adivasi-social-illness
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???कोयतूर पीड़ित शोषित समाज की मुख्य सामाजिक बीमारिया है ??

निम्नलिखित सामाजिक समयाए है : –

1) उप-जातिवाद

2) क्षैत्रवाद

3) पार्टीवाद

4) दोगलावाद

5) संगठनवाद

6) व्यक्तिवाद

7) धर्मसम्प्रादायवाद

8) पुँजीवाद

कोयतूर समाज के सामाजिक कार्यकर्ता दिन रात समाज के लिए काम करते है लेकिन समाज सुधार में सफलता नहीं मिलती इसका मुख्य कारण ये है की जिसके कारण संगठित समाज का विभाजन हुआ उसे ही हम लोग सामाजिक बिमारीयो के समाधान का मार्ग समझ बैठते है। ☘️??

जब तक हम उपरोक्त बीमारियों को ठीक नहीं करेंगे, आदिवासी समाज कभी भी संगठित नहीं हो पाएगा, क्योंकि ये रोग समाज के दुश्मनों ने जानबूझकर खुद समाज में डाला है, ताकि आदिवासी समाज कभी संगठित न हो सके।☘️??

हम लोगो को हमारे समाज की निम्न कुरूतियों से छुटकारा पाना होगा।????☘️????

1) उप-जातिवाद (समाधान- समसंस्कृति)

(भील, भीलाला, बारेला, गौंड, कोरकु, संथाल, बेगा, सहारीया जैसी 642 जनजातियो को) जितनी जल्दी हो खत्म करना है क्योंकि यह अंदर बहने वाला खुन एक है हम लोग एक ही डीएनए के है। हमारे पुरखे एक ही थे उनका संघर्ष भी एक ही था हमारे जल, जंगल, जमीन भी तो फिर हम उनके वँसज अलग अलग कैसे हो गए? ?☘️????

2) क्षैत्रवाद (समाधान-राष्ट्रिय स्तर की सोच)

हमारे कोयतूर समाज को राष्ट्रवाद की बिमारी पैदा करके अलग अलग राष्ट्रों में बांट दिया गया है जैसे घाट के निचे वाला और घाट के ऊपर वाला, मालवा का कोयतूर निमाड का कोयतूर, नोर्थईस्ट का कोयतूर मध्य प्रदेश का कोयतूर आदि जब देश हमारा है तो हमारे पुरखे इस देश में के मालिक थे तो सभी कोयतूर हमारे भाई के साथ इस तरहा से हम राष्ट्रिय स्तर की सोच रखनी पडेगी। ????☘️

3) पार्टीवाद (समाधान-सामुहिक आंदोलन)

हमारे समाज को व्यवस्था के नाम पर बहुत सारी राजनितिक पार्टीयो में बाँट दिया गया है जिस पार्टी या संगठन का मुखिया ब्राह्मण या मनुवादी हो उस पार्टी और संगठन में हमारा भला कभी नहीं हो सकता है यह बात कांस्टेबल समाज ने पहले ही दी है हर समाज ने पहले ही कह दी है। हर राजनेता समाज का कोई पार्टी का होता है इसलिए हमें पार्टी से ज्यादा महत्व समाज को देना चाहिए, समाज पर किसी तरह की कोई परेशानी आये तो एक मंच पर एक हो जाना चाहिए और अपने हक के लिए कारो के लिए मिलकर सामूहिक रूप से आंदोलन करना चाहिए। गैर ब्राह्मण / मनुवादी पार्टी को छोड़कर अपनी पार्टी का समर्थन करे जिससे हमारा समाज सुरक्षित हो सके।??????

4) दोगलावाद (समाधान-सामूहिक बहिष्कार)

हमारे समाज मे दोगला पाखंडी बेहरुपीया दलाल प्रवति का जो व्यक्ति होता है जो समाज के सामने * सामाजिक लीडर होने की कसमें खाता है घड़ियाली आंसू बहाता है अपनी गरीबी के किस्से सुनाता है और मौका मिलते ही धंधा शुरू कर देता है कभी चुपके से कर देता है। कभी समाज के नाम का चंदा, तो कभी घर की जरूरतों के लिए रोना धोना ओर जैसे ही चुनाव का समय आता है, राजनीतिक पार्टी के मुखियाओं के पास जाकर टिकिट के लिए साठ गांठ करना गुमराह करना समाज का नाम से खेलना शुरू कर देना और से नाटक शुरू कर देना और से नाटक शुरू कर देना और चुनाव समाप्त नाटक समाप्त होते ही वापस समाज के सामने रोना धोना शुरू करना बेनर में सामाजिक कार्यकर्ता और मंच से रानीतिक पार्टी को जलील करना ऐसा दोगला आदमी समाज राजनीतिक पार्टी दोनों के लिए एक बीमारी है ऐसी ढोंगी को समाज और पार्टी दोनों से लात पड़नी चाहिए।

जते रहो, ढोंगी पाखंड से दूर रहे। ?☘️??

5) संगठनवाद (समाधान-उद्देशय की एक रूपता)

हमारे समाज के युवाओ और लोगो को हमारे दुशमनो ने बहुत सारे संगठनो में बांट दिया है। हमारे संगठन कैसे भी हो कोई फर्क नहीं पडता बस सारें संगठनो के उद्देश्य एक होना चाहिए तो हम संगठनवाद की बिमारी को खत्म कर देंगे। समुदाय विशेष के संगठन के साथ ही पीडित शोषित समुदायो के सामूहिक नेतृत्व को मजबूत करे। ☘️??

6) व्यक्तिवाद वर्चस्ववाद (समाधान-सामुहिक नेतृत्व)

हमारे पुरखो में सामूहिक नेतृत्व की प्रथा का चलन था लेकिन आज हमारे आदिवासी समाज में व्यक्तिवाद वर्चस्ववाद घर कर गया है हमारा व्यक्ति प्रतिमान का भुखा हो गया है मान सम्मान का भुखा हो गया है व्यक्ति में (मनुवादयो की बीमारी) वाद पैदा हो गया है।?☘️??

?☘️“मै आधुनिक बिरसा भगवान हू मुझे पुरखो की आत्माये है मैं अध्यक्ष बनुगा। मेने सब से ज्यादा संगठन बनाये है। जीत मेरी वजह से ही होती।”?☘️

☘️??मैं ही समाज हूँ मैं ही विधायक बनाता हूँ मेरे पास सब कोई आते है। मै खत्म तो सब खत्म। जो मेरी नहीं सुनेगा वो गद्दार होगा, मे गाँव की समाज मे सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा हुँ। मै जो जानता हु वो तुम नहीं जानते। आशाराम ने भी खुद को भगवान घोषित किया था।??☘️

ऐसे व्यक्तियों की जगह समाज के मुख्या के रूप में नहीं होना चाहिए ।

7) धर्म???सम्प्रदायवाद? (समाधान-अपनी संस्कृति का सम्मान करना)

हमारे कोयतूर समाज का बहुत सारे पंथ सम्प्रदायायो में बटा है, हमे हमारी संस्कृति को पहली प्राथमिकता देना होगा और हमारी संस्कृति को बचाए रखना होगा ??☘️

8) पुँजीवाद (समाधान – सामाजिक सोच का सम्मान)

आज हमारे समाज में पूँजीवाद भी घर कर गया है, अमीर गैर-जनजातियाँ ठीक हैं, अमीर जनजातियाँ केवल अमीर जनजातियों से नाता रखती है और गरीब जनजातियों गरीब जनजातियों से जिस कारण हम एक नहीं हो पा रहे हैं। जनजातियों में भी गरीबी अमीर की दीवार खड़ी की गई है, इसलिए जिस आदमी के पास कोई सामाजिक सोच नहीं है और वह अमीर है, वह समाज के लिए मरा हुआ आदमी है। जो आर्थिक रूप से गरीब है, लेकिन समाज के बारे में सोचता है कि दिन और रात जमीनी स्तर पर काम करना, व्यक्ति के लिए एक जीवित व्यक्ति है।

@रुमाल पटेल (डोडवे)@

जयस ब्लॉक अध्यक्ष उमरबन

वंचित समाज की आवाज

भीम आर्मी एवं जयस संगठन के प्रवक्ता उमरबन


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