Dongargarh-Cave-Gondi-religion
Dongargarh-Cave-Gondi-religion

डोंगरगढ़ की बम्लाई दाई (बम्लेश्वरी माता) और कोराड़ी की कोराड़ी/तिलकाई/सम्लाई दाई

पेनवासी तिरूमाल मोतीरावण कंगाली जी द्वारा लिखित अंश ?✍️ नवरात्र विशेषांक

डोंगर यह द्रविड़ पूर्व गोंडी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ पहाड़ों वाला जंगल होता हैं। डोंगरगढ़ की बम्लाई दाई गिरोलागढ़ के सेवता मरकाम गोंड राजा की बेटी थी जो अपने सत्कर्मों से बम्लाई दाई के रूप में पूजी जाती हैं।

बम्लाई दाई की ऐतिहासिक गाथा आज भी प्राचीन गिरोला गढ़ के पास गोंड समुदाय में पारम्परिक लोक गीतों और कथा सारो के माध्यम से प्रचलित हैं।

यह बात सर्वविदित/ निर्विवाद रूप से सत्य है कि जिसे आर्यो ने वर्तमान समय में माँ बम्लेश्वरी माता कहना शुरू किया वह गोंड समुदाय की बेटी बम्लाई दाई हैं। प्रचलित गाथा के अनुसार किसी ने उसे मरकाम, तो किसी ने उईका गोत्र के बताए हैं। राजनांदगाँव से 26 किलोमीटर डोंगरगांव नामक एक गाँव हैं उसके पास सेवता टोला गाँव हैं जहाँ प्राचीन गिरोला गढ़ के पुरातत्व अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

प्रचलित ऐतिहासिक गाथा के अनुसार गिरोला गढ़ का प्राचीन नाम “बेन्दुला गढ़” था, जहाँ का राजा लोहंडीगुडा सेवता मरकाम था उसकी एक बड़ी बहन कोतमा थी, जिसका विवाह बैहर के पास भीमलाट राज्य के मोहभाट्टा गढ़ में सईमाल मड़ावी नामक राजा के राजकुमार भूरापोय के साथ हुआ था।

लोहंडीगुडा सेवता के दो जुड़वा बेटी थी एक का नाम बम्लाई और दूसरे का नाम सम्लाई था। दोनों बहनों के जवान हो जाने के कारण उनकी शादी की चिन्ता राजा को लग गई। राजा के केवल दो ही बेटियां थी। बेटा नहीं था। वह सोचने लगा कि बेटियों के लिए घर दामाद लाना उचित होगा।

सोचते-सोचते ध्यान में आया कि किसी पराए युवक को घर दामाद लाने से उचित होगा किसी नाते-रिश्तेदार के ही योग्य लड़के का चयन किया जाएँ। रिश्तेदार के ध्यान आते से ही उसे अपनी बड़ी बहन कोतमा के ख्याल आया जो बैहर राज्य के मोहभाट्टा गढ़ में ब्याही गई थी उसकी सात सुपुत्र (मर्री) और पाँच सुपुत्री थी । उसमें से कोई एक को बड़ी बेटी बम्लाई के लिए घर दामाद बनाकर लाने का राजा ने मन में सोचा और यह प्रस्ताव अपने बहन के सामने रखा तो भाई का प्रस्ताव सुनकर बहन  खुशी से उछल पड़ी । शीघ्र ही उसने यह बात राजा को बताया तो राजा भूरापोय भी खुशी से नाच पड़े। उसने अपने बड़े बेटा भीमालपेन को बुलाया और उसके मामा जी की बड़ी बेटी बम्लाई के लिए घर दामाद जानें के लिए आज्ञा दिया।

भिमालपेन के सामने कठिन समस्या खड़ी हो गई थी उसने अपने मुठवापोय (गुरूजी)महारू भूमका को वचन दिया था कि वह आजीवन कुंवारा रहकर कोइतूर समुदाय की सेवा करेगा और अपने इस कार्य में वह जुट गया था किन्तु अपने माता-पिता (दाई -दाऊ )के आज्ञा की अवहेलना करना भी उचित नहीं था अतः समय की पुकार सुनकर वह चुपचाप अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए अपने मामाजी के साथ गिरोला गढ़ चला गया ।

वहां पहुँचने के बाद दूसरी समस्या खड़ी हो गई। अपने मामाजी के बड़ी बेटी बम्लाई के लिए घर दामाद बनकर आया था किन्तु वहां दोनों बहनें बम्लाई और सम्लाई भीमाल पेन से शादी करने तैयार हो गई। उन दोनों बहनों ने अपने प्रस्ताव पिता के पास रखा कि उनकी शादी भिमालपेन से किया जाए । राजा के सामने यह समस्या उत्पन्न हो गया कि वह भीमाल पेन को कैसे मनाए। वह सोच विचार में खो गया।

भिमालपेन तंदरी जोग (योग शक्ति)विद्या में माहिर थें। वह दूसरे के दिलो-दिमाग में क्या चल रहा है सामने वाले की सूरत देखकर जान जाता था। राजा और उनकी दोनों बेटियों के मन में क्या-क्या उथल-पुथल चल रहा है वह जान चुका था। अतः अपने मामाजी के द्विधा भरे मनःस्थिति का निराकरण करने, सुलझाने के लिए अनुमति मांगी और मामा जी से अनुमति देकर कहा कि जो उचित हो करने के लिए कहा।

एक दिन रात्रि में भोजन के बाद भिमालपेन दोनों बहनें बम्लाई और सम्लाई के साथ टहलते हुए अपने गुरु  को दिए वचन के बारे बताया कि उसने अपने गुरु(मुठवा/भूमका)महारु भूमका को वचन दिया हैं कि वह कुंवारा रहकर आजीवन कोइतूर समुदाय के सेवा करेगा किन्तु वह अपने दाई दाऊ(माता-पिता)के आज्ञा का पालन करने के लिए इस घर में दामाद बनकर आया हुआ है । उसके सामने दो समस्या खड़ी हो गई है एक ओर उसे गुरु को दिया वचन पूरा करने है तो दूसरी ओर माता पिता के आज्ञा का पालन करना हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में उसे अपनी विवेक से अपने जीवन मार्ग तय करने के लिए विवश होना पडेगा।

उसने कहा कि एक दिन यानि 24 घंटे मे तीन पहर होते हैं। सुबह पहटिया मुर्गा की बाग देने के समय से लेकर मध्यान्ह तक और मध्याह्न से लेकर रात के भोजनांत तक इन दो पहरों को मैनें गुरु (मुठवा) को और माता-पिता को देने की वचन दिया है और रात्रि के भोजनांत से लेकर सुबह मुर्गे की बांग देने के समय तक यह पति-पत्नी के सांसारिक जीवन बिताने की समय होता हैं जो कि अभी पति -पत्नी के सांसारिक जीवन बिताने की समय शुरू होता है वह अभी इसी वक्त बड़ापेन (फड़ापेन) और अपने गुरु/मुठवा महारु भूमका का दर्शन करने के लिए डोंगरगढ़ और लांजीगढ़, बैहर जा रहा है तुम दोनों में से जो भी सुबह मुर्गे की बांग देने के समय तक उसके पीछे-पीछे आकर उससे जो मिल लेंगी वह उसी से शादी (मड़मिग)करने तैयार हो जाएगा अन्यथा वह आजीवन कुंवारा ही रहेगा इतना कहकर वह उसी समय तेज़ गति से गिरोला गढ़ से डोंगरगढ़ की ओर निकल पड़े उसके पीछे-पीछे वे दोनों बहनें बम्लाई और सम्लाई भी निकल पड़ी किन्तु भीमाल पेन बहुत दूर निकल चुके थे।

Dongargarh, Dai-Bamlai-thana-Dongargarh
Dai-Bamlai-thana-Dongargarh

सर्वप्रथम भिमालपेन डोंगरगढ़ फड़ापेन ठाना (पेनकड़ा)गये वहाँ के खोह में स्थित मड़ावी गोत्र के फड़ापेन (बड़ापेन)का दर्शन कर आगें लांजी-बैहर की ओर मुठवा पोय महारू भूमका के दर्शन के लिए निकल गए। बड़े हिम्मत और साहस कर बम्लाई और सम्लाई डोंगरगढ़ पहुँची । वहां उन्होंने फड़ापेन के दर्शन किया। बम्लाई दाई की हिम्मत जवाब दे गई और वह फड़ापेन पेनकड़ा के पास कुछ दूरी पर खोह के पास बैठ गई किन्तु सम्लाई(तिलकाई) दाई भीमाल पेन के पीछे पीछे आगें की ओर बढ़ती रही। बैहर मोहभाट्टा पहुँचकर भीमाल पेन अपने माता-पिता के दर्शन किए और उसी समय उसके गुरु /मुठवा महारु भूमका संभू शेक मा-दाव के दर्शन के लिए पेंच समदूर के पास गए थें इसलिए भिमालपेन को गुरु के दर्शन नहीं कर सकें। पेंच नदी के किनारे आलीकटटा कोट के संभू शेक मा दाव जहाँ गोंड समुदाय के पंचखण्ड धरती के महाराजा संभू शेक (महादेव)का ठाना हैं। वर्तमान में यह कर्माझीरी अभ्यारण्य के भीतर है।

इसके बाद भिमालपेन आलीकटटा कोट जानें का निश्चय किया और वायु की गति से निकल गया कहा जाता है कि उनके गति वायु से भी अधिक तेज़ थी तंदरी जोग(योग शक्ति) के बल पर पल भर में कहीं से कहीं पहुंच जाया करते थे । लौगुर-बिगुर की पहाड़ियों को पार करते हुए वह रमरमा होते हुए गायमुख वैनगंगा की जन्म स्थली आया और वहाँ से दाई अंबाराल के दर्शन लेने अंभोरा और बाद में भीमखोरी होते हुए कन्कनाड (कन्हान)नदी के किनारे किनारे पेंच नदी जाकर अपने मुठवापोय महारु भूमका का दर्शन किया। महारू भूमका के दर्शन करना इसलिए जरूरी था क्योंकि अपने माता-पिता के आज्ञा का पालन करते हुए उसे अपने मुठवापोय को दिए वचन से मुक्ति पाना था।

उधर सम्लाई(तिलकाई) दाई भी पीछे-पीछे चल रही थी वह रमरमा आनें के बाद रास्ता भटक गयी। वहां उसने रमरमा भूमका से उसने भीमाल पेन के बारे में जानकारी प्राप्त की और तीव्र गति से अंबाराल दाई के पास पहुँची । अंबाड़ा से वह एक गाँव में पहुँची जहां उसे कोर्र आड़ी (मुर्गे की बांग)सुनाईं दी। वह तुरंत समझ गयी कि भीमाल पेन से मिलने की समय समाप्त हो चुकी है।

जिस भिमालपेन के माया-मोह जाल में वह अपने माता-पिता और राजपाठ, परिवार छोड़कर, त्यागकर उसके पीछे-पीछे चलीं आयीं थीं वह वायु की गति से दूसरे गाँव में जाकर सगा समाज की सेवा कर रहा हैं तो उससे प्रेरणा लेकर उसे भी कोइतूर समाज की सेवा क्यों नहीं करना चाहिए?

इसलिए सम्लाई दाई भी उसी गाँव में रहकर दीन-दुखियों की सेवा करना शुरू कर दी। मुर्गे की बांग(कोर्र आड़ी) सुनकर वह वही ठहर गई इसलिए कोइतूर समाज के लोगों ने उसे “कोराड़ी” दाई के नाम से संबोधित किया । वैसे देखा जाए तो उसकी मुख्य  नाम “तिलकाई” था किन्तु बम्लाई की छोटी बहन सम्लाई के नाम से वह बचपन में जानीं जाती थी। आज जिस गाँव में सम्लाई दाई की ठाना है वह गाँव कोराड़ी नाम से जाना जाता है वर्तमान में यह गाँव नागपुर-छिंदवाड़ा मार्ग पर नागपुर से 8किलोमीटर की दूरी पर हैं। यहां नेशनल थर्मल पावर प्लांट हैं। आज भी लोग उसे गोंडो की देवी (दाई)कहते हैं। कुंवार और चैत्र माह के नवरात्र में यहाँ मेला प्रतिवर्ष लगता है। कुवारा भिवसेन (गोंड देवस्थान)

उधर बम्लाई दाई थक हार कर डोंगरगढ़ में मड़ावी गोत्र के फड़ापेन पेनकड़ा के पास ही कुछ दूरी पर खोह के पास बैठ जातीं हैं जिस मड़ावी गोत्र के भिमालपेन हैं उसी गोत्र के फड़ापेन पेनकड़ा डोंगरगढ़ के पास स्थित है अतः उसी फड़ापेन (बड़ापेन)की छत्रछाया में बम्लाई(बम्लेश्वरी) दाई ने हमेशा-हमेशा के लिए शरण ले ली और उसके नित्य दर्शन और सेवा करने की प्रतिज्ञा मन में ले ली। उसने मन ही मन में भीमाल पेन को अपना पति (मिद्दों)मान ली थी इस तरह मड़ावी कुल की कुलवधु बन गयीं और प्रकृति शक्ति फड़ापेन से आशदान (आशीर्वाद)लेकर आजीवन कोयावंशीय कोइतूर समुदाय की सेवा में जुट गई।

आज भी उसके ठाना डोंगरगढ़ में प्रतिवर्ष कुंवार और चैत्र माह के नवरात्र में यहाँ मेला लगता है। जिसमें लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

उधर भीमाल पेन पेंच नदी के किनारे स्थित झंडीमेटटा (ऊँची पर्वत शिखर) में स्थानापन्न हो गये। भीमाल पेन यह स्थान नागपुर जिला के पारसिवनी तहसील में पेंच डैम के किनारे स्थित है। चैत्र मास की पूर्णिमा से वहां पन्द्रह दिन तक मेला लगता है जहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

यदुराय के पिताजी जोध सिंह मड़ावी पुत्र प्राप्ति के लिए भीमाल पेन की आराधना की थी और उसके आशदान (आशीर्वाद)से जोध सिंह को यदुराय नामक सुपुत्र प्राप्त हुआ था। जो आगें चलकर गढ़ा मण्डला के संस्थापक इस 158 में बना। यह जानकारी गढ़ा मण्डला राज्य के नामनगर में स्थित मोतीमहल मे अंकित हैं।

बम्लाई दाई की ठाना (देवालय)हजारों वर्षों पुरानी हैं। सन 1964 तक खैरागढ़ रियासत के गोंड महाराजा बहादुर सिंह द्वारा बम्लाई देवालय ट्रस्ट बनाया गया और देवालय का कार्यभार, देखरेख उसे सौंप दिया गया । उस समिति में आज भी इस राजपरिवार के एक सदस्य आजीवन मानद सदस्य के रूप में होता हैं और प्रथम पूजा (गोंगो) गोंड समुदाय के हाथों से ही सम्पन्न कराया जाता हैं।

बम्लाई दाई जिस पहाड़ पर स्थापित हैं उसके बायीं ओर नगाड़ा डोंगर है जहाँ पर नगाड़ा बजाकर दाई के मेला की सूचना दी जाती थी। आज भी वहाँ नगाड़ा के आकर के विशाल पत्थर हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यह नगाड़ा मड़ावी गोत्र का था जिसे बजाकर फड़ापेन गोंगो की सूचना दी जाती थी किन्तु बाहरी लोगों के सम्पर्क से वह ध्वनिहीन हो गया तब से आज तक गोंड/कोइतूरों के फड़ापेन में बाहरी लोगों को हिस्सा नहीं लेने देते।

बम्लाई दाई के डोंगर के पीछे तक़रीबन एक किलोमीटर की अंतराल में रणचण्डी दाई की ठाना(देवालय) है ।

रणचंडी दाई की प्राचीन नाम रणमर्यान दाई था। युध्द में जाने के पहले डोंगरगढ़ के गोंड राजा वहां मुर्गा, बकरा आदि देकर नत्तूर नेंग करते हैं । डोंगरगढ़ के चारों ओर ताल-तलैया वहां के गोंड राजाओं ने बनवाएं है।

गोंड/कोइतूरों के पानी के देवता येर पेन येर रैयाबाईक(सात बहनियाँ)के देवालय (ठाना)भी यहाँ स्थापित है और यही वज़ह हैं कि डोंगरगढ़ में कभी पानी की कमी नहीं होती।

कोइतूर /गोंड समुदाय में मातृशक्तियों को सदैव उच्च स्थान और मान सम्मान प्राप्त होती हैं यही कारण है कि कोइतूर/गोंड के मातृशक्तियों (अव्वाल)पेन ठाना प्राचीन काल से ऊँची स्थान, पर्वत ,पहाड़ों में स्थापित किया गया है।

??बम्लाई दाई ना सेवा-सेवा सेवा-जोहार ????

?��सम्लाई/तिलकाई/कोराड़ी दाई ना सेवा-सेवा सेवा-जोहार ????


कोयली कचारगढ़ प्रकिर्तिक गुफा | कचारगढ़ मेला | Kachargarh

महुआ का पेड़ | महुआ का फूल | Mahua Fruit | Mahua Flower

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here