दियारी सियासी
दियारी सियासी

डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” (Dr. Suraj Bali ‘Suraj Dhurve’)

कोया पुनेम के संस्थापक मुठवा पारी पहाण्दी कुपार लिंगों ने कोयामुरी द्वीप पर मनुष्यों के लिए पहली चावल की फसल की शुरुआत की थी, इसलिए चावल मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। आज भी अधिकांश भारत में, मनुष्य चावल आधारित कृषि पर जीवित रहते हैं।

प्रकृति पर आधारित जीवन जीते जीते मानव ने अपने आस पास शिकार की संभावनाओं को देखा और समय बीतने के साथ साथ कृषि को अपनाया। कृषि को हम अचानक से नहीं करने लगे, बल्कि वन से एकत्र करके लाये गए बीज, पेड़ का डंठल और फल-फूल को उपयोग करने के बाद मनुष्य उसे इधर उधर फेंक देता था और उन महत्वपूर्ण फसलों के पेड़ जो फेंके गए थे और फिर वे चीजें उगने लगे। इससे विचार आया खेती करने का। इसके बाद कृषि के लिए मानव श्रम की आवश्यकता आई, जिसके विकल्प के रूप में पशुओं को पालतू बनाया गया और उनकी अपनी सुरक्षा और कृषि कार्य के लिए उपयोग किया गया।

पशुपालन और कृषि की स्थिति तक इस प्राचीन देश को यहाँ उपलब्ध खाद्यान्नों की प्रचुरता के कारण सोने की चिड़िया कहा जाता था। चूंकि वनों में मनुष्य के लिए उपयोगी प्राकृतिक संसाधन वनस्पति और प्रकृति पर निर्भर महत्वपूर्ण अनाज की खेती, प्रकृति से जोड़कर कृषि को देखा जाने लगा। खेती में उपजाने वाले हर एक दाने के लिए फड़ापेन (वायु, मिटटी, पानी, अग्नि, आकाश) की कृपा समझा जाने लगा। हर बार जब कोई नई फसल पकती थी, तो वह सबसे पहले प्रकृति शक्ति, फड़ापेन को समर्पित होती थी। उसके बाद, उस फसल का समर्थन करने वाले जानवरों को एक हिस्सा दिया जाता है। चूँकि हमने अपने पूर्वजों से कृषि, खेती और पशुपालन सहित जीवन के सभी तरीके सीखे हैं, इसलिए हम भी उनके आभारी हैं। पर्व के माध्यम से सिखाई गई प्रथाओं और विधियों के लिए उन्हें धन्यवाद देने के लिए कई उत्सव आयोजित किए गए।

(सियासी फसलों का संचय और प्रकृति की शक्तियों के प्रति उनका समर्पण)

भारत की कृषि प्रणाली में, फसलों को दो मुख्य समूहों में विभाजित किया जाता है, पहला, उन्हारी फसल (रबी) और दूसरा, सियारी फसल (खरीफ)। वंजी (धान) सियारी की मुख्य फ़सल होती है इसलिए पूरे सियारी फ़सल(धान, उडद, जिमीकन्द, सिंघाड़ा, गन्ना इत्यादि) के स्वागत के लिए ये पर्व मनाया जाता है, इसलिए इसे सियारी पंडुम भी कहते हैं। धीरे-धीरे इसे पर्व का स्वरूप अन्य आयातित संस्कृतियों के लोगों ने पूरी तरह से बदल दिया और आज पूरा देश इस त्योहार को दिवाली या दीपावली के नाम से मनाता है।

गोंडी भाषा में पूनल का अर्थ नया और वंजी का अर्थ धान होता है। यानी पूनल वंजी यानी नया चावल। कोइतुर संस्कृति में, अंधेरी पाख में आयोजित पर्व को पंडुम कहा जाता है और उजियारी पाख में आयोजित पर्व को पाबुन कहा जाता है।

आमतौर पर नई चावल की फसल पूरी तरह से पक जाती है और कार्तिक अमावस्या तक कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

इसी खुशी में पर्व के रूप में मनाते थे, इस पर्व का नाम पूनल वंजी पंडुम पड़ा। इस फसल का भंडारण कार्तिक पूर्णिमा तक पूर्ण होता है और वंजी साजोरी पाबुन कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित होता है।

ये प्राचीन परंपराएं आज भी हमारे कस्बों और बस्तियों में जीवित हैं और इन्हें देखा और समझा जा सकता है। बिना कृषि को समझे हुए इस प्राचीन देश की खूबसूरत और महान कोया-पुनेमी संस्कृति और आपके मन और शरीर को आनंद से भरने वाले पर्वों और उत्सवों को समझना बहुत मुश्किल है।

जब हम किसी त्यौहार या पर्व की सच्चाई भूल जाते हैं तब उसमें झूठी कहानियों, झूठे और अप्राकृतिक कर्मकांडों और प्रकृति एवं मानव को हानि पहुँचाने वाले अवयवों का बलात प्रवेश हो जाता है। बाद में इन झूठों और अप्राकृतिक बातों को सच मान लिया जाता है और हम सब उसी गलत का पालन करने लगते हैं और सदियों तक मूर्खता के आड़ में गलत तरीके से तीज का त्योहार मनाते रहते हैं।

(ग्राम्य देवता का सम्मान और गोंगो)

कोया-पुनेमी संस्कृति में, एक दिन में कोई पाबून या पांडम (तीज उत्सव) नहीं होता है। ये त्यौहार पूरे हफ्ते या पूरे पाख भर चलते हैं क्यूंकि इनमें कई भाग होते हैं इसलिए इन त्योहारों को एक दिन में नहीं मनाया जा सकता। ये प्राचीन त्यौहार किसी के जन्मदिन या स्मारक दिवस की तरह नहीं हैं जो एक ही दिन मनाया जाता है।

आइए इन पर्व की उत्पत्ति को देखें और वर्तमान संदर्भ में उनकी उपयोगिता का पता लगाएं। इन पांच प्रमुख प्राचीन प्रणालियों के सम्मान में कोई भी पर्व मनाया जाता है। सियारी फसल (मुख्य रूप से चावल) के उत्सव की व्याख्या करने के लिए, इन पांच प्रणालियों और उनकी मान्यताओं को समझना आवश्यक है।

???पुकराल ता मिजान (प्राकृतिक व्यवस्था)

??गोटुल ता मिजान (संस्कार केंद्र की व्यवस्था)

??नार ता मिजान (गाँव की व्यवस्था)

??नेल्की ता मिजान (खेती की व्यवस्था)

??रोन ता मिजान (घर की व्यवस्था)

सियासी फसल
सियासी फसल

चूँकि मानव जीवन में प्रकृति का बहुत बड़ा योगदान है और मनुष्य प्रकृति को एक शक्ति के रूप में देखता है और ऐसा मानता है कि प्रकृति की शक्ति (फड़ापेन) के बिना उसका जीवन संभव नहीं है, इसलिए वह अपने जीवन के लिए तैयार की जा रही खेती में प्रकृति की भूमिका और सहयोग का आह्वान करता है, प्रकृति शक्ति का गोंगों (पूजा अर्चना) करता है। यह गोंगों पूरे फसल के विभिन्न पड़ावों पर सम्मान किये जाते रहते हैं। फसलो को सम्मान करने के लिए विभिन्न चरणों में इनका गोंगो(पूजा) की जाती है।

गोटुल (संस्कार केंद्र) में सामाजिक, घरेलू, व्यावसायिक पारिवारिक और सुरक्षात्मक शिक्षाओं इत्यादि का पठन-पाठन किया जाता है। गोटुल का मुठ्वा(शिक्षक) लया-लायोरों (छात्र-छात्राओं) को सफलता पूर्ण जीवन यापन करने के लिए शिक्षित प्रशिक्षित करता है। अंधियारी पाख के दौरान ही जंगल से जड़ी-बूटियों का संकलन और इसका भंडारण भी इसी अंधियारी परेवा से त्रयोदस (धनतेरस) तक किया जाता है। बैगा के लोगों को सभी जंगली जड़ी-बूटियों का ज्ञान देने वाले महान मुथवा गुरु धनेत्तर बैगा को सम्मान दिया जाता हैं। धनतेरस के दिन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए धनेत्तर गोंगो( धन्नेत्तर बाबा की पूजा) संपन्न होती है।

गाँव के भीतर खेती करने के लिए कई गाँव के पेन शक्ति और वेन शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है जैसे कि खैरो दाई, भीमल पेन, आदि, और ये वही पूर्वज हैं जिन्होंने कृषि से संबंधित परिष्कृत ज्ञान, विधियों और तकनीकों को मनुष्यों तक पहुँचाया। हम प्रार्थना करते हैं कि आपके योगदान को याद किया जाएगा और सम्मानित किया जाएगा। ‘जांगो लिंगो लाठी गोंगो’ उन पर्व में से एक है जो इस सियारी पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कृषि समाज के अन्य लोगों और पशुधन सहित कई लोगों की मदद और सहयोग से हासिल की जाती है इसलिए फसल पकने पर इनको भी धन्यबाद और सम्मान दिया जाता है। खेती-किसानी में मदद करने वाले नेंगी जैसे कुम्हार, अगरिया(लुहार), बढ़ई, अहीर, गायता, चमार, बैगा आदि को भी सम्मनित करते हुए धन्यवाद दिया जाता है और उन्हें फसल का कुछ हिस्सा दिया जाता है।

(भैसों को खिचड़ी खिलाने की रस्म)

इसी तरह, सांड, बैलों और भैंसों जो खेतों की जुताई में मदत करने हैं उन्हें नहलाया जाता है और खिचड़ी (ताजा चावल दलिया या पका हुआ भोजन) खिलाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। कोंदाल (बैल), बुकुर्रा (सांड), बोदाल (भैंसा) को पेन के रूप में आदर सम्मान भी दिया जाता है।

(बैलों के सम्मान की निशानी के रूप में नए बर्तन में नए खिचड़ी चावल खिलाना)

घर की व्यवस्था देने वाले समस्त पेन वेंन शक्ति का भी सम्मान किया जाता है। घर की व्यवस्थाओं को देने वाली पंडरी दाई, मुंगार दाई, कुसार दाई, इत्यादि को सम्मान देते हैं और उनकी द्वारा बताये गए तौर तरीकों से ही फसलों का भण्डारण, साफ़ सफाई, सुरक्षा और वितरण करते हैं।

बारिस के बाद कच्चे मकानों और घरों में नमी व् सीलन सहित बहुत सारे सांप-बिच्छू, जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों, कीट-पतंगो का आवास बन जाता है। अपने पुरखों द्वारा बताये गए तौर-तरीकों से पूरे घर की साफ़-सफाई की जाती है, बिलों और दीवारों की दरों को भरकर लीपा-पोता जाता है। घरों की साफ सफाई किया जाता है। कुम्हार और बनसोड के यहाँ से मिटटी और बांस के नए बर्तन लाये जाते हैं जिनमें धान का भण्डारण किया जाता है।

कार्तिक अधियारी पाख के परेवा से अमावस्या (14 दिनों) तक घर में महुआ के बीज जे तेल से दीपक जलाया जाता है। महुए के तेल को गोंडी भाषा में ‘गुल्ली नी’ (गुल्ली का तेल) कहते हैं। महुए के तेल से दीपक जलाने पर बारिश के समय से घर को नुकसान पहुचे वाले कीट-पतंगे और जीव-जन्तु घर से बाहर हो जाते थे और धान के भंडारण के बाद उनका नुकसान नहीं कर पाते थे. इसलिए कहीं-कहीं इसे कोया-दियारी (महुआ के तेल के दीपक का त्यौहार) भी कहते हैं। चूंकि ये दीपक सियारी की फसल को बचाने और रोशन करने के लिए जलाए जाते हैं, इसलिए इस त्योहार को “सियारी दीयारी पंडुम ” भी कहा जाता है। आज भी दीपक या दिए को गाँव में दियरी कहते हैं जिसका स्वरूप ‘सियारी दियरी’ से ‘सियारी दियारी’ हुआ और उसके बाद में दीवाली हो गया; और बाजारीकरण के कारण अब यह दीपावली या दीपोत्सव या दीप पर्व हो गया है। एक पुरानी कहावत जो उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है “चल दियरी चल कोने के, बारह रोज ढिठौने के.” जिसका अर्थ है कि आज दीपक जलाएँ गे (दियारी) उसके बारह दिन बाद(एकादसी के दिन) गन्ने की फ़सल पक जाती है। इसे ही गन्ने की ‘नवा खवाई’ पर्व कहते हैं।

धान के फसल के आधार पर नए रिश्तों (शादी-विवाह) की शुरुवात भी होती है जिसे हम ‘मंडई’ के नाम से जानते हैं। चावल की फसल का पर्व जीवन में खुशियाँ लाता है और कोइतूर अंधेरी पाक से कटाई, पिटाई, सुखाने, चावल की सफाई और फिर अमावस्या के दिन चावल (एक पाख, जिसका अर्थ 14 दिन) का भंडारण करता है।

कार्तिक महीने की अंधियारी पाख के चौदहें दिन धान की सफाई, मड़ाई, सुखाने और भण्डारण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। अमावस्या के दिन पूरे खेतों को, खलिहानों को, बैलों के बांधने की जगह, घरों और अन्न भंडारों पर दीपक रख कर पूरा ‘कोया विडार’ (कोइतूर समाज) नए नए पकवान बनाता है और नए कपड़े पहनें और नई चावल की फसल का जश्न मनाएं जिसे पूनल वनजी पंडुम कहा जाता है। इसी मूल पर्व को आज दिवाली या दीपोत्सव कहा जाता है।

किसान धान की अच्छी फ़सल पर खुशी मनाते है। इसी धान अन्न से कोइतूर लोग अपने जीवन के लिए अन्य जरूरी चीजें विनिमय करके प्राप्त करते थे। इसलिए इसे धन के रूप में भी जाना जाता है। इस गुण के कारण, धान को धन की देवी या अन्ना पूर्णा देवी कहा जाता था और लोगों ने बाद में इसे लक्ष्मी के साथ जोड़ा क्योंकि चावल का आदान-प्रदान अन्य आवश्यक घरेलू सामान खरीदने के लिए किया जाता था।

जिस दिन से भण्डारण का कार्य पूर्ण हो जाता है उस दिन से अगली पूर्णिमा तक भण्डारण संरक्षण की तैयारी पूरी कर ली जाती है, जिसे ‘वंजी सजोरी पाबून’ कहते हैं। कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन तक धान का एक चक्र पूरा होता है। यानी जहां से धान निकालकर खेतों में पहुंचाया जाता था। वहां से अपना जीवन चक्र पूरा करने के बाद, यह उसी स्थान पर लौट आया जहां इसे निकाला गया था।

यह पर्व पूर्ण रूप से कृषि उत्सव है जिसमें प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त किया जाता है न कि बम बारूद जलाकर प्रकृति का अपमान।

(प्रकृति शक्तियों का सम्मान)

आइये अपने घरों को साफ सफ़ाई कर के दीप जलाकर धान के भंडारण की व्यवस्था को पूर्ण करने के समय गायन, वादन और नृत्य के साथ प्रकृति के प्रति आस्था, कृतज्ञता और आभार व्यक्त करें और सियारी पंडुम या पूनल वंजी पंडुम मनाएँ। हम कितना भी विकास कर लें बिना अन्न के हमारा मानव जीवन नहीं रह सकता। इसलिए इस फसल के त्यौहार पर हम सभी अपनी प्रकृति शक्तियों, अपने पशुधन, अपने पूर्वजों, अपने सगा समाज, अपने मुठ्वा, भुमका, और नेंगी सहित सभी शक्तियों का आभार और धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

सभी को कोया पुनेमी “पूनल वनजी पंडुम” की हार्दिक बधाइयाँ।

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(डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” अंतर्राष्ट्रीय कोया पुनेमी चिंतनकार और विचारक हैं व् AIIMS, भोपाल में एडिशनल प्रोफेसर हैं)


फड़ापेन क्या है ?

महावीर भीमाल पेन और वीर हनुमान क्या एक हैं?

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