Raj-Gond
Raj-Gond

कोयतूर गोंड अनादिकाल से गोंडवाना लैंड में रहते आये है भारत गोंडवाना लैंड का एक हिस्सा है। कोयतूर गोंड भारत के प्रथम मूलनिवासी लोग है । कोयतूर लोग भारत में रहे थे इस वजह से भारत का प्राचीन नाम कोयामूरी द्वीप था ।

कोया पुनेम के अनुसार व्यक्ति माँ के गर्भ से पैदा हुआ है, न कि किसी के मुंह, पेट, हाथ या पैर से पैदा हुआ।

गोंडी दर्शन के अनुसार, भारत का पहला नाम गोंडवाना लैंड के रूप से जाना जाता है और दूसरा नाम सिगार द्वीप और तीसरा नाम कोयामूरी द्वीप है।

गोंड जाति के लोग प्राकृतिक पूजक हैं और उनका गोंडी धर्म है। गोंड हिन्दू नहीं हैं । क्योंकि हर गोंडो बोली, अनुष्ठान, संस्कृति, भाषा, धर्म, तीज त्योहार, जीवन, विचार, नैतिकता, और संस्कार और सभ्यता सभी हिन्दूओं से अलग हैं।

? राजगोंड: राजगोंड न तो कोई जाति है और न ही कोई धर्म है, लेकिन गोंडों द्वारा अलग से बनाई गई गोंडों की एक उप-जाति है।

कहा जाता है कि गोंड के लोग गोंड राजाओं को ही राजगोंड बोलते थे।

इतिहासकारों ने कई गोंड राजवंशों के राजाओं को राजगोंड के रूप में संदर्भित किया है, और उन्होंने यह भी दावा किया कि राजगोंड गोंडो द्वारा दिया गया पदवी है।

?गोंडी इतिहासकार “डॉ० सुरेशमिश्रा” ने कहा है कि गोंड लोग उन्हें राजगोंड कहते थे, जो गोंड जनजातियों के बीच एक प्रमुख या राजा हुआ करते थे। क्योंकि वह मुखिया गोंडो के बीच राजपाट चलता था उसी राजा या कुलीन वर्ग की कुलीन शाखा के बीच राज्याभिषेक करते थे। उन्हें राजगोंड भी कहा जाता था। बाद में, उसी राजा के साथ अन्य राजाओं के संपर्क में आने के बाद, गोंड वंश के कई राजाओं ने शैव धर्म अपनाया और कई ने अपनी गोंडी संस्कृति को छोड़कर हिन्दू धर्म में परिवर्तित हो गए।

“स्टीफन_फुश” ने गोंड राजाओं को चार भागों में बांटा है:-

  1. देवगोंड या सूर्यवंशी गोंड- जिन राजाओं ने रतनपुर, रायपुर, रायगढ़, धमधागढ़ क्षेत्र में शासन किया, उन्हें राज गोंड बुलाया गया।
  1. राजगोंड – जिन राजाओं ने चांदागढ़, अलीदाबाद क्षेत्र में शासन किया, उन्हें राजगोंड बुलाया गया।
  1. देवगढ़िया गोंड- खेरला, देवगढ़, भोपाल क्षेत्र में शासन करने वाले राजाओं को कहा गया।
  1. रावेनवंशी गोंड- गढ़ जबलपुर क्षेत्र के गढ़मंडला में शासन करने वाले राजाओं को कहा जाता था।

जबकि दूसरा इतिहासकार जकिंस गोंडो को भौगोलिक के रूप में वर्गीकृत करता है:-

  1. जैसे मंडला के आसपास मंडलहा गोंड,
  2. खटोला, सागर, दमोह, रायसेन के खटुलहा गोंड।
  3. चंदा की झरिया गोंड और देवगढ़ की देवगढ़िया गोंड को कहा है।

इंपीरियल_गजेटियर ने इन्हें दो शाखाओं में विभाजित किया है-

1.राजगोंड: राजगोंड अर्थात कुलीन लोग जो गोंड लोगों का हिस्सा थे, वे अपने वंशजों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी राजा बने।

2.ध्रुव गोंड- ध्रुव गोंड का अर्थ है सर्वसाधारण गोंड, इसका अर्थ है गोंड राजाओं की प्रजा।

जब उनकी वर्तमान स्थिति की बात आती है, तो आज भी गोंडो में वर्गीकरण के बारे में बहुत चर्चा है। आम तौर पर, कोई सामान्य वर्गीकरण नहीं होता है, लेकिन विभिन्न स्थानों में अलग-अलग शाखाएं होती हैं।

लोगो का मानना ​​है कि राजगोंड अन्य शाखाओं से श्रेष्ठ और उच्च कुल के है और दरअसल बात यह है कि वे गोंडो का राज्याभिषेक चलाते थे। लेकिन अगर राजगोंड खुद को गोंडो को नीचा समझते हैं या उनके साथ भेदभाव करते हैं, तो इससे अधिक असंगत और असामाजिक देशद्रोही और कौन हो सकता है? क्योंकि यह अलग जाति नहीं है। यह एक पदनाम है जो गोंडो ने अपने सरदार या राजा को दिया था।

जैसे हम ग्राम पंचायत में मुखिया चुनते हैं, जिसे हम सरपंच या प्रधान कहते हैं, लेकिन अगर कोई सरपंच या प्रधान उसको अपनी जाति बन ले तो यह बुरा नहीं है, लेकिन राजगोंड ने इसे भी जाति बना लिया है।

‘रसेल’ गोंडो में दो कुलीन शाखाओं का दावा करते है कि राजा जो राजगोंड थे और जो खतुल्ला गोंड थे।

‘हस्लाप’ ने गोंडो की 12 शाखाओं में से पहली 04 शाखाओं का वर्णन किया है, वे हैं राजगोंड, कटुल्या, ददवे और रघुवाल के रूप में कोयतूर यानी श्रेष्ठ गोंड कोइतूर बताया है।

‘हस्लाप’ का दावा है कि कोयतूर सभी शाखाओं की सबसे ऊँची और श्रेष्ठ जाति है क्योंकि इसका अपना गोंडी धर्म है, प्रथा, संस्कृति, भाषा है और इस कोयतूर धर्म के संस्थापक पहांदी पारी कुपार लिंगों हैं।

‘गुस्ताव_ओपर्ट’ में यह भी कहा गया है कि कोयतूर का पदवी गोंडो के चार वर्गों पर लागू होता है: राजागोंड, धोली, पाडाल और कभी-कभी कोलाम, मारिया या सहरिया पर ।

? अब सवाल यह है कि राजगोंड अन्य गोंडों से अलग और श्रेष्ठ क्यों माना जाता है और उनकी उत्पत्ति क्या है?

इस संबंध में पहला मत यह है कि राजगोंडों राजपूत की उत्पत्ति गोंडों से वैवाहिक संबंधों से हुए है। उदाहरण के लिए, रानी दुर्गावती एक राजपूत रानी थीं।

इस दृष्टिकोण में प्रमुख पोषक तत्व फोरसीथ है। कुछ अन्य विद्वानों ने भी यही राय व्यक्त की है। दूसरा मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार, राजगों मूल रूप से गोंड थे, लेकिन ऐतिहासिक या सामाजिक कारणों से उन्हें राजगोंड कहा जाता था क्योंकि वे राजा थे। इन ऐतिहासिक या सामाजिक कारणों के बारे में बताते हुए। “ल्यूसीस्मिथ” का कहना है कि उपसर्ग ‘राज’, गोंडों के सत्तारूढ़ राजवंशों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला था, यह उपसर्ग का उपयोग मुखिया गोंड जनजातियों के लिए किया जा सकता था, जो प्राचीन काल में दुसरे प्रदेशों से यौद्ध में जीताते थे।

‘हेमेंडार्फलूसी_स्मिथ’ के दूसरे सुझाव से सहमति प्रकट करते हैं। ‘हिस्लाप’ के अनुसार, गोंड राजवंश अपनी शाही शक्ति के कारण राजगोंडा के नाम से जाना जाने लगा।

पिछले दो तर्कों के अलावा, ग्रियर्सन का एक तीसरा तर्क है:-

यह सामाजिक पृष्ठभूमि से अधिक ऐतिहासिक है। वह कहते हैं कि समय के साथ भारत की आदिम जनजातियों में प्रचलित प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप, कुछ गोंडों ने अपने हिन्दू पड़ोसियों के समाज का हिस्सा बनने लगे और हिन्दुओ के आचार विचार ग्रहण करने लगे। जैसे राजा है तो राजगोंड। सामान्य स्थिति का विश्लेषण करने पर, यह अनुमान लगाया जाता है कि गोंडों की शाखा ने अपनी बाहुबल की शक्ति प्राप्त की और हिन्दू धर्म को अपनाया और खुद को राजगोंड मानने लगी।

वर्तमान युग में, गोंड लोग जो खुद को क्षत्रिय राजगोंड के रूप में मानते हैं, अपने स्वयं के गोंड समाज को भ्रमित करते हैं और स्वयं को श्रेष्ठ मानकर अपने लोगों के साथ भेदभाव करते हैं, वे गोंडियन संस्कृति को ख़त्म कर रहे है और हिन्दू संस्कृति अपना रहे हैं।

?राजगोंडा गोंडो द्वारा बनाई गई एक अलग उपजाति है, जो अपने शानो-शौकत के लिए बनाई गई है। अपनी जाति से खुद को श्रेष्ठ और उच्च मानें। इन लोगों ने राजगोंडा को एक जाति में बदल दिया और गोंडो के कुछ चुनिंदा गोत्रों की नकल की, जो जनजातियाँ गोंड के राजा बने थे।

इन लोगों ने खुद को अपनी जाति से श्रेष्ठ मानने और गोंडी संस्कृति को अस्वीकार करने है और हिन्दू संस्कृति को अपनाया है क्योंकि वे गोंडी धार्मिक संस्कृति के विरोधी हैं। झूठे राजपूत क्षत्रिय राजगोंड बनने के दौरान ये लोग अपनी मूल धार्मिक संस्कृति को भूल गए हैं।

? पन्ना जिले में एक गोंडवाना सामाजिक कार्यकर्ता का दावा है कि राजगोंड एक महान मनुवादी विचारधारा के हैं। ये लोग केवल गोंड जनजातियों के आरक्षण को खाते हैं और गुलामी मनुवादी बनाते हैं और इन राजगोंडों की कोई संस्कृति नहीं है। वे लोग आरक्षण के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर सरकारी नौकरी कर रहे हैं, लेकिन जहां तक ​​अपनी जाति को छिपाने की बात है, वे खुद को क्षत्रिय राजगोंड के रूप में मानने लगे हैं और अपने समाज के लोगो से नफरत करते हैं। यह वही लोग हैं जो सभी क्षेत्रों में कोयतूर का आरक्षण को खाते हैं और खुद को झूठे राजपूत, ठाकुर, क्षत्रिय राजगोंड के रूप में मानते हैं।

राजगोंड को गोंड लोगों का आरक्षण पाने का अधिकार है या नहीं ??????

ऐसे लोगों के आरक्षण को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और जाति प्रमाण पत्र भी रद्द कर दिया जाना चाहिए, जो खुद को झूठा क्षत्रिय राजपूत ठाकुर मानते हैं। इन लोगों को जनजातियों के आरक्षण पाने का कोई अधिकार नहीं है।

? हमारे देश पर गोंड, यादव, भील, जाट और कितने ही अन्य राजाओं ने राज किया, लेकिन इनमें से कोई भी व्यक्ति स्वयं को क्षत्रिय राजपूत ठाकुर नहीं मानता। तो ये राजगोंड लोग कौन से खेत की उपज हैं जिन्हें नकली क्षत्रिय राजपूत ठाकुर समझते है? यह एक दिखावा है और इससे ज्यादा कुछ नहीं क्योंकि जब संवैधानिक अधिकारों और आरक्षणों की बात आती है, तो वही लोग राजगोंड से गोंड बन जाते हैं और खुद को कोयतूर कहने लगते हैं। जब भी कोई अपनी संसकृति को छोड़ कर दूसरो की संसकृति अपनाता है संविधानिक तरीके से उनका आरक्षण समाप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, गुजरात के जनजातियों को आरक्षण हटा दिया गया है और जाति प्रमाण पत्र, जो खुद को झूठा क्षत्रिय राजपूत ठाकुर मानते हैं, को निरस्त कर दिया गया है।

____________

संदर्भ- मध्यप्रदेश का गोंड राज्य, लेखक डा. सुरेश मिश्र

The Tribes and Castes of the Central Provinces of India- Russell, R. V. (Robert Vane)

?????????

✍✍जय गोंडवाना कोयतूर सेवा समिति सैलारपुर

?????????

गोंड समाज महासभा मध्यप्रदेश


गोत्र | गोंडों की गोत्रावली | Gotra

शंभू शेक नरका कोयतूर समाज का पर्व | महा शिवरात्रि

4 COMMENTS

  1. जब चौहान राजा की बेटी रानी दुर्गावती से गौंड राजा दलपत शाह की शादी हुई थी, तभी से गौंड राजगोंड लिखने लगे।

    • Raj gond & khotlaha par ek lekh like ya book milne ki jankari dene ka kast kare chandel raja ki putri ki vivah dalpat shah gond raja se hone ke karan gond gond raja likhne lage

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here