Dewari Tihar, Puja samagri
Gongo samagri

देवारी तिहार क्या है?

~देवारी में डांग कंद, कोचई कंद, जिमी कंद, कुम्हड़ा के उपयोग का विस्तृत आलेख…पढ़ें

देवारी = देव + आरी = देवारी के दिन गांव के समस्त देवी देवताओं की आराधना की जाती है…

गोर्धन पूजा अर्थात गो रूपी धन की पूजा~ सुरोती के दूसरे दिन शुक्ल पक्ष के एक्कम को ??? गो रूपी धन की पूजा की जाती है, अपने अपने घरों में रोटी, बड़ा, नया चांवल का भात, कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा सभी को मिलाकर जानवरों को खिचड़ी खिलाई जाती है, राउत के द्वारा गायों को सुहाई (माला) बांधा जाता है..!

शाम को गोठान में सभी जानवरों ??? को एक साथ रेंगाकर गोर्धन खुंदाते है.. गोर्धन खुंदाते वक्त यह ध्यान दिया जाता है कि कौन से जानवर, गाय या बैल, भैंस या भैंसा पंडवा या पंडिया, किस पैर से अगला या पिछला, दायां या बांया किस पैर से गोर्धन को खुंदा है..? इससे आने वाला अगले साल में कौन सी फसल अच्छी होगी, और बरसात कैसी रहेगी सियान लोग इसका अनुमान लगा लेते है..!

खिचड़ी में कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा का उपायोंग क्यों करते हैं…?

गोंडों के मूल दर्शन किस्से कहानियों और किवदंतियों में नही मिलता, संसार की उत्पत्ति प्रकृति के मातृ शक्ति और पितृ शक्ति के मेल से होती है, गोंडों का सभी परम्पराएं, नेंग- दस्तूर, तीज त्यौहार इसी मूल शक्तियों के आधार पर निर्धारित है..!

आप सभी को मालूम है कि जिस प्रकार धरती को माता और आकाश को पिता मानते हैं, बरसात में आकाश (पिता) से धरती (माता) पर पानी बरसता है, तब धरती माता के गर्भ में नाना प्रकार के जीव जंतु पैदा होते हैं, पेड़ पौधे घास उगते हैं, उसी प्रकार मातृ शक्ति और पितृ शक्ति की मेल से तीसरी शक्ति संतान पैदा होती है..!

प्राकृतिक शक्तियों को मानने व धारण करने वाला समाज प्रकृति को सर्वोपरि मानकर देवारी में नया चावल के भात के साथ कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा को मिलाकर खिचड़ी बनाते हैं, अपना पशुधन को खिलाते हैं, और खुद खाते है..!

कुम्हड़ा :–

धरती और आकाश के बीच आकाशीय मार्ग (अधर) पर फलने वाला इस धरती का सबसे बड़ा फल कुम्हड़ा होता है, जिसका एक फल का वजन एक क्वींटल से अधिक भी होता है, कुम्हड़ा ज़मीन में छत में किसी अन्य पेड़ में कभी नही फलता, ये वहाँ फलता है जहाँ ज़मीन से सीधा संपर्क न हो… जैसे~ कुम्हड़ा खपरैल व घास के घर व लकड़ी के मचान में फलता है… कुम्हड़ा 7 + 5 + 0 = 12 धारी के गोल होते है  जो प्रकृति के (सात देव), सात दिन, सात रात, सात रंग, सात स्वर, सात समंदर,… प्रकृति के प्रतीक और प्रकृति के (पांच तत्व शक्ति)  तथा (धरती, अंडा, गर्भ के गोल आकार) के आधार पर कुम्हड़ा का उपयोग किया जाता है..!

जिमी कांदा :–

जिमी कांदा धरती के गर्भ से मिलने वाला बड़ा कंद होता है, धरती में अन्न का एक दाना डालने पर धरती माता अनेकों दाना देती है, उसी प्रकार जिमी के एक कंद के बदले धरती माता के गर्भ से अनेकों कंद में पैदा देती है, जिमी कंद औषधि का काम करता है, बल वर्धक, खून साफ करता है, व कृमि नाशक है, इसीलिए खिचड़ी में प्रकृति के मातृ शक्ति के अंश के रूप में जिमी कांदा को मिलाते हैं..!

डांग कांदा :–

जमीन के अंदर पैदा होने वाले को कंद और जमीन के ऊपर फलने वाले को फल कहते हैं, लेकिन डांग कांदा वह कंद है जो जमीन के अंदर नही बल्कि आकाशीय मार्ग यानी जमीन के ऊपर अधर में फलता है, डांग कंद पौष्टिक बलवर्धक, खून बढाने की मुख्य औषधि गुणों से परिपूर्ण भोज्य पदार्थ है, जिसे अक्सर जचकी के बाद महिलाओं को खिलाया जाता है… डांग कंद को पितृ शक्ति के अंश के रूप में खिचड़ी में मिलाया जाता है, (इसे हर पुरुष जानता है ज्यादा समझाने की जरूरत नही है)

कोचई कांदा:–

धरती के गर्भ में पैदा होने वाला औषधि वर्धक, शक्ति वर्धक पाचक होता है, इसका प्रमुख गुण चिकनाहट (Lubricant) जो पाचन में सहायक होता है..! इस कंद की चिकनाहट के कारण इसे खिचड़ी में मिलाया जाता है..!

पसेर चावल :-

बिना बोये या बिना हल चलाये पैदा होने वाले अन्न (पसेर चावल) कहते हैं, पहले पसेर चांवल से खिचड़ी बनाये जाने का नेंग था लेकिन पसेर चावल सभी जगह एवं आर्याप्त अनुपात में नही मिलता इसीलिए कोई भी नया चावल का उपयोग खिचड़ी बनाने के लिए की जाती है..!

खिचड़ी का महत्व :–

1 :– खिचड़ी अर्थात अनेकों में एकता का वह मजबूत बंधन का प्रतीक होता है, जिसे कोई अलग नही कर सकता, जिस प्रकार पकी हुई खिचड़ी को एक दूसरे से कोई अलग नही कर सकता. ! अतः खिचड़ी को समाजिक एकता का प्रतीक मानकर उपयोग किया जाता है..!

2 :– जिस प्रकार संसार के संचालन के लिए प्रकृति सभी रूप और सभी शक्तियों का समावेश और सहभागिता जरूरी है….इसी प्रकार प्रकृति के प्रतीक रूप 7 और प्रकृति के मूल तत्व 5 तथा अतः उत्पत्ति का मूल अंडा 0 के प्रतीक रूप में गोंड़ समाज उपयोग करता है,

उक्त आलेख में आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में प्रचलित परम्पराओं के आधार पर लिखा है, जिसे सिर्फ गोंड़ ही नही अपितु अन्य छत्तीसगढ़िया समाज के लोग भी मानते हैं। गोंड़वाना भूभाग में हर सौ पचास किलोमीटर की दूरी पर बोली भाषा, रहन सहन, रीति, नीति, परम्पराएं बदलती गई है..

आलेख में सिर्फ गोंड़ समाज का जिक्र किया गया है उसे अन्यथा न लें, क्योंकि गोंड़ किसी जाति या धर्म विशेष का नाम नही है, गोंड़ समस्त आदिवासियों एवं गोंड़वाना भूभाग के मानव प्रजातियों का मूल है..!!

इसमे कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी है~ खेत मे नया फसल पकने के समय फसल को नुकसान पहुंचाने वाले महू, टिड्डे और अन्य कीट पतंग अंधेरे से उजाले की ओर गांव तरफ आकर्षित होते हैं और जगमग जलते हुए दीए में जलकर मर जाते हैं…इस प्रकार फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीट पतंगों से फसल की सुरक्षा हो जाती है..!

?जय बूढ़ादेव ?

✍ठाकुर विष्णुदेव सिंह पडोटी

राष्ट्रीय प्रवक्ता

केन्द्रीय गोंड़वाना महासभा


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कोयतूरों के पेनठाना की पहचान कैसे करें..?

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