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एंग्लो इंडियन

अंग्रेजों ने भारत पर 200 से अधिक वर्षों तक शासन किया। क्या ऐसा नहीं हुआ कि कुछ अंग्रेज स्थानीय लोगों से मिल कर उनसे शादी कर ली?

क्योंकि मुगलों के दौरान ऐसा बहुत हुआ था। अकबर के बाद जहांगीर जैसा हर शासक आधे राजपूत थे। ताजमहल का निर्माण करने वाला शाहजहाँ 3/4वाँ राजपूत था। इसलिए मुगलों के समय में शादी अक्सर देखा जाता था।

भारत आने से पहले अंग्रेजों ने थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलय, मातरम आदि देशों में शासन किया। ग्रेट ब्रिटेन से वहां जाने वालों में केवल युवा ब्रिटिश पुरुष हुआ करते थे। पुरुष वहां एक महिला को काम पर रखते, जिसे “डिक्शनरी” कहा जाता था। डिक्शनरी ने पुरुषों का मार्गदर्शक किया और किराए की पत्नी के रूप में भी काम किया। उनके जो बच्चे पैदा होते थे, उन्हें समाज ने गोद नहीं लिया, इसलिए उन्हें “मिशनरियों” को दिया जाता था जहाँ वे बच्चो को अंग्रेजी और स्थानीय भाषा (जो संस्कृत का एक नया रूप था) सीखते थे।

इसी पर Jessica Alba की एक बड़ी मशहूर Hollywood movie भी है -The sleeping Dictionary बनी है।

17वीं शताब्दी में, जब अंग्रेजों ने भारत में बंगाल के तटों पर से जड़ें जमाना शुरू किया, तो वे उन डिक्शनरीयों के बच्चों को भी अपने साथ ले आए क्योंकि वे अंग्रेजी से परिचित हो गए थे और कार्यालय के काम में उनकी मदद ली जाती थी।

धीरे-धीरे डिक्शनरीयों के बच्चों अंग्रेजों के साथ बंबई, बर्मा, उड़ीसा और गुजरात के बंदरगाहों में बस गए और अंग्रेजों की मदद करने लगे। वे यहाँ से अपनी मुद्रा (इंडोनेशियन रुपया में गणेश बना हुआ) लाए, साथ ही अपने राजाओं और रानियों की मूर्तियाँ लाए जिन्हें वे देवताओं के रूप में पूजते थे । अंग्रेजों ने उन्हें “एंग्लो एशियन” नाम दिया।

भारत में, आधा ब्रिटिश और आधा भारतीय वंश होता है। उन्हें “एंग्लो इंडियन” नाम दिया ।

रस्किन बॉन्ड, डेरेक ओ’ब्रायन, डायना हेडन और रोजर बिन्नी एंग्लो इंडियन समुदाय की कुछ प्रसिद्ध हस्तियां हैं। इनका इतिहास करीब 200 साल पुराना है और भारतीय संसद से काफी आश्चर्यजनक और खास जुड़ाव है।

जब भी लोकसभा चुनाव होते हैं, यह 543 सीटों के लिए आयोजित किया जाता है? लेकिन लोकसभा में 545 वास्तविक सीटें हैं? 545 में 2 अतिरिक्त सीटें “एंग्लो-इंडियन” के लिए आरक्षित होती थीं। इन 545 लोकसभा सीटों को पूरी तरह से भरने के लिए राष्ट्रपति 2 “एंग्लो-इंडियन” नामित करते थे।

यह व्यवस्था दशकों से चल रही थी लेकिन 25 जनवरी 2020 को इसे हटा दिया गया। उन्हें लोकसभा में दो सीटें और कुछ राज्य विधानसभाओं में एक सीट मिलती थी।

“एंग्लो इंडियन” शब्द का अर्थ समय के साथ बदलता रहा है। आज के समय में इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो मिश्रित ब्रिटिश और भारतीय वंश के हैं, लेकिन 100 साल पहले, 1900 के दशक में, इन लोगों को यूरेशियन कहा जाता था जो यूरोपीय और एशियाई लोगों का मिश्रण थे। क्योंकि उस समय भारत में रहने वाले अंग्रेजों और उनके वंशजों के लिए “एंग्लो-इंडियन” शब्द का प्रयोग किया गया।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 366 “एंग्लो इंडियन” शब्द को परिभाषित करता है। “ऐसा व्यक्ति जिसके पिता या पुरुष वंश में से कोई अन्य पुरुष का पूर्वज यूरोपीय वंश का है या था लेकिन जो भारत में पैदा हुआ और रह रहा है।”

भारत में रहने वाले कितने लोग वास्तव में एंग्लो इंडियन हैं?

इस प्रश्न का उत्तर बिल्कुल स्पष्ट नहीं है क्योंकि यह संख्या वास्तव में विवादित है। 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे देश में 296 एंग्लो-इंडियन रहते हैं। केवल 296! लेकिन इस समुदाय के लोगों का कहना है कि यह संख्या गलत है। राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन, जो एक एंग्लो-इंडियन हैं, उनका का कहना है कि पूरे देश में लगभग 3.5 लाख एंग्लो-इंडियन हैं। आजादी के समय यह संख्या 20 मिलियन थी। आजादी के समय 2 करोड़ एंग्लो इंडियन भारत में थे! यह समुदाय पूरे देश में काफी फैला हुआ है। ऐसा कोई एक विशेष राज्य नहीं है जिसे समुदाय का गृह राज्य कहा जा सके।

कोलकाता में “एंग्लो इंडियन” के समुदाय बहुत मिल जाएंगे क्योंकि कोलकाता ब्रिटिश अधिकारियों का घर हुआ करता था। झारखंड की पहाड़ियों के बीच मैक्लुस्कीगंज के नाम से जाना जाने वाला एक अकेला शहर है जिसे “अर्नेस्ट मैकलुस्की” ने बनवाया था। वह एक “एंग्लो इंडियन” थे और उन्होंने इस शहर को “एंग्लो इंडियन” परिवारों के लिए बनाया था।

“एंग्लो इंडियन” समुदाय की उत्पत्ति किसी विशिष्ट राज्य या क्षेत्र से संबंधित नहीं है, बल्कि पलायन और औपनिवेशिक नीति की है। यह 1600ई० के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई और भारत में पहले कुछ कारखाने स्थापित किए। एक सूरत में, दूसरा आंध्र प्रदेश में और मद्रास में। उस समय चेन्नई को मद्रास कहा जाता था। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में तेजी से बढ़ी। उन्होंने ओर फैक्ट्रियां लगानी शुरू कर दीं।

यह काफी सफल रहा और उन्होंने अधिक ब्रिटिश लोगों को रोजगार दिया। वे भारत के स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं दे रहे थे। वे इंग्लैंड से ब्रिटिश अधिकारियों को भारत में काम करने के लिए बुलाते थे। जैसे-जैसे उन्होंने अधिक कारखाने लगाए, वैसे-वैसे भारत में काम करने के लिए और अधिक ब्रिटिश अधिकारियों को बुलाना पड़ा।

ये ब्रिटिश अधिकारी कौन थे?

वे युवा लड़के थे जिन्होंने ब्रिटेन में अपना जीवन छोड़ दिया और पैसे और अच्छे करियर की तलाश में भारत में काम करने आए। अंग्रेजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों में से एक मद्रास था। इतने सारे ब्रिटिश अधिकारी मद्रास में रहते थे। ये युवा लड़के अब शादी करने के लिए लड़कियों की तलाश में थे लेकिन ब्रिटिश महिलाएं भारत नहीं आना चाहती थीं। 1600ई० के दशक में किसी को यू०के० से भारत आना था, तो संभावना थी कि उन्हें अपना पूरा जीवन यहीं बिताना पड़ा, क्योंकि वे यहां काम कर रहे थे। इसलिए, बहुत कम ब्रिटिश महिलाएं भारत में आकर रहना चाहती थीं। ब्रिटिश पुरुष शादी करने के लिए ब्रिटिश महिलाओं को नहीं ढूंढ पाए। उन्होंने पुर्तगाली और फ्रांसीसी महिलाओं से शादी करने की सोची, तब दक्षिण भारत में पुर्तगाली और फ्रांसीसी का उपनिवेश हुआ । लेकिन इससे एक बड़ी समस्या पैदा हो गई कि पुर्तगाली और फ्रांसीसी महिलाएं ईसाई धर्म के रोमन कैथोलिक संप्रदाय की थीं और ब्रिटिश अधिकारी प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के थे। ये एक ही धर्म हैं, यानी ईसाई धर्म, लेकिन दो अलग-अलग संप्रदाय हैं:

कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। और उस समय कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच कलह थी। चर्च आपस में काफी प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। इसे अंग्रेजी सुधार कहा जाता है। इसलिए इस संघर्ष के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी को यह पसंद नहीं था कि ये ब्रिटिश अधिकारी कलह के कारण इन फ्रांसीसी और पुर्तगाली महिलाओं से शादी करें।

अब ब्रिटिश अधिकारी किससे शादी करेंगे?

उन्होंने स्थानीय भारतीय महिलाओं से शादी करना शुरू कर दिया और जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऐसा होते देखा तो उन्होंने इसे एक अच्छा विकल्प माना। उन्होंने पुर्तगाली और फ्रांसीसी महिलाओं की तुलना में इसे पसंद किया। वास्तव में ईस्ट इंडिया कंपनी को यह विकल्प इतना पसंद आया कि उन्होंने 1687 ई० में एक नई नीति पेश की कि यदि कोई ब्रिटिश अधिकारी किसी स्थानीय भारतीय महिला से शादी करता है और उसका एक बच्चा होता तो 5 रुपए इनाम के रूप में देते। ई०आई०सी० वास्तव में प्रचार कर रहा था और ऐसे विवाह के बच्चों को “यूरेशियन” कहा जाता है, जो यूरोपीय और एशियाई लोगों का मिश्रण है। पीढ़ी दर पीढ़ी जब यह और अधिक होने लगा, एक समुदाय का गठन किया गया जिसे “एंग्लो इंडियन” समुदाय के रूप में जाना जाने लगा।

जैसे ही ईस्ट इंडियन कंपनी भारत में फैली, इसी तरह के समुदाय भारत के अन्य हिस्सों में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में देखे गए। पश्चिम बंगाल में रेलवे पर अंग्रेज काम कर रहे थे। इसलिए बड़ी संख्या में ब्रिटिश अधिकारियों को बुलाया गया जो ड्राइवर और इंजीनियर थे। आज भी “एंग्लो इंडियन” समुदाय रेलवे से जुड़ा हुआ है।

यदि आपने रेलवे चिकन करी के बारे में सुना है, तो इस व्यंजन की उत्पत्ति एंग्लो-इंडियन समुदाय से हुई थी। एंग्लो-इंडियन समुदाय की तरह, यह व्यंजन भारतीय और ब्रिटिश संस्कृति के मेल से बनाया गया है। कहानी यह है कि एक दिन एक अंग्रेज अफसर खाने के लिए रेलवे के किचन में जाता है। रसोइया कहता है कि मसालेदार करी ही मिलती है। ब्रिटिश अफसर का कहना है कि वह ज्यादा मसाला नहीं खाना चाहता। क्या किया जा सकता था? शेफ को चिकन करी में कुछ दही मिलाने का विचार आया ताकि मसाले का प्रभाव कम हो और ब्रिटिश अधिकारी को यह व्यंजन बहुत पसंद आया। क्योंकि उसे भारतीय खाना खाने को मिला लेकिन वह उतना मसालेदार नहीं था। उन्हें यह व्यंजन इतना पसंद आया कि यह रेलवे के मेनू में एक नियमित वस्तु बन गई है; रेलवे चिकन करी। इसी तरह डाक बंगला चिकन और बॉल करी कुछ ऐसे व्यंजन हैं, जिनकी उत्पत्ति एंग्लो-इंडियन समुदाय में हुई है।

1800 ई०के दशक की शुरुआत तक, एंग्लो इंडियन समुदाय फलने-फूलने लगा। दूसरे, एंग्लो-इंडियन समुदाय के कई सदस्यों ने ब्रिटिश सेना और ब्रिटिश नौसेना में सेवा की और इसे बढ़ावा देने के लिए, ईस्ट इंडियन कंपनी “एंग्लो इंडियन” के बच्चों को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजती थी। यह काफी सफल और समृद्ध समुदाय था।

वास्तव में, 1800 ई० के दशक के अंत तक “एंग्लो इंडियन” समुदाय की जनसंख्या भारत में वास्तविक ब्रिटिश लोगों से अधिक हो गई । यह देख अंग्रेजों को परेशानी होने लगी। उन्हें डर था कि भविष्य में “एंग्लो इंडियन” समुदाय इतना शक्तिशाली हो सकता है कि यह उन्हें पछाड़ देगा और ईस्ट इंडिया कंपनी पर नियंत्रण कर लेगा।

जो लोग शुद्ध अंग्रेज थे, उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी कि कहीं उन्हें सत्ता से उखाड़ न फेंक दे और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कुछ नए नियम बनाए, पहला नियम 1786 ई० में बना। अगर पिता की मृत्यु हो जाती है तो बच्चे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड नहीं जा सकते। वह प्रतिबंधित था। इसके बाद, एक और नीति लाई गई कि किसी भी मूल भारतीय के बेटे को “एंग्लो-इंडियन” समुदायों सहित ईस्ट इंडिया कंपनी की नागरिक, सैन्य या समुद्री सेवाओं में नियुक्त नहीं किया जाएगा। कहने का तात्पर्य यह था कि वे ब्रिटिश सेना या नौसेना में “एंग्लो इंडियन” समुदाय के किसी भी व्यक्ति को नियुक्त नहीं करेंगे। एक सदी पहले जब यह उनके अनुकूल था, तब उन्होंने “एंग्लो इंडियन” समुदायों का समर्थन किया और उन्हें वित्तीय प्रोत्साहन दिया। जब वे डरने लगे तो उन्होंने “एंग्लो इंडियन” को सेना में सेवा न देकर सीमित कर दिया।

ब्रिटिश सेना में सेवारत सभी “एंग्लो इंडियन” को उनकी नौकरी से हटा दिया गया था। 1825 ई० में समुदाय के कुछ सदस्यों ने एक साथ आकर ब्रिटिश सरकार से समान अधिकारों और अवसरों की मांग करने के लिए एक याचिका दायर की। उनमें से एक जे.डब्ल्यू.रिकेट थे, जो 1830 ई० में इंग्लैंड के लिए रवाना हुए और अपनी याचिका के साथ ब्रिटिश संसद पहुंचे। रिकेट की याचिका को ब्रिटिश संसद ने स्वीकार कर लिया और 1833 ई० के चार्टर अधिनियम में एक नया खंड जोड़ा गया। इस खंड में कहा गया है कि जन्म या रंग की परवाह किए बिना सभी व्यक्ति भारत में नागरिक और सैन्य सेवाओं में नौकरी के हकदार थे। इस लड़ाई के बाद एंग्लो इंडियन समुदाय को उनके अधिकार मिले। उन्हें अपनी स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता से बहुत पहले मिल गई थी। समय के साथ, इस समुदाय ने सरकार के साथ काम किया और भारत में विभिन्न क्षेत्रों में काफी योगदान दिया है।

उदाहरण के लिए, ICSE बोर्ड, इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा, आपने इसके बारे में सुना होगा।

ICSE बोर्ड की स्थापना किसने की?

एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य, फ्रैंक एंथोनी ने 1958 ई० में किया । लेकिन शिक्षा में इस समुदाय का योगदान सालों पहले का है। भारत में रहने वाले “एंग्लो इंडियन” परिवार अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना चाहते थे। वे चाहते थे कि उनके बच्चे उन स्कूलों में पढ़े जहां ब्रिटिश शिष्टाचार और व्यवहार सिखाया जाता है। इस कारण से इस समुदाय द्वारा मद्रास और कोलकाता में कई नए निजी स्कूल बनाए गए। गेनार्ड स्कूल, ला मार्टिनियर, सेंट जेवियर्स इन सभी स्कूलों की शुरुआत का श्रेय “एंग्लो-इंडियन” समुदाय को दिया जाता है। आज, ये बहुत प्रतिष्ठित स्कूल हैं। शुरुआत में, इन स्कूलों में प्रवेश केवल “एंग्लो इंडियन” समुदाय के बच्चों के लिए था, फिर इसे सभी के लिए खोल दिया गया था।

ऑल इंडिया एसोसिएशन फॉर एंग्लो-इंडियन्स के अनुसार, 1921 ई० में 11000 से अधिक एंग्लो-इंडियन रेलवे में काम कर रहे थे। रेलवे इस समुदाय के लिए एक प्रमुख रोजगार क्षेत्र था। हेनरी गिडनी, एंग्लो इंडियन समुदाय के एक अन्य सदस्य थे केवल एक ही चिंता थी कि इस रोजगार को बरकरार रखा जाए। उस समय की ब्रिटिश भारत सरकार के वायसराय ने हेनरी गिडनी को 1921 ई० में केंद्रीय विधान सभा में इसे नामित किया था। इस वक्त केंद्रीय विधान सभा ब्रिटिश सरकार का निचला सदन था इसलिए आज इसकी तुलना लोकसभा से कर सकते हैं। उन्हें इसमें 5 बार नॉमिनेट किया गया था।

सामाजिक कुंठा के कारण खुद को “शुद्ध” कहना शुरू कर दिया। ( अंगरेज खुद को “His Highness”, “Royal” वगैरा बोलते थे)

1926 ई० में हेनरी गिडनी ने ऑल इंडियन एंग्लो इंडियन एसोसिएशन का गठन किया जो आज तक मौजूद है।

1931 में, इसकी परिभाषा बदल दी गई और एंग्लो-एशियाई के साथ “यूरेशियन” एक नया शब्द का इस्तेमाल भी किया जाने लगा। (यूरोपीय पिता + एशियाई माता)

इसलिए तिलक ने एक बार कहा था कि वे यूरेशिया से अंग्रेजों के साथ आए हैं। अंग्रेजों जब इंडोनेशिया से भारत आए तो हाथी की सूंड के देवता जो इंडोनेशियाई सभ्यता से थे, जिसे तिलक ने महाराष्ट्र में प्रचारित किया और विसर्जन शुरू किया, इससे पहले कि कोई मराठा इन देवताओं को नहीं जानता था। इन देवता को इंडोनेशियाई मुद्रा में भी जगह मिलती है।

1947 ई० में भारत की आजादी दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी। उस समय भारत में 20 मिलियन से अधिक एंग्लो इंडियन रह रहे थे। इन आंग्ल भारतीयों के लिए संघर्ष की भावना थी। एक तरफ तो वे खुद को भारतीय मानते थे। वे भारत में रहते थे, भारतीय संस्कृति का पालन करते थे लेकिन दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने उनकी बहुत मदद की थी। ब्रिटिश सरकार ने वर्षों तक हमेशा उनका साथ दिया, उन्हें शासन में शामिल किया लेकिन ब्रिटिश सरकार भारतीयों के लिए दुश्मन की तरह थी। इसलिए, जाहिर है अगर अंग्रेज भारत छोड़ देते हैं, तो इस समुदाय का कल्याण कैसे होगा, जिससे उनमें असुरक्षा की भावना थी। क्या भारतीयों पर भरोसा करना संभव है कि वे “एंग्लो इंडियन” का समर्थन करेंगे? इस संघर्ष के कारण, कई एंग्लो-इंडियन ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा में रहने के लिए भारत छोड़ गए। लेकिन कुछ “एंग्लो इंडियन” ने फैसला किया कि वे भारत में ही रहेंगे और वे जिस असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, उससे वे चर्चा के माध्यम से निपटेंगे।

फ्रैंक एंथोनी ऐसे ही एक एंग्लो इंडियन थे। फ्रैंक एंथोनी ने अपनी आवाज उठाई और न केवल एंग्लो इंडियन बल्कि बाकी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी आरक्षण की मांग की। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय निश्चित रूप से महसूस करेगा कि आरक्षण एक विभाजन है लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षण उनके अस्तित्व का सवाल है।

एंथनी ने कहा कि आजादी के समय आरक्षण महत्वपूर्ण है और 10 साल बाद इसकी समीक्षा की जा सकती है । उन्होंने एक और तर्क दिया कि जिस समय भारत स्वतंत्र हो रहा था, उस समय संविधान में अपनी 8वीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी थी लेकिन अंग्रेजी उनमें से एक नहीं थी।

इन कारणों से, संविधान सभा ने संविधान में अनुच्छेद 331 को शामिल किया जो राष्ट्रपति को लोकसभा के लिए दो एंग्लो इंडियन सदस्यों को नामित करने का अधिकार देता है। इस समुदाय में फ्रैंक एंथोनी का काफी सम्मान है। 1947 में, उन्होंने प्रसिद्ध रूप से कहा, “जितना अधिक हम प्यार करते हैं और भारत के प्रति वफादार होते हैं, उतना ही भारत हमारे प्रति वफादार होगा।” अनुच्छेद 331 के अनुसार लोकसभा के लिए मनोनीत एंग्लो इंडियन सदस्य अपनी पसंद का राजनीतिक दल चुनने के लिए स्वतंत्र हैं।

एक और अनुच्छेद है, अनुच्छेद 334 जो कहता है कि अनुच्छेद 331 का प्रावधान पहली बार लागू होने के 40 साल बाद हटा दिया जाएगा। 1947 के बाद जब 40 साल पूरे हो गए तो उसके बाद आने वाली सरकारें इस प्रावधान का नवीनीकरण करती रहीं इसलिए 2020 तक नामांकन की प्रक्रिया चलती रही। 25 जनवरी 2020 को सरकार ने आखिरकार इस कोटा को हटाने का फैसला किया।

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एंग्लो-इंडियन की सीट लोकसभा से हटाने का क्या कारण बताया गया?

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार इस समुदाय के केवल 296 सदस्य ही बचे हैं। इसलिए इतनी कम संख्या में लोगों के लिए आरक्षण का कोई मतलब नहीं है। इस तर्क को डेरेक ओ-ब्रायन जैसे कुछ लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा, जो टीएमसी पार्टी के सदस्य हैं और एक एंग्लो-इंडियन हैं। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र, रेलवे क्षेत्र और सिविल सेवाओं में एंग्लो-इंडियन की उपलब्धियों को सूचीबद्ध किया। टीएमसी के एक अन्य विधायक शेन कैल्वर्ट ने कहा कि यह निर्णय लेने से पहले एंग्लो इंडियन समुदाय के किसी भी सदस्य से सलाह नहीं ली गई थी। उनका मानना ​​था कि सरकार को यह फैसला लेने से पहले एक कमेटी बनानी चाहिए थी।

द हिंदू की 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार “एंग्लो इंडियन” समुदाय के कई सदस्य आर्थिक और सामाजिक रूप से गरीब हैं। लेकिन हिबी ईडन जो कांग्रेस पार्टी के एक अन्य सांसद हैं, का कहना है कि “दिया गया आरक्षण न केवल आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए था, बल्कि “एंग्लो इंडियन” को अपनेपन की भावना देने के लिए भी था”। उनका मानना ​​है कि समाज को आज भी इसकी जरूरत है। “एंग्लो इंडियन” समुदाय की नवीनतम मांग सरकार द्वारा अल्पसंख्यक का दर्जा देने की रही है ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं और छात्रवृत्ति के तहत अधिक लाभ मिल सके।

एंग्लो एशियन = यूरेशियन = डिक्शनरी = एंग्लो इंडियन ये सभी ब्राह्मण के वंशज हैं ।

ये सभी दल और विपक्ष बनकर भारत की सत्ता में बने हुए हैं। इस सत्ता, व्यापार और ब्राह्मणवाद के बिना इस देश में ये लोग जीवित नहीं रह सकते थे।

-Piyush Ahir


DNA Report 2001 में साबित हुआ कि उच्च जाति के भारतीय पुरुष यूरोपीय है

ऐ/सी मिन्ट कुंवर केश्री सिंह | A/C Bharat Sarkar Kutumb Pariva

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