयस्क नहीं हुए थे, तो अंग्रेजो ने वैजनाथ पंडा को एडमिनिस्टेटर नियुक्त किया ।

1908 में रूद्र प्रताप सिंह देव बस्तर के शासक बन गए । रूद्र प्रताप सिंह अंग्रेजो की जीहुजूरी करते थे, उनका लोगो से संवाद कम था । वह लोगो की समस्या नहीं सुनते थे इसलिए लोगो में राजा के प्रति असंतोष था । जिससे वहां की जनजाति रूद्र प्रताप सिंह के विरुद्ध विद्रोह करने लगे थे । अंग्रेजो ने लाल कालिंदर सिंह को दिवान पद से हटा कर कृष्ण राव को दिवान पद दे दिया । विद्रोह में लाल कालिंदर सिंह और रूद्र प्रताप सिंह की दूसरी माता सुवर्ज कुंवर सिंह भी सम्मलित थे । भैरम देव की छोटी पत्नी को सुवर्ज कुंवर को राज माता का दर्जा नहीं मिला था, जिस कारण वह नाराज थी । गांव में लाल मिर्च बाटा गये और आम की टहनी दिखा कर विद्रोह के प्रतिक के रूप में उपयोग किया गया । अंग्रेजी शासक ने यहाँ के विद्रोह को देखते हुए कैप्टन गेयर एवं डी ब्रेड को बस्तर में भेजे । कैप्टन गेयर विद्रोह को दबाने में असफल रहे थे तथा 3 मई 1910 में यह विद्रोह को कुचला गया क्योंकी वही के सोनू मांजी नामक व्यक्ति ने विश्वास घात कर दिया ।

इसके आलावा विद्रोह के कई कारण थे :-

स्थानिया प्रशासन द्वारा लोगो का शोषण ·बाहरी लोगो द्वारा स्थानीय लोगो का शोषण ·सरकारी अधिकारीयों द्वारा मुफ्त में देसी घी व वन उपज प्राप्त करना ·कोयतूरों को गुलाम समझना ·इसाई मिशनरियों द्वारा कोयतूरों का धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना ·बस्तर के वनों को सुरक्षित वन गोसित करना जिससे की वन का उपयोग केवल अंगेज ही कर सकता है ।  

गुंडाधुर ने बस्तर को एक अलग पहचान दीलाया । बस्तर के महान क्रांतिकारी गुंडाधुर को लोग आज भी याद करते हैं। बस्तर भी गुलामी की जंजीरों में हुआ था वह भी देश के सभी हिस्सों की तरह खुद को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करना चाहता था। हालांकि, ब्रिटिश राजवंश ने अंग्रेजों को उनका विरोध करने की अनुमति नहीं दी। लेकिन कुछ आवाजें ऐसी थीं जो ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना चाहती थीं। उन आवाज़ों में से एक क्रांतिकारी गुंडाधुर की आवाज़ थी।

बस्तर के नेतानार में रहने वाले गुडांधुर को उस समय लोग बागा धुरवा के नाम से जानते थे । चूंकि बाहरी दासता के खिलाफ संघर्ष बस्तर की प्रकृति रही है, उसी के अनुरूप क्रांतिकारी गुंडाधुर ने अंग्रेजों की मुखालफत शुरू की और 2 फरवरी 1910 को पुसपाल बाजार को लुटा । 4 फरवरी 1910 को कुकाबार बाजार लुटा गया । 10 फरवरी 1910 को अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकने भूमकाल विद्रोह का शंखनाद कर दिया । 14 फरवरी को अलनार गांव जहां पर भूमकाल के योद्धाओं की ब्रिटिश सेना के साथ परंपरागत हथियार व आधुनिक हथियारों का सामना हुआ । 25 फरवरी 1910 को डाकनगर में विद्रोह का नेतृत्व भी गुंडाधुर कर रहे थे । 5 मार्च को सवर्ण कुंवर सिंह को गिरिफ्तर कर लिया और उन्ही के महल में उन्हें नजर बंद कर दिया । उसके बाद उन्हें वहा से निकल कर रायपुर जेल भेजा गया, जहां पे 26 अक्टूम्बर 1910 में उनकी मृत्तु हो गई । लाल कालिंदर सिंह भी गिरिफ्तर हो गए और उनकी मृत्तु जेल हो गई । गुंडाधुर अन्त तक पकड़ा नहीं गया । भूमकाल आंदोलन में लाल मिर्च क्रांतिकारियों की संदेश वाहक कहलाती थी, जैसे 1857 की क्रांति के समय रोटी और कमल ।

51 योद्धाओं का नाम शोध उपरांत बनाया गया है:-

संभागीय धुरवा समाज बस्तर संभाग के द्वारा व समुदाय के ही शोधि तिरुमाल गंगाधुर नाग धुरवा के अनुसार इस महान भूमकाल विद्रोह के क्रन्तिकतियों की सूची तैयार किया जा रहा जिसमे अब तक 51 योद्धाओं का नाम शोध उपरांत बनाया गया है । 15 फरवरी को शहीद हरचंद नाईक के गांव रान सगीर्पाल में माटी सेवा अर्जी किया जाता है । 17 फरवरी को शहीद मुंदी क्लार के गांव नेगानार 19 फरवरी को गुंडाधुर धुरवा के सबसे विश्वसनीय मित्र ढेबरी धुर धुरवा की जन्मभूमि एलंगनर में 21 फरवरी को शहीद मडकामी मासा वल्द भीमा माडिया की जन्मभूमि केलाउर में परम्परागत विधि विधान से गांव गोसिन याया (जिम्मिदरिन/माटी याया) की सेवा अर्जी कर शहीदों को पेन जोहर किया जाता है । भूमकाल सप्ताह का समापन 22 फरवरी को इस विद्रोह के जननायक हमारे पुरखा गुंडाधुर धुरवा की माटी नेतानार में उनके वंशजो की उपस्थिति में गांव गोसिन याया व हमारे पेन गुंडाधुर धुरवा की विशालकाय प्रतिमा में परम्परागत सेवा अर्जी कर समुदाय द्वारा सभा आयोजित कर अमर गुंडाधुर धुरवा तथा अनेक बेनाम शहीदों को जोहार, भूमकाल जोहार, डारा मिरी जोहार, गुंडाधुर अमर रहे, देब्रीधुर अमर रहे, भूमकाल लड़ाई अमर रहे की गगनभेदी परंपरागत स्तुति करते हुए उनके संघर्षो पर चलकर समुदाय व बस्तर की माटी की रक्षा की कार्य करते हुए संपन्न होती है ।  

बस्तर से ब्रिाटिश हुकूमत की नीवें हिलानें के लिए गांव-गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी का धुनष-बाण और आम की टहनियां लोगों के घर-घर तक पहुंचाने का काम इस मकसद से शुरू किया गया कि लोग बस्तर की अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आगे आएं । इतिहास इस बात का साक्षी है कि अंग्रेजों के खिलाफ उठाई गई इस आवाज में करीब 25 हजार लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी । भूमकाल का मतलब है भूमि का कपना जिसकी गाथा आज भी बस्तर के लोकगीतों में गाई और सुनाई जाती है । कोई कोयतूर आज भी जब रात के अंधेरे में भूमकाल के गीत छेड़ता है तो कोयतूरों के पांव ठहर जाते हैं । उस सदी में शुरू हुई सफल क्रांति की मर्मान्तक पीड़ा आज भी कोयतूरों का पीड़ा से भर देती है । बस्तर का इतिहास आज भी इतिहास के पन्नों से ज्यादा लोककथाओं, लोकगीतों और जनश्रुतियों में संकलित और जीवित है । शहीद गुंडाधुर को सर्वमान्य नेता माना जाता है । शहीद गुंडाधुर सामान्य कोयतुर थे, जिन्होंने न तो कभी पाठशाला का मुंह देखा था और न ही बाहरी दुनिया में कदम रखा था । 

35 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी लडाई छेड़ी कि कुछ समय तक अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे । हालात तो ये हो चले थे कि अंग्रेजों को कुछ समय छिपने के लिए जंगलों में गुफाओं का सहारा लेना पड़ा था उस जमाने के कई अंग्रेज अफसरों ने अपनी डायरी में भूमकाल आंदोलन को लेकर कई बातें भी लिखी है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में अंकित हैं । बस्तर की सम्पदा लूट रहे अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए भूमकाल आंदोलन ने पूरी ब्रिाटिश सत्ता को हिलाकर रखा दिया । ऐसे में इस आंदोलन के कई प्रणेता को उल्टा फांसी पर लटका दिया गया, जिसका गवाह आज भी जगदलपुर के गोलबाजार चौक पर स्थित इमली का पेड़ है, जहां इस आंदोलन से जुड़े लोगों को मौत की सजा दे दी गई थी ।  

20 वीं शताब्दी से पहले दुनिया में किसी ने भी बदमाश के अर्थ में ” गुंडा ” शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।
हिंदी में ” गुंडा ” शब्द अंग्रेजों की फाइल से आया है । वह भी तब, जब 20 वीं शताब्दी के पहले दशक में बस्तर के मुंडा कोयतूर समाज के स्वतंत्रता सेनानी वीर गुंडा को अंग्रेजों ने गुंडा ( बदमाश ) मान लिया था ।
भारतीयों की नजर में वीर गुंडा एक स्वतंत्रता सेनानी थे, मगर अंग्रेजों की नजर में बिगड़ैल, बदमाश था ।
अंग्रेजी अखबारों में ” गुंडा ” शब्द1920 के आसपास मिलता है, जबकि अंग्रेजी साहित्य में इसका प्रयोग 1925 – 30 के बीच मिलता है । गुंडा शब्द अंग्रेजी, संस्कृत व हिन्दी भाषा का शब्द नहीं है । गुंडाधुर को छत्तीसगढ़ का तात्या टोपे भी कहा जाता है ।  

बस्तर के इस वीर क्रांतिकारी बागा धुरवा को अंग्रेजों ने ही गुंडाधुर की उपाधि दी थी । दरअसल शहीद गुंडाधुर के विद्रोह करने के चलते ये नाम अंग्रेजों ने ही उन्हें दिया था । इतिहास के पन्नों में दर्ज शहीद गुंडाधुर का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी लोगों में मन में जिंदा है । बस्तर के इस माटीपुत्र के लिए राज्य सरकार खेल प्रतिभाओं को उनके नाम पर पुरिस्कृत करती है । तीरंदाजी के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को शहीद गुंडाधुर अवार्ड से सम्मानित किया जाता है।  

।।क्रन्तिकारी गुण्डाधुर को शत्-शत् नमन।।


महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव

वीर योद्धा बाबूलाल पुलेश्वर शोडमाके

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