Dr-Bhanwar-Singh-Porte
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गोंडवाना गौरव परिवार में जन्में, जननायक, म. प्र. आदिवासी विकास परिषद के संस्थापक, अविभाजित मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री, विधायक, उपमुख्यमंत्री एवं राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य, डॉ०भँवर सिंह पोर्ते जी को शत् शत् नमन??

डॉ० भँवर सिंह पोर्ते जीवन परिचय

गोंडवाना शासन सत्ता के लिए प्रतिबद्ध रहकर कोयतूर समाज को सदैव राजनीति से उपर रख कर राजनीति करने वाले राजनेता। समाज के प्रति स्वाभिमान व समर्पण सेवा के रूप में प्रयाय।

डॉ०भँवर सिंह पोर्ते का जन्म 01 सितम्बर 1943 को एक ग्राम बदरोड़ी, मरवाही, जिला – बिलासपुर, छत्तीसगढ़ (अविभाजित मध्यप्रदेश) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा ग्राम – सिवनी में हुई। हाईस्कूल एवं उच्चत्तर माध्यमिक परीक्षा पेण्ड्रा से उत्तीर्ण की। डाॅ०पोर्ते विद्यार्थी जीवन से ही कोयतूर शोषण के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेते रहे।

डॉ०भँवर सिंह पोर्ते ने अपने राजनैतिक जीवन के साथ सामाजिक क्षेत्रों में कार्य किए। सन् 1972 में प्रथम बार विधानसभा का चुनाव लड़े और विजयी हुए। वे मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल में विभिन्न पदों पर रहे। वे उपमुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री, जनजाति कल्याण एवं विकास, जनशक्ति मंत्री, पंचायती राज मंत्री, विद्युत मंत्री, लघु सिचाई मंत्री आदि रहे। उन्हें जो जिम्मेदारी मिली, उसका बखूबी निर्वहन किया।

डाॅ०पोर्ते एक आदर्श, चरित्रवान एवं ईमानदार जननेता थे। वे विद्यार्थी जीवन से ही कोयतूर शोषण के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेते रहे। कोयतूरों की सेवा भावनाओं का उद्देश्य लेकर अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के संस्थापक, अध्यक्ष कार्तिक उरांव जी की प्रेरणा से आपने मध्यप्रदेश में आदिवासी परिषद की स्थापना की। उन्होंने कोयतूरों में अलख जगाया। सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के दूरस्थ कोयतूर अंचलों का दौरा कर उनके अधिकारों एवं स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्हें सचेत किया।

मध्यप्रदेश शासन में लगातार मंत्री-उपमुख्यमंत्री रहते डॉ०पोर्ते के कार्यकाल के दौरान विकास के कई नए आयाम स्थापित हुए। उस समयाकाल के स्थानीय कई वरिष्ठजनों ने बताया कि डॉ०पोर्ते के बड़े भाई श्री स्वरूप सिंह पोर्ते का क्षेत्र में अधिक नाम था और बेहद सम्मनीय माने जाते थे। चूंकि डॉ०पोर्ते रीवा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे इसलिए प्रथम चुनाव में डॉ०पोर्ते की पहचान, स्वरूप सिंह पोर्ते के छोटे भाई के रूप में की जाती थी। डॉ०पोर्ते और उनके जीवन को जानने वाले कुछ वृद्ध लोगों ने कहा कि उनके तीन सलाहकार या करीबी दोस्त, श्री बेन सिंह, श्री चेन सिंह और श्री हरि सिंह, डॉ०पोर्ते का राजनीतिक कार्यकाल को सुनहरा बनाने में मदद की।

उस समय जब गांवों में पुल, पुलिया, सड़क आदि जैसे विकास कार्यों को लेकर डॉ०पोर्ते ने अपने करीबियों से सलाह मशविरा किया तो श्री बेन सिंह ने सुझाव दिया कि इसके बजाए गांवों गांवों में स्कूल स्थापित किया जाना चाहिए। श्री बेन सिंह के इस सुझाव से सभी सहमत हुए। जिसके चलते यहां पर स्कूलों की संख्या काफी अधिक है। स्कूल शिक्षा के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि श्री बेन सिंह के क्षेत्र से 5-6 डॉक्टर्स, कई इंजीनियर्स, कई विभिन्न विभागों के शासकीय उच्च पदों पर पहुंच सके। श्री चेन सिंह और श्री हरि सिंह के क्षेत्रों से कई डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, शासकीय नौकरियों में गए। हालांकि, डॉ०पोर्ते की मृत्यु के बाद, उस क्षेत्र में विकास नहीं हुआ, जिसके वह हकदार थे।

16 नवंबर 1993 को चुनाव प्रचार के दौरान डॉ०पोर्ते का निधन हो गया। जिसके बाद लोगों ने एक अच्छे राजनेता को खो दिया।

कोयतूर वर्ग के कल्याण के लिए डाॅ०पोर्ते का योगदान अविस्मरणीय है। उनके निधन के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कार्यों के लिए उनके नाम से सार्वजनिक स्कूलों और कालेजों को खोला गया। साथ ही कोयतूरों के विकास व उत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों एवं स्मृति को चिर-स्थायी बनाने के लिए छत्तीसगढ़ शासन ने डॉ०भँवर सिंह पोर्ते सम्मान स्थापित। आप हमेशा से गौरेला-पेंड्रा-मरवाही की शान रहें हैं।

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