Gotul-Education-system
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कोयतूर तकनीक में गोटुल शिक्षा व्यवस्था

गोटुल गोंडवाना लैंड के गोण्ड समुदाय का शिक्षा का केन्द्र है। गोंडवाना में गोटुल गोण्डी भाषा का एक पवित्र शब्द जिसमे “गो” = ज्ञान और “टुल” = स्थान अर्थात ज्ञान अर्जित करने का स्थान। इसी प्रकार अलग-अलग जगहों (राज्यों) में इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है जैसे :-

उराँव गोण्ड :- टुमकुरिया जहाँ टुम = विद्या और कुरिया= शिक्षा का केन्द्र।

नागा गोण्ड :- मोरुंग मो जहाँ मोटूर = ज्ञान और रुंग = घट ।

मुण्डा गोण्ड :- गीती ओरा जहाँ गीती= ज्ञान और ओरा = घट और

भुईया गोण्ड :- धग्गर वस्सा – विद्यास्थल इस प्रकार अनेको नाम से संचालित है।

गोंडवाना गोटुल में कोयतूर समुदाय पुनेम प्रणाली से जीवन को सफल बनाने के लिये कार्य योजना, पंडुम प्रणाली, बानी  (गोंडी भाषा में), पुनेम प्रणाली – टोण्डा, मण्डा, कुण्डा को निचले स्तर से सीखते हुए आगे बड़ते है । इस गोटुल में शिक्षा पूर्ण अनुशासन के साथ दी जाती है और हर काम अनुशासन के साथ किया जाता है। इस शिक्षा प्रणाली में कोयतूर लया-लयोरों (छात्र-छात्राएं) को बुद (गोंडी भाषा) = ज्ञान / मस्तिष्क के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने हुए, उनकी क्षमता के अनुसार पढ़ाया जाता है।

इस गोटुल शिक्षा प्रणाली के कारण महान हड़प्पा, मोहन जोदड़ो जैसी सभ्यताओं का जन्म हुआ। पांच खण्ड भूमि में “मूंद शुल हर्रि” के सिद्धांत के माध्यम से शिक्षा का प्रसार किया। इस गोटुल में शिक्षक प्राकृतिक के बीच रह कर प्रयोग करते पढ़ाते है, जिससे छात्र रटने के बजाय समझते हुए अध्ययन करते है। इससे शिक्षक और छात्र के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे चीजें बहुत जल्दी सीख जाती हैं। इस प्रणाली को “खेल खेल में शिक्षा का सिद्धांत” कहा जाता है। जिसमें पुरुड़ नियमों के हजारों अध्ययनों के फलस्वरूप शिक्षा प्राप्त हुई है।

गोटुल कर्सना(असंख्य प्रकार के), गोण्डी लैंग्वेज का संरक्षण, गोण्डरी, गण्ड, गोण्ड, गोटुल, गायता, गुड़ी, गोंडवाना, नार्र व्यवस्था, रेला पाटांग -डिटोंग, पंडुम, जात्रा, रेला पाटा से हजारों वर्षों की इतिहास, गोण्डरी, वेडा-डोडा, कोनाड़, गोडुम आदि की उच्चतम तकनीक, पुरुड़-पुकराल की रहस्यमयी जानकारी, पेन-पुरखा, बानी-बिरादरी की जानकारी, 18 (लिंगो) : 12 (भिमा लिंगों) के वाद्य यंत्रों के सुर ताल की जानकारी, कोयतूर वस्तुओं अदला बदली का बाजार (वस्तुओं का आदान-प्रदान) जैसे असँख्य शिक्षा दिया जाता है जिससे लया-लयोरो परिपक्व हो सके और आने वाली पीढ़ी को पुनः पुनेमी ज्ञान (गोटुल शिक्षा) के लिए तैयार कर सके।  

यह गोटुल शिक्षा कोयतूर के जिर्र (डीएनए) और समुदाय के प्रत्येक नेंग दस्तूर, रीति-रिवाज में है तथा गोटुल से सीखे गए ज्ञान के अनुसार काम करते हैं। गोटुल शिक्षा में लया-लयोर(छात्र-छात्राएं) परिपक्व और पन्डना = परिपक्व किया जाता है। तभी मर्मिंगमण्डा की अनुमति होती है। जिस प्रकार एक टोण्डा (नार्) से स्वस्थ फल प्राप्त करने के लिए उसे मण्डा चढ़ाया जाता है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक रूप से स्वीकृत गोटुल शिक्षा प्राकृतिक के ज्ञान से बनी है। दूसरी ओर, असभ्य और पथभ्रष्ट दिकु गोटुल शिक्षा प्रणाली की गंदगी सोच रखने वाले गोतुल की गलत व्याख्या करने पर तुले हुए हैं, यह दिखाने के लिए कि वह सभ्य है, एक विचारशील रणनीति के साथ। उन्होंने गोटुल का नाम घोटुल रखा, जो अर्थ का अनर्थ बन गया है। गोतुल को एक संभोग गृह के रूप में वर्णित किया गया है, जो कोयतूर समुदाय की संस्कृति, शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने की एक चाल है। दिकु ने अपना गुरुकुल चालू किया ताकि लोगो को अपना इतिकास पड़ाकर मानसिक गुलाम बना सके ।  

गोटुल शिक्षा व्यवस्था अनन्त है, कोया पुनेम अनन्त है। पुरुड़ जोहार..! गोटुल जोहार…! पुकराल जोहार..! बुमकाल जोहार..! ✒

नयताम तुलसी (कोयतूर तकनीक, गोटुल एजुकेशन सिस्टम, कोया पुनेम, और ए. डी. डब्ल्यू.!)

के.बी.के.एस.उ.ब. काँकेर!

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?बी एस परतेती? (प्रदेश अध्यक्ष) गोंड समाज महासभा मध्यप्रदेश


कोयतूर सभ्यता का विकास क्रम

DNA Report 2001 में साबित हुआ कि उच्च जाति के भारतीय पुरुष यूरोपीय है

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