Gond-Raja Bakt-buland-Shah-Uikey
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गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके जी की जयंती 30 जुलाई । गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके उर्फ महिपत सिंह ऊईके

गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके जी की निम्नलिखित जानकारी

1. नागपुर की स्थापना

2. औरंगजेब ने की थी मदद

3. देवगढ़ से हिंदी का आगमन

4. बख्त बुलंद की मुत्यु

5. गोंड राजाओं का कालखंड

गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके ने बारह छोटे गांवों को मिलाकर नागपुर शहर को बसाया, जिन्हें पहले राजापुर बरसा या बरस्ता के नाम से जाना जाता था। बख्त बुलंद शाह उइके राजगोंड वंश के शासक थे। उसने अपने राज्य चंदा, सिवनी, मंडला के क्षेत्रों, बालाघाट, भंडारा और नागपुर के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया। इसने खेरला के पास के राजपूत साम्राज्य पर भी कब्जा कर लिया। वर्तमान में बैतूल और छिंदवाड़ा जिले भी उसके नियंत्रण में आ गए थे। एक महान योद्धा ने डोंगरताल, पौनी, कटंगी और सिवनी पर भी विजय प्राप्त की।

♧♧♧ नागपुर की स्थापना♧♧♧

लगभग 317 साल पूर्व यांनी 1702 में कई कस्बों और गांवों की स्थापना हुई। सभी छोटे गांवों को मिला दिया गया। इतिहास उन्हें नागपुर शहर के संस्थापक के रूप में पहचानता है। नागपुर नगरी की स्थापना गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके प्रथम ने की थी औरंगजेब से मिलने के बाद बख्त बुलंद शाह ऊईके देवगढ़ से यहां आए। यहां 12 गांवों को जोड़ कर नागपुर नगरी की स्थापना किया गया।

इन 12 गांवों के नाम 1.राजापुर, 2. रायपुर, 3.हिवरी, 4.फुटाला, 5.हरिपुर, 6.सीताबर्डी 7.वानडे, 8.आकरी, 9.लेडरा, 10.सक्करदरा, 11.गाडगे, 12.भानखेडा, शामिल थे।

इनमें से कुछ नाम समय के साथ बदल गए हैं।

उन्होंने गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ा और जरूरत के मुताबिक बाजार बनाए। इस प्रकार नागपुर का धीरे-धीरे विकास होता गया। अपने राज्य को उचित आकार देने के बाद, उन्होंने लोगों को बसने के लिए प्रोत्साहित किया और इस प्रकार व्यापार और वाणिज्य की सुविधा प्रदान की। उनका शासन महान सुधारों के युग का प्रतीक है। कृषि, व्यापार और वाणिज्य ने काफी प्रगति की। उन्होंने नागपुर किले में एक मस्जिद का निर्माण किया जिसने नागपुर में इस्लामी धर्म और संस्कृति का परिचय हुआ और शुरुआत  की।

☆ ▪☆औरंगजेब ने की थी मदद☆▪☆

बख्त बुलंद मुगल सम्राट, औरंगजेब की सेवा में शुरू होता है। इतिहास कारो के अनुसार औरंगजेब ने मदद की इसके पीछे राजा साहब की मजबूरी थी। वे अपना राज-पाट छोड़ कर यहां आए थे। राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके को देवगढ़ की गद्दी मिली जब के तत्कालीन राजा कोकशाह के मुत्यु पश्चात । यह बात राज परिवार के कुछ सदस्यो को खली। उसने बख्त बुलंद शाह उइके को खत्म करने की योजना बनाई। जैसे ही उसे इस बात का अहसास हुआ, बख्त बुलंद शाह ऊईके देवगढ़ से पलायन किया और मदद के लिए औरंगजेब के पास गया।

औरंगजेब ने उसे आश्वासन दिया कि वह उसकी मदद करेगा, लेकिन व्यापार जारी रखने के लिए एक शर्त रखी। औरंगजेब ने उसकी शर्त मान ली और उसकी मदद की।

उन्होंने इस्लाम को गले लगाया और आधिकारिक तौर पर मुगल दरबार द्वारा देवगढ़ के राजा के रूप में मान्यता प्राप्त है । कहा जाता है कि बख्त बुलंद शाह उइके ने बाद में मुगलों के खिलाफ विद्रोह किया और मराठों के खिलाफ मुगल युद्ध के दौरान उनके क्षेत्र का हिस्सा जब्त कर लिया।

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♤ ♤देवगढ़ से हिंदी का आगमन♤ ♤

उन दिनों जब शाही परिवार का साम्राज्य था, गोंड राजाओं के पास अपने सिक्के हुआ करते थे। आज वंशजों(हम) के पास एक भी सिक्का नहीं है। हिन्दी भाषा को नागपुर लाने का श्रेय भी राजा बख्त बुलंद शाह को ही जाता है। शहर की स्थापना के बाद उसके द्वारा बनाए गए सिक्के हिंदी में थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिन्दी भाषा देवगढ़ से ही नागपुर में आई है।

♢♢♢ बख्त बुलंद की मुत्यु♢♢♢

1709 के आसपास राजा बख्त बुलंद शाह ऊईके की मृत्यु हो गई। इतिहासकार उनकी मृत्यु की सही तारीख पर मतभेद हैं।

बख्त बुलंद शाह के बाद राजा चंद सुल्तान ने गद्दी संभाली। चांद सुल्तान ने शहर में जरूरत के हिसाब से कई काम किए। उन्होंने शहर में पांच महाद्वारों का निर्माण किया। वर्तमान गांधीसागर बनाम जुम्मा तालाब और महल का प्रसिद्ध गांधी द्वार उनका योगदान है।

उस समय गांधीसागर तालाब से 12 गांवों (नागपुर) को पानी की आपूर्ति की जाती थी। तालाब का 25 प्रतिशत ही बचा है।

¤¤¤¤ गोंड राजाओं का कालखंड ¤¤¤¤

1)राजा जाटबा 1580-1620

   ( देवगड़ के संस्थापक )

2)राजा कोकशाह कालवधि उपलब्ध नाही

3)राजा बख्त बुलंद शाह 1686-1709

   (इन्होंने 1702 को नागपुर बसाया )

4)राजा चांद सुल्तान 1709-1735

   (इन्होंने गांधी गेट (जुम्मा द्वार) और महल स्थित जुम्मा (शुक्रवारी) तालाब बनाया)

5)राजा वली शाह 1735-1738

6)राजा बुरहान शाह 1743-1796

7)राजा बहराम शाह 1796-1821

8)राजा रहमान शाह 1821-1852

9)राजा सुलेमान शाह 1852-1885

10)राजा आजम शाह 1885-1955

11)राजा बख्त बुलंद शाह दिवतीय 1955

नागपुर-देवगढ़ राज्य का एक राजकुमार। देवगढ़ के अगले राजा चंद सुल्तान थे, जो मुख्य रूप से पहाड़ियों के नीचे ग्रामीण इलाकों में रहते थे, उन्होंने नागपुर में अपनी राजधानी स्थापित की, जिसे उन्होंने एक दीवार वाले शहर में बनाया। 1739 में चांद सुल्तान की मृत्यु पर, बख्त बुलंद के एक नाजायज बेटे वली शाह ने सिंहासन हथिया लिया और चांद सुल्तान की विधवा ने अपने बेटों बुरहान शाह और अकबर शाह के हितों में बरार के मराठा नेता रघुजी भोंसले की मदद ली।

सूदखोर को मौत के घाट उतार दिया गया और सही वारिसों को सिंहासन पर बिठा दिया गया। 1743 के बाद, राघोजी भोंसले से शुरू होकर, मराठा शासकों की एक श्रृंखला सत्ता में आई, जिन्होंने 1751 तक चंदा, देवगढ़ और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।

1803 में राघोजी द्वितीय द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ पेशवा में शामिल हो गए, लेकिन अंग्रेजों की जीत हुई। 1816 में राघोजी द्वितीय की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र परसाजी को मुधोजी द्वितीय द्वारा अपदस्थ और मार डाला गया था। यद्यपि उन्होंने उसी वर्ष अंग्रेजों के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, मुधोजी 1817 में अंग्रेजों के खिलाफ तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध में पेशवा में शामिल हुए, लेकिन वर्तमान नागपुर में सीताबुल्दी में हार गए। एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया भीषण युद्ध क्योंकि इसने भोंसले के पतन की नींव रख दी थी और नागपुर शहर के ब्रिटिश अधिग्रहण का मार्ग प्रशस्त किया। सिंहासन पर एक अस्थायी बहाली के बाद मुधोजी को हटा दिया गया था, जिसके बाद अंग्रेजों ने राघोजी द्वितीय के पोते, राघोजी को सिंहासन पर बिठाया। राघोजी के शासनकाल के दौरान (जो 1840 तक चला), एक ब्रिटिश निवासी द्वारा इस क्षेत्र का प्रबंधन किया जाता था। 1853 में, राघोजी की मृत्यु के पश्चात, अंग्रेजों ने बिना वारिस के नागपुर पर कब्जा कर लिया।

—-संकलन,

दिनेश शेराम,

अध्यक्ष,

अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद नागपूर विभाग,

सिनेट तथा प्रबंधन समिती सदस्य,

रा.तू. म.नागपूर विश्व विद्यालय


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