Ditavariya-parv
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कोयतूर समाज में “दितवारिया पर्व” । वर्षा ऋतु में बुवाई के बाद यह कोयतूरों का पहला पर्व है । दितवारिया पर्व का कोयतूर समाज में विशेष दर्जा प्राप्त है । जिसमें हाथ से बुनाई की हुई रस्सी में नीम के पत्ते, आम के पत्ते, मिर्ची और प्याज़ रस्सी में पिरोकर घर के दरवाजे पर तोरण के रूप में बांध देते है । इसके साथ सुबह-सुबह बिना हाथ पैर धोये अपने अपने खेत में बास के पेड़ की टहनी को काटकर खेत के बीचो-बीच लगाते है ।

दितवारिया की एक खासियत यह भी है की यह पर्व हमेशा रविवार को ही आता है । कोयतूर भाषा में दितवार का मतलब ही रविवार होता है । इसलिए इस पर्व को दितवार के दिन आने की वजह से दितवारिया बोलते है । इस पर्व की कोई तारीख निच्चित नहीं होती है । हर गाँव के मुखिया लोग मिलकर अपने-अपने गाँव के हिसाब से दिन तय कर लेते है । बुआई के बाद खेतो में पहला कोल्पा चलाने के बाद इस पर्व को मनाते है । इस पर्व के दिन लोग अपने-अपने घर चावल और तुअर की दाल को छाज के बनाकर चावल के साथ  खाते है ।

कोयतूरों का नया साल अखाती के बाद में यह साल(वर्ष) का पहला पर्व होता है । एक वर्ष में यह पर्व दो रविवार के दिन लगातार मनाया जाता है । पहले दितवारिया के दिन अपने पूर्वजों याद करते है । अपने पुरखो के गाते ( मूर्ति स्थापना ) की प्रतिमा की पूजा करते है । यही से कोयतूर समाज अपने पारम्परिक गाने जिसको कोयतूर गरबा, ढाक वाद्य, पिया वाद्य को बजाना शुरू करते है और अच्छी फसल आने प्रार्थना प्रकृति माता से करते है । अगले रविवार को दूसरा दितवारिया मनाया जायेगा । इसकी भी कुछ विशेषता है । अशिक्षा की वजह से कोयतूरों कई ऐसे पर्व है जो प्रिंट मीडिया तो दूर की बात  सरकारी तंत्र को पता नही ।

इंजीनियर मयाराम अवाया

जयस मीडिया प्रभारी खरगोन

तहसील भगवानपुरा, जिला खरगोन ( म. प्र. )


गोंड – गौंड – गौण जिसका मूल शब्द ‘गण्ड’ है

छेर छेरा | छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पर्व

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