Raja chakradhar singh porte
Raja chakradhar singh porte

गोंड महाराजा चक्रधर सिंह पोर्ते का जन्म 19 अगस्त, 1905 को रायगढ़ रियासत में हुआ था। नन्हे महाराज के नाम से प्रसिद्ध और संगीत कला विरासत में मिला है। उन दिनों, रायगढ़ में देश के प्रख्यात संगीतकारों का नियमित आना जाना लगा रहता था। उन्हें पारखी संगीतज्ञों की देख रेख में शास्त्रीय संगीत के प्रति शौक जागा। रायपुर के राजकुमार कॉलेज में पढ़ते हुए उनके बड़े भाई की मृत्यु हो जाने से रायगढ़ रियासत का बोझ उनके कंधों पर आ गया।

Moti Mahal raigarh 01
Moti Mahal raigarh 01

1924 में राज्याभिषेक के बाद, रायगढ़ अपनी उदार राजनीति और नरम भाषा के कारण रियासत में बहुत लोकप्रिय हो गए। उनकी कला पारखीयों के साथ कई भाषाओं को भी अच्छी तरह से जानते थे। वह विशेष रूप से कत्थक के लिए जाने जाते थे और उन्होंने रायगढ़ कत्थक घराने की नींव रखी ।

छत्तीसगढ़ के पूर्वी छोर पर उड़ीसा राज्य की सीमा से लगा बाहुल्य कोयतूरों का जिला रायगढ़ है। दक्षिण पूर्वी रेलवे लाइन पर बिलासपुर संभाग के मुख्यालय से 133 कि.मी.और राजधानी रायपुर से 253 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर ओडिशा और बिहार की सीमा को भी छुता है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता, पर्वत श्रृंखलाएं, जल धाराएं, और पुरातात्विक संपत्ति पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

रायगढ़ जिले का निर्माण 1 जनवरी, 1947 को क्रमशः ईस्टर्न स्टेट्स एजेन्सी के द्वारा रायगढ़, सारंगढ़, जशपुर, उदयपुर, और सक्ती इन पांच रियासतों को विलय से हुआ था। बाद में, सक्ती की रियासत को बिलासपुर जिले में शामिल किया गया। मांड, केलो और इब इस जिले की प्रमुख नदियाँ हैं। इन पहाड़ियों में प्रागैतिहासिक कला के भित्ति चित्र आज भी संरक्षित हैं।

स्वतंत्रता और सत्ता के हस्तांतरण के बाद, कई रियासतें इतिहास के पन्नों में कैद हो गईं और गुमनामी के अंधेरे में खो गईं। लेकिन रायगढ़ रियासत के गोंड महाराजा चक्रधरसिंह पोर्ते का नाम भारतीय संगीत साहित्य और कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान की बदोलत उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। राजकीय शाही ऐश्वर्य, भोग और झूठी प्रतिष्ठा की तड़प से दूर, उन्होंने अपना जीवन संगीत, नृत्यकला और साहित्य के लिए समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्हें कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन रहना पड़ा। लेकिन 20 वीं सदी के पहली छमाही में, रायगढ़ के दरबार की ख्याति पूरे भारत में फैल गई। इस स्थल के निपुण कलाकारों को अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ पुरस्कृत किया जाता रहा। इसने गोंड महाराजा चक्रधर सिंह पोर्ते की प्रसिद्धि पूरे देश में फैला दी।

ऐतिहासिक रूप से, कई राजघरानों का उदय और पतन कला, संगीत और कलाकार के जीवन में दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ की भूमि महान कलाकारों, संगीत प्रेमियों, गुणी राजाओं से समृद्ध है, जो संगीत की पूरी दुनिया को गौरवान्वित कर सकती हैं, लेकिन गोंड महाराजा चक्रधरसिंह पोर्ते ने रायगढ़ में लखनऊ, जयपुर, और बनारस कत्थक घराना की तर्ज पर “रायगढ़ कत्थक घराना” बनाया। नृत्य की एक नई शैली विकसित करने के बाद, उन्हें “संगीत सम्राट” की उपाधि से सम्मानित किया। रायगढ़ और छत्तीसगढ़ की रियासत को गौरवान्वित किया। वे संगीत और कला के अच्छे पारखी तो थे ही, एक अच्छे सितार वादक और तबला भी थे, साथ ही वे विलक्षण तांडव नृत्य में भी पारंगत थे। उन्होंने संगीत और साहित्य पर दुर्लभ पुस्तकें लिखी हैं।

Chakradhar singh porte
Chakradhar singh porte

उन्होंने कला और संगीत से संबंधित दुनिया का सबसे बड़ा 37 किलो वजनी साहित्य लिखा है। इसमें संगीत सम्राट नहीं बल्कि विश्व संगीत सम्राट का खिताब मिला है । इंग्लैंड में, उनके नाम पर एक फिल्म बनाई गई है, लेकिन भारतीय फिल्म निर्माताओं को उनका इतिहास भी मालूम नहीं है, उनके पूर्वज महाराजा भूपदेव को 19 वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा “वीर बहादुर” की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने नाम पर भूपदेवपुर नामक एक गावं भी स्थापित किया, जो रायगढ़-कोरबा राजमार्ग पर स्थित है। गोंड महाराजा चक्रधर को ताल तोय कोष के लिए नोबेल पुरस्कार मिलना तय था, उनकी विशाल पुस्तक ब्रिटिश संग्रहालय में थी, लेकिन साजिश के तहत उन्हें अंग्रेजों की राजनीतिक मंशा के कारण नोबेल पुरस्कार नहीं मिला।

रायगढ़ में 7 अक्टूबर, 1947 को उनका निधन हुआ। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी स्मृति में संगीत और कला के लिए राजा चक्रधर का सम्मान स्थापित किया है। गोंडवाना के महान महाराजा, चक्रधर सिंह पोर्ते, शानदार प्रतिभाओं के साथ अमीरों को इतिहास के पन्नों में दफन नहीं होने देंगे।

सेवा जोहर सेवा गोंडवाना.

Sandesh bhalavi !!

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