bhujariya
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हमारी गोंडी संस्कृति व परंपरा हमेशा प्रकृति संगत व पराविज्ञान से ऊपर रहा है और इसी सिध्दांत हमारा प्रत्येक पर्व पंडुम भी है । इसलिए भुजरिया पर्व मानते है।

लेकिन आज ब्राह्मण प्रभाव में हम अपनी मान्यता को इस तरह भूल चुके कि खुद को पहचान नहीं पाते हैं ।

इसी का ही परिणाम है हम पूरे गोंडवाना में मनाये जाने वाली महिला का पर्व को पूरी तरह ब्राह्मणी प्रभाव में लिप्त कर चुके हैं और बहुत से जगहो में पुरुष को भी इस पर्व में घुसा डाले है, जबकि इस पर्व में पुरुष का कोई स्थान नहीं है ।

“”वास्तव में यह पर्व महिलाओं के लिए मातृत्व शिक्षा का पर्व है””

हमारे गोंडी समाज की प्रथम शिक्षा केंद्र गोटुल को पार करने के बाद अविवाहित लयोर (युवती) वह जो मातृत्व योग्य हो चुकी है तथा समस्त विवाहित महिला इस पर्व को मनाती है ।

इस 9 दिन की पर्व में मातृत्व योग्य युवतियों को, बुजुर्ग महिलाओं द्वारा किसी गर्भवती महिला की तरह 9 माह गर्भ में पलने वाले बच्चे हेतु सावधानी बरतने की शिक्षा दिया जाता हैं !

प्रत्येक दिन एक-एक माह अनुसार गर्भ के बच्चे के लिए बरतने वाली सावधानीयो को सिखाया जाता हैं इन 9 दिनों में प्रायोगिक शिक्षा बतौर ही भोजली लगाया जाता है जिसकी महिलाओं द्वारा एक गर्भ के बच्चे की तरह परवरिश किया जाता है, इस दौरान भोजली गीत भी उनके पर्व का एक हिस्सा है जो आज भी यदाकदा सुनने को मिलता है ।

अंतिम दिन जिस तरह नवजात शिशु को सर्वप्रथम माँ की दूध की आवश्यकता होती है उसी तरह भोजली (??गेंहू धान जौ) के पौधे को भी दूध चढाया जाता है ।

यह शिक्षा प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात सभी महिला उस भोजली को धोकर (विसजर्न) करे बडे बुजुर्गों के कानो में लगा कर मातृत्व सुख की आशीर्वाद लिया करती है ।

लेकिन आज यह हमारा दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम महिलाओं की मातृत्व शिक्षा पर्व को तहस नहस करके सार्वजनिक मनोरंजन का पर्व बना दिये हैं ।

अपनी ही संस्कृति का गला घोंट चुके हैं ।

जय सेवा जय बुढ़ादेव??

जय भोजली दाई??


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