bhujariya
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खुजलिया पाबुन (उत्सव) देशज गण “गोंड कोयतुड़ ” समुदाय का एक महत्वपूर्ण उत्सव (त्योहार) है, जो कि गोंड कोयतुड़ों के कोया पुनेमी मिजान गत गोटुलीय (सर्व शिक्षा केंद्र) का एक अहम हिस्सा है, जिसमे मातृत्व का दर्शन है। खुजलिया शब्द पाना पारसी (गोंडी भाषा) के खुजरा शब्द से तात्पर्य है और पाना पारसी में खुजरा का अर्थ कोमल या कंवला होता है।

गोटुल (सर्व शिक्षा केंद्र) गोंड कोयतुड़ समुदाय यानि इस गोंडवाना भूभाग के उत्तपत्तित देसोत्पन्न मानव समुदाय के सामाजिक व्यवस्थाओं को पुकराल (प्रकृति) के पूरक संचालित करने के लिए हमारे महान वैज्ञानिकों ने एक गोटुल (सर्व शिक्षा केंद्र) का निर्माण किए। जिसमे मन्नुक (मानव गण) के उपजुन (जन्म) से लेकर सायना (मृत्यु) तक वेन (व्यक्ति), विरंदा (परिवार), विडार (समाज) के निर्माण में लेंग नेंग, सेंग, मिजान, पाबुन पंड्डुम , पुकराल आड़ा, पेन आड़ा, सयंड गढ़ (52 गढ़), अर्यारूं शम्भू (88 संबंध) के बारे में प्रकृति के अनुरूप अनुशासित रहने के लिए शिक्षा प्राप्ति हेतु एक शिक्षा केंद्र बनाए जिसे गोटुल कहा जाता है।

उसी गोटुलीय शिक्षा के तहत मातृत्व दर्शन का भी एक भाग है, जिसे सयोमान (सावन माह) के साजो पाख में मनाया जाता है जिसे हम आज खुजलिया पाबुन कहते हैं । जैसे कि वर्तमान के आधुनिक शिक्षा में विज्ञान संकाय में लिखित (थ्योरिटिकल) शिक्षा के साथ साथ प्रायोगिक (प्रक्टिकल) शिक्षा दी जाती है उसी तरह मानव सभ्यता विकसित होने के बाद सबसे पहले हमारे वैज्ञानिक पुरखों ने व्यवहारिक शिक्षा के साथ साथ प्रायोगिक शिक्षा की व्यवस्था बनाए थे। और ये सारी शिक्षा गोटुल (सर्व शिक्षा केंद्र) से संचालित होते थे।

आइए जानते हैं गोटुलीय व्यवस्था के तहत खुजलिया पाबुन में मातृत्व का क्या दर्शन है। खुजलिया वही मातृशक्ति बोती है जो कोया पुंगार (बाल्यावस्था) से रायताड़ (युवावस्था) में प्रवेश कर चुकी हो, और जिसकी मढ़मिंग ( शादी) न हुई हो यानि कुंवारी हो जिनको नेंग बेरो (मासिक पीरियड) आना शुरू हो गया हो मतलब गर्भ धारण करने योग्य हो गई हो, ऐसी मातृशक्ति ही खुजलिया बोने की पात्रता रखती हैं। और ये तब तक खुजलिया बोती रहेंगी जब तक कि उनकी मढ़मिंग न हो जाए। मढ़मिंग के बाद खुजलिया बोना इसलिए बंद कर देती है, क्योंकि अब वह स्वयं माँ बनने वाली होती है।

खुजलिया पाबुन में रायताड़ मातृशक्ति को सयानी मातृशक्तियों (बुजुर्ग महिलाओं) के द्वारा नौ दिन में नौ महीना के मातृत्व शिक्षा दिया जाता है। व्यवहारिक शिक्षा पाटाओं (दादरा) के माध्यम से और प्रायोगिक शिक्षा खुजलिया के माध्यम से दिया जाता है। खुजलिया पाबुन नौ दिन मनाने का तात्पर्य यह है कि रायताड़ मातृशक्तियों को उनके मढ़मिंग के पहले ही मातृत्व यानि गर्भवती काल में नौ महीनों का हर एक महीने में कैसे रहना है, भोजन में कैसे भोजन करना है, क्या – क्या सावधानियां रखना है, ये सब पाटाओं के माध्यम से सयानी मातृशक्तियों के द्वारा बताई जाती है।

पाटाओं के माध्यम से पहला दिन, पहले महीने का दूसरा दिन दूसरे महीने का, इस प्रकार क्रमशः नौ दिनों में नौ महीने का व्यवहारिक ज्ञान दिया जाता है। और  खुजलिया के माध्यम से प्रायोगिक ज्ञान दिया जाता है, जैसे कोख में कंवला व कोमल जीवा की कैसे देखभाल किया जाना चाहिए, खुजलिया बोने के बाद प्रतिदिन पानी देना, धूप में रखना, फिर अंदर ले जाकर रखना इस तरह आठ दिन पानी देने के बाद नौंवा दिन सारना (विसर्जन) के पहले पाल (दूध) डाला जाता है यानि नौ महीना में जब बच्चा जन्म लेता है तो उसे पाल (दूध) की जरूरत होती है।

इस प्रकार स्वदेशी देशज जनों के पारंपरिक ज्ञान मे मातृशक्तियों (महिलाओं) की अहम भूमिकाओं में से यह पाबुन भी एक महत्वपूर्ण पाबुन है। लेकिन आर्यों ने इस पाबुन पर भी अतिक्रमण करते हुए कोया पुनेमी पाबुन के विरुद्ध अपना व्यवसाय को तर्कहीन भाई – बहन के प्यार व रक्षा का हवाला देते हुए रक्षाबंधन त्योहार में परिवर्तित कर दिया। और आज हमारा समुदाय भी रक्षाबंधन नामक त्योहार को बड़े शिद्दत से मानने लगा हैं। और इसका मूल कारण यह है कि गोंड कोयतुड़ समुदाय अपनी मूल भाषा, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहारों को भूलते जा रहा है और दूसरों के धर्म, मजहब, रिलीजन को अपनाते जा रहा है। जिसके कारण इस समुदाय की मूल पहचान व अस्तित्व खत्म होने के कगार पर आ गया है। इसलिए विश्व के 193 देशों की महा संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व के प्रत्येक देश के स्वदेशी, देशज जनों के पहचान व अस्तित्व को बचाने के लिए प्रयासरत है, और पूरे 193 देशों में एक ही दिन 9 अगस्त को International day of the world indigenous people (विश्व के स्वदेशी, देशज जनों का अंतरराष्ट्रीय दिवस) को एक साथ उत्सव के रूप में मनाते हुए देशज समुदाय के भाषा, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार की संवर्धन एवं प्रसारण के लिए हर वर्ष एक थीम (विषय) देता है ताकि स्वदेशी, देशज जनों की अस्तित्व बचा रहे।

कोया पुनेमी व्यवस्थागत कोया पुनेमी खुजलिया पाबुन के ऊपर जो लेख लिखा गया है, हमारे पुरखों के द्वारा बनाया गया गोटुलीय शिक्षा के आधार पर है, जो कि सामाजिक संगठन गोंडवाना कोयतुड़ सगा सग्गुम सामाजिक संस्था भोपाल म. प्र इंडिया के चिंतन से प्रेरित है।

कलम से :– प्रेमसिंह ताराम येरुंग पेन विरंदा, नार – खैरलांजी, पो. आ. – मजगाँव, तहसील – परसवाड़, जिला बालाघाट, म. प्र. सेवा सेवा! सेवा जोहार!! 🙏🙏!!


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