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दादा हीरा सिंह मरकाम का जीवन परिचय

1.हीरा सिंह मरकाम जी का जन्म

2.प्रारंभिक शिक्षा

3.प्रारंभिक नौकरी

4.पारिवारिक जीवन की शुरुआत

5. सामाजिक व राजनीतिक जीवन की शुरुआत

6.गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन

7.अमरकंटक का मेले

8.राजनीति के साथ साथ संस्कृति परंपराओं का संरक्षण

9.कोया पुनेम दर्शन

10.गोंडवाना गणतन्त्र पार्टी का गठन

11.दादा हीरा सिंह मरकाम जी का आगे की रणनीति

12.ब्राह्मणवाद को रोकना

13.कोयतूर समाज की मुख्य समस्याएँ

14.दादा हीरा सिंह मरकाम पेनांजलि

हीरा सिंह मरकाम जी का जन्म

तिरु० दादा हीरा सिंह मरकाम जी का जन्म तिवरता गांव बिलासपुर जिले यह अब कोरबा जिले के अंतर्गत आता है, एक खेतिहर मजदूर किसान के यहां 14 जनवरी 1942 को हुआ था। उनके पिताजी का नाम देव शाय मरकाम, माताजी का नाम सोनकुंवर मरकाम था एवं सात भाई-बहन हैं । जिसमे तीन भाई और चार बहनें है । छोटा भाई का नाम निर्मल सिंह मरकाम और बड़े भाई का नाम चरण सिंह मरकाम है। 

प्रारंभिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा कस्बे में ही हुई। क्योंकि गाँव में कोई सार्वजनिक या निजी स्कूल नहीं थे, एक शिक्षित व्यक्ति गाँव के कुछ बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देता था। इसके बजाय, किसान उन्हें हर दिन चावल देते थे। मास्टर साहब, जो पहली से तीसरी कक्षा तक पढ़ाते थे, गाँव के पहले जमींदार के मंत्री थे, गाँव वाले उन्हें शिक्षक नियुक्त करते थे। तीन साल बाद गाँव में एक पब्लिक स्कूल स्थापित किया गया। आप चौथी कक्षा में कहां नामांकित हैं। वहां हिंदी, भूगोल, गणित और व्याकरण जैसे विभिन्न विषयों की शिक्षा दी गई और इस तरह उन्होंने गाँव के प्राथमिक विद्यालय को पूरा किया।

गाँव के आसपास माध्यमिक पाठशाला नहीं थी । वहाँ केवल जनपद पंचायत के स्कूल होते थे । इसलिए सन् 1952 में गाँव से लगभग 40 किलोमीटर दूर सूरी गाँव के माध्यमिक विद्यालय में दाखिला लिया । चूंकि सरकारी छात्रावास नहीं था इसलिए सारी व्यवस्था खुद ही करनी पड़ती थी । दाल, चावल, तेल, मसाला और बिस्तर, तेल, कंघी सारा सामान घर से ले जाना पड़ता था। वह स्कूल एक जमींदार की पुरानी हवेली में चलता जाता था । पांचवी से सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद

आगे एक साल के लिए कटघोरा तहसील मुख्यालय गये, जहां से शिक्षा विकास समिति नामक संस्था से वर्ष  1955-56 वर्ष में आठवीं कक्षा पास किये। चूंकि तहसील मुख्यालय में कोई हाई स्कूल नहीं था, इसलिए एक साल घर में व्यय्तित किये। उसके बाद बेसिक टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल में दाखिले के लिए परीक्षा दिया और पास की फिर एक साल का कोर्स किये, जिसकी परीक्षा 1957-58 वर्ष में उत्तीर्ण किया । इसके बाद नौकरी के लिए प्रयास करने लगे । बेसिक टीचर्स ट्रेनिंग के 14 महीने बाद तक बेकार बैठे रहे । अंतः 2 अगस्त 1960 को प्राइमरी स्कूल में शिक्षक के रूप में नियुक्ति हो गये ।

प्रारम्भिक नौकरी

1960 में सरकारी प्रोफेसर के पद के लिए रालिया शहर में नौकरी मिली। इसके बाद उन्होंने 1964 से एक निजी छात्र के रूप में भोपाल उच्च माध्यमिक विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने फिर 1977 तक कटघोड़ा तहसील से 12 किलोमीटर दूर पोंडी उपरोड़ा में एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के रूप में काम किया। इसके बाद उनका तबादला पोंडी उपरोड़ा में हुआ, फिर 4 महीने तक वे दूसरे स्कूल में शिक्षक रहे। उन्होंने जुलाई 1978 में अपने स्वयं के गाँव तिवरता प्राइमरी स्कूल में अपना स्थानांतरण करवाया। जब पोंडी उपरोड़ा में थे, तब उनके बी०ए० पहले वर्ष पूरा किया और फिर शहर आए और क्रमशः 1979 और 1980 में दूसरे वर्ष और तीसरे वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण की। अब वह ग्रेजुएट थे। पंडित रविशंकर शुक्ल रायपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० और फिर उन्होंने 1984 में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर से एल०एल०बी० किया। जिसमें उन्होंने स्वर्ण पदक प्राप्त किया।

परिवारिक जीवन की शुरुआत

दादा हीरा सिंह मरकाम जी का विवाह 1958 में हुआ। उनकी पत्नी का नाम सुश्री राम कुंवर है, जो अशिक्षित थी और उन्होंने आज तक पढ़ने का प्रयास नहीं किया है। उनके तीन बच्चे हैं । सबसे बड़ी बेटी गीता मरकाम है, जो अब आयाम [पति का नाम अंतिम] लिखती है। सबसे बड़े बेटे का नाम तुलेश्वर मरकाम है और सबसे छोटे बेटे का नाम लीलाधर मरकाम है। सभी बच्चों की शादी हो चुकी है और सभी सफलतापूर्वक अपने कार्यों को पूरा कर रहे हैं। हर कोई खुशहाल जीवन जी रहा है।

सामाजिक व राजनीतिक जीवन की शुरुआत

वर्ष 1980 में दादा अपने गाँव में सरकारी स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा थे । तब बहुत सारे शिक्षकों को ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर तंग किया जा रहा था । सीनियर अध्यापकों का डिमोशन भी किया जा रहा था । उन्होंने अध्यापकों पर हो रहे अन्याय और उत्पीड़नके खिलाफ आवाज उठाई और जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी कुँवर बलवान सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया । उनकी पहचान एक जुझारू शिक्षक नेता के रूप में बन चुकी थी । उसी समय विधानसभा चुनाव का दौर चल रहा था । जैसा ही उन्होंने सामाजिक और शैक्षिक जागरूकता प्राप्त की, वह बड़े पैमाने पर समाज की समस्याओं को हल करना चाहते थे और यही उन्हें एक सुनहरा अवसर मिला। अब वह अच्छे तरीके से समाज और लोगों की मदद करने लगे। फिर, 2 अप्रैल, 1980 को उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया और चुनावी जिले पाली-तंवर विधानसभा के चुनाव के लिए दौड़ पड़े। निर्दलीय प्रत्याशी होने के बावजूद इलेक्शन में दूसरे स्थान प्राप्त किया और यहीं से उनकी राजनीतिक पहचान बनी ।

दूसरा चुनाव 1985-86 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बैनर तले लड़ा गया और पहली बार मध्य प्रदेश विधानसभा में पहुँचे। 1990 के लोकसभा चुनावों में, भाजपा पार्टी के विपक्षी उम्मीदवारों ने विरोध किया और पार्टी ने स्थानीय के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को अपना उम्मीदवार चुना। जब पार्टी ने उनकी बात अनसुनी कर दी तबउन्होंने 13 जनवरी 1991 में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन कियाऔर बागी प्रत्याशी के रूप में वर्ष 1990-91 में जांजगीर-चापा लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा 

Ratna Hira and Moti
Ratna Hira and Moti

गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन

उन्होंने 1980 में पहली बार पाली-तानाखार विधानसभा क्षेत्र का चुनाव लड़ा और विधायक चुनाव हार गए, फिर उन्हें एक बार के लिए नागपुर जाना पड़ा। वहाँ उन्हें नागपुर के गोंडवाना क्लब जाने का अवसर मिला। वहां, उन्होंने पहली बार गोंडवाना के बारे में जाना। सभी लोग गोंडवाना क्षेत्र के थे। उसी समय, उनकी मुलाकात 30 मार्च, 2015 को तिरू मोती रावण कंगाली जी (जन्म 2 फरवरी, 1949 – नृत्य) से हुई, जो गोंडवान सभ्यता और परंपराओं के महान अध्यन करता थे। बैंक अधिकारी होने के बावजूद, उन्होंने अपना अधिकांश समय गोंडवाना आंदोलन के लिए समर्पित किया। इस समय के दौरान, उन्होंने सुन्हेर सिंह ताराम जी (4 अप्रैल, 1942 – 7 नवंबर, 2018) और गोंडवाना में काम करने वाले अन्य क्रन्तिकारी और मेहनती लोगों से मुलाकात की। माघ पूर्णिमा दिवस 1984 पर, तिरू मोती रावण कंगाली जी, भरत लाल कोरम जी, सुनहर सिंह ताराम जी, शीतल कवाडु मरकाम जी और हीरा सिंह मरकाम जी, कुल पाँच लोगों ने काचरगढ़ यात्रा शुरू की। आज, यह कितना फैल गया है?

जब वे 1986 में विधायक बने, तो गोंडी भाषा के विचारक और लेखक सुनहर सिंह, ताराम जी पत्रिका के संदर्भ में दादा हीरा सिंह मरकाम जी से मिलने भोपाल आए। जो गोंडवाना गाथा नामक एक पत्रिका निकालते थे। सुनहर सिंह तारम जी ने उनसे गोंडवाना दर्शन पत्रिका को निकलने का आग्रह किया। उनके अनुरोध पर, हीरा सिंह मरकाम जी ने उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की, साथ ही साथ कई किताबें और पुस्तकालय भी दिए। यहीं से गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन की नींव रखी जाने लगी।

अमरकंटक का मेले

चूँकि दादा जी की गोंडवाना धर्म, दर्शन और साहित्य में रुचि बढ़ गई थी, इसलिए इन क्षेत्रों में काम करने की आवश्यकता थी और ऐसा लगता था कि गोंडवाना आंदोलन में गोंडवाना धर्म, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित किए बिना आगे नहीं बड़ा जा सकता। इस क्रम में, जब उन्हें अमरकंटक जाना पड़ा, तो उनकी मुलाकात ठुन्नू राम मरकाम जी से हुई, जो एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे। 2005 में, उनके समर्थन से, उन्होंने अपने घर के बगल में फड़ापेन ठाना की स्थापना की। तब से, लगातार 14 वर्षों से वहां एक शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया जाता रहा है, जहाँ लाखों अपनी कोइतूर संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानने के लिए आते हैं। इसी तरह, मोती रावण कंगाली जी के साथ, सुन्हेर सिंह तारम जी और अन्य सहयोगियों ने भी काचरगढ़ में अमरकंटक मेले का नेतृत्व किया और अब यह कारवां बहुत आगे बढ़ गया है।

गोंडवाना आंदोलन को बढ़ाने के लिए अमरकंटक में मोती रावण कंगाली जी और सुन्हेर सिंह ताराम जी की मदद से गोंडवाना विकास मण्डल की नीव डाली गयी । वहाँ जमीन भी खरीदी गयी । आज वहां भव्य गोंडवाना भवन है । सुन्हेर सिंह ताराम भोपाल से गोंडवाना दर्शन पत्रिका निकालने लगे। हालांकि बाद में उन्होने राजनन्दगाँव जिले से भी प्रकाशित किया । बाद में ताराम साहब ने पत्रिका का संपादन व प्रकाशन नागपुर से करना शुरू कर दिया ।इस तरह गोंडवाना मूवमेंट का साहित्य सेक्शन ताराम जी और धर्म-संस्कृति का सेक्शन कंगाली जी देखते थे । भारत लाल कोराम जी भी बहुत साहित्यिक अभिरुचि वाले व्यक्ति थे और वे काफी अध्ययन करते थे ।

राजनीति के साथ साथ संस्कृति परंपराओं का संरक्षण

इसके पीछे मुख्य कारण शिक्षक के रूप में दादा जी का जीवन था। तब गोंडो को संस्कृति का कुछ भी पता नहीं था। तब दादा जी को कंगाली जी से यह सब जानने और समझने का अवसर मिला। कंगाली ने लॉर्ड मैकाले के बारे में दादा से कहा और अपना 1882 का भाषण पढ़ने के लिए दिया। जिसमें उन्होंने यहां के धार्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का महत्व बताया। यद्यपि ब्राह्मणवाद हमारी संस्कृति और धर्म को नष्ट करना चाहता है, लेकिन दादा जी ने अपनी संस्कृति और सभ्यता को बचाने के साथ साथ राजनीति की। उस समय भी, ब्राह्मणवाद अपने चरम पर था और ब्राह्मणवाद को केवल राजनीति से ही नहीं हराया जा सकता था अपितु धार्मिक जागरूपता की भी जरुरत थी।

इस तरह की नीति करने का एक और कारण था। गोंडवाना समाज धोकल सिंह मरकाम और कंगला मंजी आंदोलनों से पूरी तरह टूट गया था और गोंडवाना अपनी सांस्कृतिक विरासत खो रहा था। कांगला मांझी ने गोंड समाज को कांग्रेस को बेच दिया था।

दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव में मंगरू उइके और ढोकल सिंह मरकाम आमने-सामने थे। तब मंगरु सिंह उइके ने ढोकल सिंह मरकाम से सिफारिश की कि वे धर्म गुरु बनें, जिसके बाद ढोकल सिंह मरकाम ने नेरम वंशी गोंड और रावण वंशी गोंड लोगों का वंश लिया और उनका विस्तार उत्तर प्रदेश में हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश के लोंग जगरूप हुए । जिस वक्त पूरा गोंड समुदाय विभिन्न गुटों में बंट गया था। गया हुआ। यहां तक ​​कि गोंड समुदाय के लोग भी जनेऊ संस्कार करने लगे। गांव के लोग अपनी जमीन खो रहे थे और भाग्य और भगवान के कारण कर्ज में डूब रहे थे। उस समय पूरा समाज विषम अवस्था में था। फिर, ऐसे विषम समय में, गोंडी ने धर्म और संस्कृति का आंदोलन शुरू किया।

कोया पुनेम दर्शन

कोया पुनेम का दर्शन पहन्दी पारी कुपार लिंगो द्वारा किया गया था। उस समय में गोत्र प्रणाली और धर्म व्यवस्था का अभाव था। लिंगो जी ने जांगो दाई के साथ कछारगढ़ में काली कंकाली से 33 बच्चों की जिम्मेवारी दी और उन्हें धर्म के प्रचार में लगा दिया। आज भी यह संस्कृति जीवित है और इसका कारण यह है कि कस्बों के लोग इस संस्कृति में विश्वास करते हैं। एक विशेष बात यह है  कि बस्तर के लोग पहन्दी पारी कुपार लिंग के बारे में चर्चा नहीं करते हैं जिसकी चर्चा नागपुर में होती है। बस्तर के लोग अंतागढ़ के सेमल गाँव में उसेह मुदिया के छोटे भाई लिंगो को मानते हैं।

गोंडवाना गणतन्त्र पार्टी का गठन

1990 के दशक में, जब पूरा गोंडवाना क्षेत्र “बहुजन समाज पार्टी” और कांशीराम के प्रभाव में था और गोंडी संस्कृति-धर्म को बचाने का कोई रास्ता नहीं था। तब ऐसी स्थिति में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनाने का विचार आया। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की नीव दिसंबर 1990 पर पड़ी, लेकिन 13 जनवरी, 1991 को आधिकारिक तौर पर घोषणा की गई थी। वर्ष 1995  में गोंडवाना गणतन्त्र पार्टी के टिकट पर छत्तीसगढ़ की तानाखार विधानसभा से मध्यावधि चुनाव लड़े और जीतकर दुबारा विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2003 के विधान सभा चुनाव में हमारे तीन विधायक दरबू सिंह उईके, राम गुलाम उईके और मनमोहन वट्टी विधानसभा पहुंचे ।

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम जी का मानना ​​है कि गोंड जनजातियों के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। वे एक ऐसी शिक्षा का प्रस्ताव करते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हो।

हीरा सिंह मरकाम एक प्रमुख जेड राजनेता हैं। राजनीतिज्ञ होने के अलावा, उन्होंने गोंड संस्कृति और सभ्यता पर एक आंदोलन शुरू किया। सूर्य बाली के साथ एक बातचीत में, उन्होंने सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं, गोंड की राजनीतिक स्थिति आदि के बारे में विस्तार से बताया है।

दादा हीरा सिंह मरकाम जी का आगे की रणनीति

दादा जी सीधा और खुले विचार के आदमी है। दादा ने लोगों को सामाजिक और आर्थिक आंदोलन का नेतृत्व करने को कहा। जो गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को फिर से स्थापित करेगे। अब गोंडवाना गणराज्य गोतुल (पाठशाला) चलायेगे। अंग्रेजी मीडियम स्कूल चलेगा और इस तरह से पार्टी के पास कार्यकर्ताओं का आभाव नहीं होगा । दादा जी कहते हैं ‘गोंडवाना के लिए जियो और गोंडवाना में मरो’ और उन्हें जिन लोगों से उम्मीद थी कि पार्टी का नेतृत्व करेंगे, आगे बड़ायेगे उन्होंने पार्टी को आगे बडाने के बजाये नुकसान पहुँचा दिया। वर्ष 2018 में, उन्होंने मनमोहन शाह बत्ती को छिंदवाड़ा से गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में शामिल किया था और चुनावों में भी बहुत अच्छे पोजीशन पर थे।

हालांकि, कमलनाथ ने छिंदवाड़ा से कई प्रभावशाली कार्यकर्ताओं को खरीदा। लेकिन उन्होंने कभी किसी को नहीं निकाल। दादा कहते हैं “सभी बुजुर्ग और युवाओ आओ, प्यार से जियो, काम करो और गोंडवाना आंदोलन को मजबूत करो।”अब गाँव से आंदोलन को पुनः खड़ा करना होगा । लोगों के अति महत्वकांक्षा ने भी गोंडवाना आंदोलन को नुकसान पहुंचाया है । गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन के माध्यम से गांवों के लोगो को आर्थिक रूप से फिर से समृद्ध  बनाना चाहते हैं ।

ब्राह्मणवाद को रोकना

ब्राह्मणवाद को रोकने के लिए, आपने लोगों को खुद को समझाना होगा और लोगो को समझाना होगा। सभी कार्यकर्ता को अपने गाँव में अपने घर में गोंडवाना का व्याख्या करना होगा और उसे 10 लोगों को समझाना होगा। दादा जी भी पहले अखंड महान रामायणी थे और 1964 से पहले इनसे बड़ा कोई टिप्पणीकार नहीं था। ब्राह्मण दादा जी को मानते थे। उस समय वह एक बिगड़ैल रईस था। लेकिन जब वह 1980 में चुनाव हारने के बाद नागपुर गए, तो गोंडवाना साहित्य पड़े और धीरे-धीरे उन्होंने गोंडवाना धर्म और संस्कृति को समझा।

जिन लोगों को कोई साहित्यिक ज्ञान नहीं है, वे ब्राह्मणवाद से प्रभावित हैं। अब युवा समझते हैं कि हर कोई गोंडी में सेवा जोहर – जय फड़ापेन (जल, अग्नि, वायु, स्वर्ग और पृथ्वी को सामूहिक रूप से) बोलता है। एक बार अमरकंटक के आसपास, एक उड़िया (उड़ीसा के निवासी) राधे-राधे गाँव के लोगों को बुलाते थे। तब दादा जी ने सेवा-सेवा नाम से थोड़ा बदल वाना शुरू किया। अब जब उड़ीसा निवासी और उसका राधे-राधे भी गायब हो गया।

युवा लोगों के बारे में चिंता न करें, जब उन्हें गोंडवाना संस्कृति का ज्ञान होता है, तो वे स्वयं यह समझने में सक्षम होंगे कि हमारा कोया पुनेम दर्शन कितना महत्वपूर्ण है।

कोयतूर समाज की मुख्य समस्याएँ

हमारे समाज की पांच मुख्य समस्याएँ हैं । 1. भय 2. भूख 3. भ्रष्टाचार 4. भगवान व भाग्य और 5 भटकाव। ग्रंथ और गुरु के अभाव में सारा गोंडवाना भटक गया है । वैसे ग्रंथ तो कंगाली जी ने बहुत सारा लिख कर दे दिया। हमें लिंग गुरु की स्थापना करके उनके कोया पुनेम दर्शन को फैलाना और बढ़ावा देना होगा। हम गोंडवाना के लोगों का लंबा जीवन चाहते हैं। पुनेम का अर्थ सत्य मार्ग है। यानि सच्चे मार्ग से चलकर इन परेशानियों से निजात पायी जा सकती और एक निडर, समृद्ध, खुशहाल, स्वस्थ गोंडवाना समाज को फिर से खड़ा किया जा सकता है ।

हमारे समाज के सभी शिक्षित लोग गरीबों को दबाने में लगे है। कुछ लोग धर्म के प्रवक्ता के रूप में अपने ही लोगों को लूट रहे हैं। इसलिए, गोटुल की स्थापना आवश्यक है। लोगों को आधुनिक शिक्षा देकर उनको जीवन का उद्देश्य श्रम सेवा बनाना चाहिए। संपत्ति बहुत जरूरी है बिना संपत्ति के मनुष्य की कोई कीमत नहीं होती है। दादा का कहता कि ‘स्वयं जियो और हजारों लाखों को जीवन दो’। बिना पीछे मुड़े युवा पीढ़ी आगे चलती रहे । शोषणविहीन समाज की रचना में सहभागी बनें ।

दादा हीरा सिंह मरकाम पेनांजलि

28 अक्तूबर 2020 को दादा हीरा सिंह मरकाम पेन विलीन हो गए। एक युग का अंत हुआ।

गोंडवाना क्रांति के जनक, गोंडवाना आंदोलन के नेतृत्वकर्ता और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के योगदान को गोंडवाना समाज हमेशा याद रखेगा उनके नेतृत्व की कमी उनका मार्गदर्शन समाज को बहुत खलेगा।


जयपाल सिंह मुंडा का जीवन परिचय

ऐ/सी मिन्ट कुंवर केश्री सिंह | A/C Bharat Sarkar Kutumb Parivar

5 COMMENTS

  1. दादा जी का जीवन परिचय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैं भी आशा करता हूं अपना समाज आगे बढ़ाने में सहयोग कर सकूं लोगों को बता सकूं…..✍?

  2. बहुत अच्छा लगा मुझे अपने समाज संस्कृति के बारे में। और जो हमारे समाज के मुख्य संस्कृति के ज्ञाता तिरु मोती रावण के कंगाली ने जो सामाजिक संस्कृति के बारे में बताया ।वह यदि हमे भी जानने को मिले तो हम भी हमारी संस्कृति परंपरा को जन सकेंगे। सेवा जोहार।

  3. हृदय पूर्वक धन्यवाद करता हूं ,दादा हीरा सिंह मरकाम जी का जो ,गोंडवाना साम्राज्य के प्रति कार्य छमता को निरंतर बरकरार रखा,,ओर में चाहता हूं दादा हीरा सिंह मरकाम जी के बनाए गए गोंडवाना साम्राज्य के विकाश के लिए बनाए गए नियमों ,कार्यों ,का हमे पूर्ण रूप से आगे बनाए रखें ,,धन्यवाद,,🙏🙏

  4. दादाजी का जीवन परिचय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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