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भीमाल पेन और वीर हनुमान के बारे में अंतर उनके जीवन की कहानियों से जाने ।

?भीमाल पेन-

गोंडियन गाथा के अनुसार प्राचीन काल में, एक योग सिद्धि, एक महान शक्तिशाली व्यक्ति गोंड समुदाय के मरावी गोत्र में पैदा हुए थे जिनका नाम भीमाल रखा । भीमाल पेन का जन्म चैत्र पूर्णिमा को हुआ था। वह मध्य प्रदेश के मैकाल पर्वतीय श्रृंखला में स्थित बय्यर (बैहर) लांजी के निवासी भूरा भूमका और कोतमा दाई के पुत्र थे। गोंडी साहित्य से पता चलता है कि रावण (रावेन) के युग से लगभग 700 साल पहले, मध्य प्रदेश के मोहभट्टा नामक राज्य में गोंड समूह के राजा, सयमाल मदावी का राज्य था। राजा सयमाल मदावी की रानी का नाम झमय्या था। उन्हें भूरा भगत नाम का एक बेटा हुआ, यह बेटा बहुत बहादुर था और जंगल में अकेले जाकर जंगली जानवरों का शिकार करना पसंद करता था।

एक दिन भूरा भगत बैहर के जंगल में शिकार करने गया जिसे आज हम कान्हा के नाम से जानते हैं, उसी दिन उसी राज्य के राजा ढोला उइका अपनी बेटी कोतमा के साथ उसी जंगल में गए थे, लेकिन संजोग से पानी की तलाश में भूरा भगत और कोतमा प्यास बुझाने के लिए एक तालाब के किनारे पहुचे, दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गए और फिर इधर-उधर की बातें करने लगे, कोतमा के पिता ढोला उइका वहां पहुचे और भूरा भगत की सुंदरता देखकर उनके मन में अपनी लड़की के विवाह की कल्पना करने लगे और शादी के बारे में बात की, फिर कुछ दिनों बाद शादी कर ली और शादी करने के कुछ साल बाद कोतमा गर्भावस्था हो गई। एक दिन, सास झमया को कहा, मुझे जंगल जाके कुछ खाना है,

उसी दिन, चैत्र महीने की पूर्णिमा पर, कोतमा के पेट से एक बच्चे का जन्म हुआ, उसे भीमा कहा जाता था, भूरा भगत और कोतमा पूरे राज्य में खुशिया मनायी।

भीम को उनकी शिक्षा के लिए गोटूल में पांचवें वर्ष डाला गया, गोटुल के अध्यक्ष मुर्सेनाल, उस समय माहारु उका थे, वे भीम के गुरु बन गए।

भीम के बाद भूरा भगत और कोतमा के कुल 11 बेटे और बेटियां हुई।

भीम के 6 भाई और 5 बहनें हुई।

*7 भाईयो के नाम*
1) भीमा,
2) जाटबा,
3) केशबा
4) हिरबा,
5) भाजी,
6) मुकोशा
7) बाना
*5 बहनों के नाम*
1) पंढरी,
2)पुंगुर,
3) मुंगुर
4) कुशारे,
5) खेरो,
18 वर्ष की आयु में भीमा की सभी शिक्षा पूरी हुआ, वह गोंडी परंपरा के महान संस्था गोटूल में शिक्षा ली, जहाँ से कोई भी आदमी सर्वगुण सम्पन्न(उत्तीर्ण) होकर ही बाहर निकलता है ।
खास बात यह थी कि उसके पास पहले से ही प्राकृतिक शक्तियां थीं।

जदरी, धनुर्विद्द्या, योग, तन्दरी इत्यादि विद्द्याओं में कम समय में ही बहोत बड़ी निपुणता हासिल की थी ।
भीमाल पेन ने हर गाँव गढ़ कोट जाकर योग कसरत अर्थात गोटूल रूपी व्यायाम शालाएं स्थापित कर उसमें कोयावंशी गण्डजीवों को मल्ल, बड़गा, बिलाम्ब (धनुष विद्या) , मुष्टी, कुस्ती आदि हुनर सिखाने का कार्य किया ।
बेंदुला गढ़ के राजा सेवता उइकाल को भी दो जुड़वा पुत्रियां थी, वह राजा भूरा भगत के बहनोई थे।
1) बमलाई
2) समलाई (तिलकाई)
दोनों बहनें सुंदर और कई विषयों में सक्षम थीं।
दूसरी ओर, भीम की शिक्षा भी पूरी हुई।
कम उमर में सभी विषयों में निपूर्ण के कारण, भीमा को मुठवा का दर्जा प्राप्त हुआ, मतलब राजनेगी का दर्जा । इसके साथ ही उन्हें चौथा धर्मगुरु का दर्जा भी दिया गया। इधर, राजा सेवता और रानी मनकों को अपनी दो जुड़वाँ लड़कियों मडमिंग (शादी) की चिंता सताने लगी और दूसरी ओर राजा भूरा और रानी कोतमा को भी भीमा के मडमिंग (शादी) का इंतजार था। दोनों तरफ मडमिंग की चर्चा थी। दोनों जुड़वाँ बहनें बमलाई और समलाई भीमा से शादी करने के लिए उत्साहित थीं, क्योंकि वे दोनों भीमा को पसंद करती थीं।

भीमा से भी मडमिंग के बारे में भी पूछा गया था, लेकिन समाज सेवा के लिए शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बहुत समझाने पर भीमा ने अपनी शर्त के साथ शादी के लिए हाँ कह दी। शर्त यह थी कि 1 दिन, 1 महीने या 1 साल में मुर्गा का बाग देने से पहले, अगर दोनों में से कोई भी बहन मुझे खोज लेती है, तो वे मुझसे मडमिंग कर सकते है, वर्ना वो कुंवारे और अकेली रहेगा। इस शर्त के लिए दोनों बहनें तैयार थीं। यह देखकर कि सभी लोग सो रहे थे, भीम अपने फड़ापेन के पेनठाने डोंगरगढ़ को निकल गए। वहाँ, वे दर्शन करने के बाद अपने गुरु महारू भुमका के गोटूल में गए, बाद में उन्होंने अपने माता-पिता की सुर्वेय सेवा की और समाज सेवा में लगे गये।

शर्त के अनुसार बमलाई और समलाई दोनों बहनें भीम की खोज में लगी रहीं।

वह जानती थी कि भीम अपने सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन के पेंनठाने, डोंगरगढ़ जाएंगे।

जब वे दोनों बहनें वहाँ पहुँचीं, तो उन्हें पता चला कि भीम महारु भुमका मुठवा के दर्शन के लिए आगे बढ़ चुके हैं।

इस बीच, डोंगरगढ़ में बामलाई थकी हुई थी, इसलिए वह वही रुकी।

आज डोंगरगढ़ में उसी बामलाई उइकाल का पेंनठाना मौजूद हैं और उन्हें बमलेशरी के नाम से जाना जाता है।

डोंगरगढ़ में तिलकाई नहीं रुका, जब वह भीमा की तलाश में कोराडी आयी, तब मुर्गी ने बांग दे दी थी।

इसलिए , शर्त के आधार पर तिलकाई कोरडी में ही रुक गई।

आज भी कोराडी में एक तिलकाई दाई पेंनठाना है जिसे आज लक्ष्मी के नाम से जानते है।

इस तरह, भीमलापेन का समाज सेवा करने का लक्ष्य सफल रहा, इसलिए वह और उनकी 5 बहनें और 7 भाई भी समाज सेवा के लिए अपने को समर्पित कर दिए । वे सभी क्षेत्रों में अपनी रूचि के अनुसार समाज की सेवा किये।

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हनुमान (बजरंगबली) के जन्म की कथा

हनुमान के जन्म की विभिन्न कहानियां विभिन्न पुस्तकों में लिखी गई हैं। जिसमें 1890 की पहली संस्कृत पृष्ठभूमि में कहा गया है कि अंजनी की जाति कंजर/कंजरी(कंजुरे, कोंजुरे) अकेली जंगल में भटक रही थी कि अचानक, एक तेज हवा का झोका कपड़ों को इधर-उधर विघटित कर देता है और हवा उसका तनबदन शक्ल सूरत को देखकर कर व्याकुल हो जाता है। फिर उसने एक इंसान का रूप धारण किया और अजनी को बताया कि वह वासना के लिए बहुत व्याकुल है ओर कहा: “हे देवी, मैं आपके अंगों की सुंदरता को देखकर बहुत उत्साहित हूं इसलिए मैं थोड़ी देर के लिए आपके साथ सहवास करना चाहता हूं”। अजनी ने कहा कि “वह अभी भी कुंवारी है इसलिए आप कुछ ऐसा उपाय करें ताकि मेरी मर्दानगी नष्ट न हो। पवन सहमत हो गया। “

वेदों के अनुसार, पवन ने अंजनी की योनि में अपना लिंग अर्पित करके विधिवत यज्ञ किया। उसके बाद, पवन ने कहा, “मेरे अण से, तुम्हारी कोख से एक शक्तिशाली और तेज-तर्रार पुत्र हनुमान उत्पन्न होगा, जो तुम्हारा अंजनी पुत्र और मेरा पवन पुत्र कहला कर संसार में परिवार का नाम रोशन करेगा।

इस कहानी के बाद, कई ऋषियों और संतों ने अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार अलग-अलग कहानियां लिखी हैं।

धारावाहिक निर्माताओ ने रामायण, जय हनुमान, ओम नमः शिवाय जैसे कई टीवी श्रृंखला बनाए। यह महाभारत में भी दिखाया गया है।

हनुमान को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है?

> रामायण में एक प्रसिद्ध कथा है

हनुमान ने सीता जी के माँग में सिंदूर देखकर आश्चर्य से पूछा: माँ! आपने यह लाल सामान सिर पर क्यों रखा? सीता इस सरल ब्रह्मचारी हनुमान के सवाल से प्रसन्न हुईं और कहा: बेटा! इसे लगाने से मेरे स्वामी राम की दीर्घायु होगी और इससे वह मुझपर प्रसन्न होंगे। हनुमान ने यह सुना और बहुत खुश हुए। उन्होंने सोचा कि जब उंगली भर सिंदूर लगाने से स्वामी की आयु बढ़ जाती है, तो इसे पूरे शरीर में क्यों न लगाया जाए और मेरे स्वामी को अमर बना दें?

हनुमान ने ऐसा ही किया, पूरे शरीर का सिंदूर पोतकर सभा में पहुँच गया और भगवान हँस पड़े और यह देखकर बहुत खुश हुए। माता जानकी के शब्दों में हनुमान और अधिक दृढ़ हो गए और कहते हैं कि उस दिन से हनुमान की इस स्वामी भक्ति की याद में उनके शरीर पर सिंदूर लगाते है।

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पुराणों और गोंडियन गाथा के अनुसार, हमारे भीमल पेन का हिन्दू धार्मिक कहानियों से कोई संबंध नहीं है। यही कारण है कि भीमाल पेन को हनुमान नहीं कह सकते। क्योंकि हनुमान की कहानी अलग है और भीमल की कहानी अलग है। लेकिन कुछ हिंदुत्ववादियों ने भीमाल पेन के पेन ठानो को हनुमान मंदिरों में बदल दिया। सभी गोंडियन सागरजन को भ्रमित कर रहे हैं और सभी भीमाल पेन के इतिहास को नहीं जानते हैं, लोग वर्षों से भीमाल पेन की जगह हनुमान की पूजा कर रहे हैं।____________________________________

भीमाल पेन की महत्वपूर्ण जानकारी:-

भीमल पेन को महावीर भी कहा जाता है क्योंकि वे व्यायाम शाला के जन्मदाता हैं। भीमल पेन की शादी नहीं हुई थी, इसलिए उन्हें कुंवारा भीमल पेन भी कहा जाता है। जबकि हनुमान का मकरध्वज नाम का एक पुत्र था, हनुमान को भीमल पेन बताते हुए उन्हें कुंवारा बताया जाता है।


?भीमल पेन का जन्म चैत्र पूर्णिमा के दिन हुआ था, इसलिए उनकी जयंती हर साल चैत्र महीने की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है।
?भीमल पेन की छोटी बहन खेरो दाई (शीतला माता) को आयुर्वेद (वैद्य माता) माता भी कहा जाता है।
?भीमल पेन का मुख्य स्थान पेंच नदी के किनारे सुयाल मेट्टा, (छिंदवाड़ा जिले) में है।

?भीमल पेन को मौसम का अच्छा ज्ञान था। इसलिए उन्हें जल का पेनता भी कहा जाता है।

✍✍ जय गोंडवाना कोयतूर सेवा समिति सैलारपुर ✍✍


कोसोडुम मुठवा मॊद “कुंवार भीमालपेन”

शंभू शेक नरका कोयतूर समाज का पर्व | महा शिवरात्रि

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