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‘कार्ल मार्क्स’ ने क्यों कहा था कि “धर्म अफीम है” । ‘बेंजामिन फ्रैंकलिन’ ने क्यों कहा था कि “दुनिया में सांसारिक प्रपंचों से मुक्ति धर्म के न होने से ही संभव है” । अब जब कोरोना वायरस आया तो सब चर्च, मंदिर, मस्जिद बंद कर धार्मिक लोग भाग गए ।

अब केवल अस्पताल और विज्ञान काम आ रहा है । चिकित्सक और वैज्ञानिक काम आ रहे है । भारत जैसे देश में आस्था के नाम पर बहुत लड़ते है । चर्च, मंदिर, मस्जिद के नाम पर, धर्मांतरण नाम पर लड़ते हैं। अब कहां गए ये धार्मिक ब्राह्मण पंडित, मोलवी, पादरी लोग? जो झूठे और फरेबी फैलाते हैं। डर के मारे सब धार्मिक नेता भाग गए।  

धर्म झूठ है ! प्रकृति मात्र सत्य है !  

कोरोना ने धर्म के पाखण्ड और ठेकेदारो का मुखौटा लोगो के सामने ला दिया है । ईश्वर, गॉड, अल्लाह, ऊपर वाले आदि के तथाकथित अटूट विश्वासियों के फालतू, क्षणभंगूर, विश्वास के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी है । लोग अब ईश्वरों से अधिक वास्तविकता और दवाओं पर विश्वास कर रहे हैं । धर्म के आडम्बरो अब विरान हो रहे हैं । सारे गॉड, ईश्वर, अल्लाह, ऊपर वाले, धार्मिक अड्डे नौ दो ग्यारह हो गए हैं । धर्म का प्रचार करने वालो ने धर्म के चोलों को उतार कर मास्क पहन लिए हैं । वे विज्ञान के शरण में आ गए हैं ।

आज, चिकित्सा मास्क व दवाये धर्म से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। मृत्यु का भय इतना अधिक हो गया है कि देवी देवताओं को कोरोना न हो जाए इसके लिए के धार्मिक ठेकेदारों ने मंदिरों के कपाट बंद कर दिए है । कोरोना की वजह से दुनिया में धार्मिक नींव पर अरबों रुपये का कारोबार रुका है ।

कोरोना की वजह से पंडितो के पास धन नहीं आ रहा है जिससे उन्हें आर्थिक और मानसिक दबाव पड़ रहा है । लेकिन उनके पास पहले से ही खरबों की संपत्ति जमा है। उनकी मस्ती जारी रहेगी। केवल नई दुकान (मंदिर) खोलने वालो को प्रॉब्लम जा रही है।

कोरोना की वजह से कोई भी धार्मिक पुस्तक कहीं भी काम नहीं आ रही है।

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मीडिया युग में, कोरोना ने पाखंड और पोंगापंथी को समाप्त करने के लिए बीड़ा उठाया है। नए वायरस ने पुराने पर हमला किया है। कोरोना धर्म के नाम पर उभरे विशाल ठग साम्राज्यवाद को नष्ट करके विचारधारा के एक नए आयाम की रचना की है। लाखों इंसान अपना काल्पनिक दुनिया से वास्तविक दुनिया में आ रहे है । वे धार्मिक धोखाधड़ी, चालाक को पहचानना शुरू कर दिए है।

लेकिन कमजोर दिमाग वाला जीवन जीने वाले धार्मिक व्यक्ति का दिमाग कुत्ते की पूंछ से प्रेरित होता है। वह झूठ, धोखाधड़ी, चालाकी पर आधारित धार्मिक पुस्तकों के आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन, वास्तविकता का अध्ययन नहीं करता है। कुछ लोग कुत्तो की पूंछ की तरह टेढ़ा ही रहेगे।

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कोरोनो के जाने के बाद, आप उसी ठगी आराधनालय, प्रार्थनालय, पुजालय में लौटेंगे, जहाँ कोरोन काल के दौरान पत्थर, लकड़ी, सीमेंट, पीओपी, भगवान के पुतले और फरार ठगों को को पाएगे।

पंडित कभी भी ऐसे देवताओं पर पूर्ण विश्वास नहीं करते हैं। सिर्फ धार्मिक होने का दिखावा करते हैं। अगर उनका धर्म और विश्वास सच होता, तो वे कोरोना से नहीं भागते। भगवान, ईस्वर, अल्लाह, उपरोक्त सभी, उनके द्वारा अर्जित भक्तों और विश्वासियों ने यह साबित कर दिया है कि उनका धर्म और भक्ति, मॉम डैड के बचकाने खेल से ज्यादा वास्तविक नहीं है।

सेनीनेंटल दीप समूह में कोरोना नहीं पंहुचा। यदि आप मानव निर्मित धर्म की प्रणाली को मानने लगते हैं, तो आप आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। उस धर्म, धार्मिक स्थान और धार्मिक प्रतीक को क्या माना जाए जो मनुष्य के लिए सबसे भयानक स्थिति में बंद है।

सेनीनेंटल दीप समूह के कोयतूर जो धर्म में विश्वास नहीं करते हैं सबसे सुरक्षित है और जो धर्म को मानते है वो असुरक्षित क्योंकि उन्हें धर्म के नाम पर ‘मूत्र’ खिलाया जाता है, जो किसी भी तरह से कोरोना वायरस से उनकी रक्षा नहीं करेगा।

मनुष्य धर्म के नाम पे प्रकृति का शोषण करता रहा तो एक दिन प्रकृति मनुष्यों को नष्ट कर देगी। धर्म का त्याग करें, कोयतुरों की तरह प्रकृति के मार्ग (दंड) का पालन करें। तभी मानव का अस्तित्व संभव है।


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